Thu 24 Jm2 1435 - 24 April 2014
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क्या रेहन (गिरवी) मांगने वाले के लिए रेहन रखी हुई चीज़ से लाभ उठाना जाइज़ है ?

एक आदमी ने मेरे पास तीन वर्ष की अवधि के लिए ज़मीन का एक टुकड़ा रेहन रखा था,  और इन वर्षों के दौरान मैं ने उस की जोताई और खेती की, तो क्या उस से प्राप्त होने वाला लाभ सूद (व्याज़) समझा जायेगा ?

रेहन की मांग करने वाले आदमी के लिए, रेहन रखने वाले आदमी की अनुमति के बिना रेहन रखी हुई चीज़ से लाभ उठाना किसी भी हालत में जाइज़ नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "किसी भी आदमी का धन उस की मर्ज़ी के बिना हलाल -वैध- नहीं है।" इसे अहमद ने (हदीस संख्या : 20172 के तहत) वर्णन किया है, और शैख अल्बानी ने इर्वाउल-गलील (5/279) में इसे सहीह कहा है।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फरमान के आधार पर भी वैध नहीं है कि: "हर मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर उसका खून, उस का धन और उस की इज़्ज़त व आबरू हराम है।" (सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 2564)

दूसरा :

अगर रेहन रखने वाला, रेहन की मांग करने वाले को रेहन रखी हुई चीज़ से लाभ उठाने की अनुमति दे देता है तो यदि वह उधार, क़र्ज़ लेने की वजह से (ऋण का उधार) है, तब भी रेहन मांगने वाले आदमी के लिए रेहन से लाभ उठाना जाइज़ नहीं है, यद्यपि रेहन रखने वाले ने अनुमति दे दी है, क्योंकि यह ऐसा क़र्ज़ है जो लाभ को जन्म देता है, अत: वह सूद है।

इमाम बैहक़ी रहिमहुल्लाह सुनन अस्सुग्रा (4/353) में कहते हैं :

हमें फज़ाला बिन उबैद से वर्णन किया गया कि उन्हों ने कहा : हर वह क़र्ज़  जो लाभ को जन्म देता है वह सूद का एक रूप है। तथा हमें इब्ने मसऊद, इब्ने अब्बास, अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अन्हुम वगैरा से इसी के अर्थ में वर्णन किया गया है। तथा उमर और उबै बिन कअब रज़ियल्लाहु अन्हुमा से भी वर्णित है।"

तीसरा :

अगर वह ऋण जिस में ज़मीन रेहन रखी गयी है क़र्ज़ न हो, जैसे कि किसी बेचे गये सामान का मूल्य या घर का किराया इत्यादि हो और रेहन का मालिक (क़र्ज़ दार) रेहन मांगने वाले (क़र्ज़  देने वाले) के लिए रेहन रखी हुई चीज़ से लाभ उठाने की अनुमति प्रदान कर दे, तो उस पर इस में कोई आपत्ति की बात नहीं हैं।

मुदव्वना (4/149) में वर्णित है कि :

"मैं ने कहा : आप का इस बारे में क्या विचार है कि क्या रेहन की मांग करने वाला रेहन रखी हुई चीज़ से लाभ उठाने की कोई शर्त लगा सकता है ? उन्हों ने कहा : यदि वह बिक्री से है तो ऐसा करना जाइज़ है, और अगर ऋण, क़र्ज की वजह से है तो ऐसा करना जाइज़ नहीं है, क्योंकि यह ऐसा उधार हो जाता है जो लाभ को जन्म देता है। मैं ने कहा : क्या यह मालिक का कथन है ? उन्हों ने कहा : हाँ ..."

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"जिस रेहन में खर्च (व्यय) की आवश्यकता नहीं होती है, जैसे कि घर और सामान वगैरा, तो रेहन मांगने वाले के लिए रेहन रखने वाले की अनुमति के बिना उस से लाभ उठाना किसी भी हालत में जाइज़ नहीं है। हम इस बारे में किसी का मतभेद नहीं जानते ; क्योंकि रेहन रखी हुई चीज़ रेहन रखने वाले की संपत्ति है, तो इसी तरह उस का विकास और उस का लाभ भी उसी का है, अत: उस की अनुमति के बिना किसी और के लिए उसे लेना जाइज़ नहीं है। अगर रेहन रखने वाला, रेहन मांगने वाले के लिए बिना किसी छतिपूर्ति के रेहन से लाभ उठाने की अनुमति प्रदान कर दे, और रेहन का ऋण, क़र्ज़  की वजह से हो तो जाइज़ नहीं है ; क्योंकि वह ऐसा क़र्ज़  प्राप्त करता है जो लाभ को जन्म देता है, और यह हराम है। इमाम अहमद कहते हैं : मैं घर का क़र्ज़  नापसंद करता हूँ, वह निरा सूद और व्याज़ है। अर्थात् : यदि घर किसी क़र्ज़  में गिरवी रखा हो जिस से रेहन मांगने वाला लाभ उठाता हो।

और अगर रेहन किसी बिक्री किये गये सामान का मूल्य, या किसी घर का किराया, या क़र्ज के अलावा कोई अन्य ऋण है, और रेहन रखने वाला उसे लाभ उठाने (प्रयोग करने) की अनुमति दे दे, तो उस के लिए रेहन से लाभ उठाना जाइज़ है।" (इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह की बात समाप्त हुई).

"अल-मुग़नी" (4/250)

चौथा :

पीछे वर्णित तरीक़े पर, रेहन से लाभ उठाने के लिए यह शर्त है कि यह लाभ उठाना क़र्ज़  की अदायगी की अवधि में विलंब करने के बदले में न हो, अगर उस का रेहन से लाभ उठाना इस के बदले में है तो रेहन की मांग करने वाले के लिए रेहन से लाभ उठाना जाइज़ नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थिति में वह लाभ को जन्म देने वाले क़र्ज़  के अध्याय से हो जाता है।

इफ्ता की स्थायी समिति से प्रश्न किया गया :

एक आदमी के ऊपर एक दूसरे आदमी का क़र्ज़ है, क़र्ज़ दार ने उस के बदले में ज़मीन का एक टुकड़ा रेहन रखा है, तो क्या क़र्ज़ के मालिक (क़र्ज़  देने वाले) के लिए उस गिरवी रखी हुई ज़मीन से उसकी खेती करके या उसे किराये पर देकर या इसी के समान किसी अन्य ढंग से लाभ उठाना जाइज़ है ?

तो समिति ने उत्तर दिया :

"अगर गिरवी रखी हुई चीज़ ऐसी नहीं है जिस के लिए खर्च करने और देख रेख की आवश्यकता होती है, जैसे कि सामान और अचल संपत्ति ज़मीन और घर आदि, और वह क़र्ज़ के ऋण के अलावा किसी अन्य ऋण में गिरवी रखी गयी हो, तो रेहन की मांग करने वाले के लिए रेहन रखने वाले की अनुमति के बिना उस में खेती करके या उसे किराया पर देकर लाभ उठाना जाइज़ नहीं है, क्योंकि वह रेहन रखने वाले की संपत्ति है तो उस से विकसित चीज़ भी उसी की होगी, अगर रेहन रखने वाला, रेहन मांगने वाले को इस ज़मीन से लाभ उठाने की अनुमति दे दे और वह ऋण क़र्ज़ का ऋण न हो तो रेहन मांगने वाले के लिए उस से लाभ उठाना जाइज़ है भले ही वह बिना किसी मुआवज़ा के हो, किन्तु इस शर्त के साथ कि वह उस क़र्ज़  की अदायगी की अवधि में विलंब करने के बदले में न हो, अगर उस का रेहन से लाभ उठाना इस के बदले में है तो रेहने की मांग करने वाले के लिए उस से लाभ उठाना जाइज़ नहीं है।

किन्तु अगर यह गिरवी रखी हुई ज़मीन, क़र्ज़ के ऋण में गिरवी रखी गयी है, तो रेहन की मांग करने वाले के लिए रेहन से बिल्कुल लाभ उठाना जाइज़ नहीं है, क्योंकि वह ऐसा क़र्ज़  है जो लाभ को जन्म देता है, और हर वह क़र्ज़  जो लाभ को जन्म दे, वह विद्वानों की सर्व सहमति (इत्तिफाक़) से सूद है।"

"फताव अल्लज्ना अद्दाईमा" (स्थायी समिति के फत्वे 14/176-177)

पाँचवां :

अगर रेहन से लाभ उठाना उस के मालिक की अनुमति के बिना है, या उस के मालिक ने अनुमति दे दी है किन्तु उन दोनों के बीच जो उधार है वह क़र्ज़ के रूप में है, जैसा कि इस का वर्णन हो चुका, या क़र्ज़  की अदायगी की अवधि में विलंब करने के बदले में है : तो इस ज़मीन की फसल (उपज) से कुछ भी लेना, या उस की आय से कुछ भी लाभ उठाना जाइज़ नहीं है।

और अगर रेहन मांगने वाले ने -जिस के हाथ में रेहन है- उस ज़मीन की जोताई और खेती की है, तो उस की उपज और फल से वह उस की जोताई और खेती का किराया हिसाब कर के ले लेगा, और उस में से जो कुछ बाक़ी बचेगा उसे वह उस के मालिक पर लौटा देगा या उस के क़र्ज़  में से काट देगा।

तथा प्रश्न संख्या : (105457) का उत्तर देखिये।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखता है।

इस्लाम प्रश्न और उत्तर
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