शुक्रवार 8 रबीउलअव्वल 1440 - 16 नवंबर 2018
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उसके ऊपर क़र्ज़ (ऋण) है और वह हज्ज करना चाहता है

प्रश्न

मेरे ऊपर बैंक का ऋण है और मैं उम्रा के लिए जाना चाहता हूँ। मुझे पता है कि हज्ज या उम्रा के लिए जाने से पहले मुझे अपने सभी ऋण वापस भुगतान कर देना चाहिए। तो क्या आप मुझे इसके बारे में इस्लामी दृष्टिकोण से सही तरीक़ा और सीमाएं बता सकते हैं?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथमः

यदि यह ऋण (क़र्ज़) सूद (ब्याज) पर आधारित है तो यह हराम है और प्रमुख पापों में से एक पाप और सात विनाशकारी गुनाहों में से एक है। इसे सभी राष्ट्रों ने वर्जित (निषिद्ध) ठहराया है यहाँ तक कि यूनानी मूर्तिपूजकों ने भी, उनमें से एक का जिसका नाम सोलून था कहना है : धन एक बाँझ मुर्गी की तरह है, चुनांचे एक दिर्हम एक दिर्हम को जन्म नहीं दे सकता।

तथा ईसाइयों के सिद्धांत में वर्णित है कि सूद खाने वाले को मर जाने पर कफन नहीं दिया जाएगा, यहाँ तक कि यहूदी लोग भी सूद (ब्याज) को हराम ठहराते हैं।

जहाँ तक इस्लाम धर्म की बात है तो उसने सूद को इस प्रकार हराम ठहराया है कि किसी के लिए उसके   निषेध के बारे में संदेह करने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ा है।

अल्लाह तआला ने फरमायाः

وأحل الله البيع وحرم الربا فمن جاءه موعظة من ربه فانتهى فله ما سلف وأمره إلى الله ومن عاد فأولئك أصحاب النار هم فيها خالدون [البقرة: 275] .

''अल्लाह ने व्यापार (क्रय-विक्रय) को वैध किया है और सूद (ब्याज) को हराम ठहराया है। अतः जिसके पास उसके पालनहार की ओर से सदुपदेश आ गया और वह बाज़ आ गया, तो जो कुछ पहले ले चुका वह उसी का है और उसका मामला अल्लाह के हवाले है। और जिसने फिर यही कर्म किया तो ऐसे ही लोग नरकवासी हैं, वे उसी में सदैव रहनेवाले हैं।'' (सूरतुल बक़राः 275)

तथा अल्लाह ने फरमायाः

  يا أيها الذين آمنوا اتقوا الله وذروا ما بقي من الربا إن كنتم مؤمنين [البقرة: 278] .

''ऐ ईमान वालो (विश्वासियो), अल्लाह से डरो और छोड़ दो जो सूद बाक़ी बचा है, यदि तुम (वास्तव में) ईमान वाले हो।'' (सूरतुल बक़राः 278).

अबू जुहैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खून की क़ीमत, कुत्ते की क़ीमत और लौण्डी की (वेश्यावृत्ति द्वारा) कमाई से मना किया है, तथा गोदना गोदने वाली और गोदना गोदवाने वाली पर और सूद खानेवाले और उसे खिलाने वाले पर लानत (धिक्कार) भेजी है तथा चित्र बनाने वाले पर शाप किया है।'' इसे बुखारी (हदीस संख्याः 2238) ने रिवायत किया है।

तथा अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : “अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूद खानेवाले और सूद खिलाने वाले पर धिक्कार भेजा है।'' इसे मुस्लिम (हदीस संख्याः 1597) ने रिवायत किया है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप ने फरमाया : "सात विनाशकारी पापों से बचो। लोगों ने कहाः हे अल्लाह के पैगंबर, वे क्या हैंॽ आप ने फरमायाः अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराना (शिर्क करना), जादू करना, किसी आत्मा की जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है अवैध (अनाधारिक) रूप से हत्या करना, सूद खाना, अनाथ का धन खाना, किसी दुश्मन पर चढ़ाई के दिन पीठ फेरकर भागना और पवित्र व भोली-भाली (निर्दोष) ईमान वाली महिलाओं पर आरोप लगाना।" इसे बुखारी (हदीस संख्याः 2615) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 89) ने रिवायत किया है।

तथा समुरा बिन जुन्दुब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः मैंने आज रात (सपने में) दो आदमियों को देखा जो मेरे पास आए और मुझे एक पवित्र धर्ती में ले गए। फिर (वहाँ से) हम चल पड़े यहाँ तक कि हम खून की एक नदी पर आए, जिसमें एक आदमी खड़ा हुआ था और नदी के किनारे एक आदमी था जिसके सामने एक पत्थर था। तो वह आदमी जो नदी के बीच में था (किनारे) आया और ज्यों ही वह बाहर निकलने का इरादा किया तो (किनारे खड़े) आदमी ने उसके मुंह पर पत्थर मारा और उसे उसी जगह लौटा दिया जहाँ वह पहले था। इस तरह वह जब भी बाहर निकलने के लिए आता तो वह आदमी उसके मुंह पर पत्थर मारता और वह जहाँ था वहीं वापस लौट जाता। इसपर मैंने कहाः यह क्या हैॽ उसने कहाः जिसे आप ने नदी में देखा था वह सूदखोर है।'' इसे बुखारी (हदीस संख्याः 1979) ने रिवायत किया है।

अतः आपको चाहिए कि इस काम से अल्लाह से पश्चाताप करें। लेकिन अगर यह ऋण क़र्जे हसन (एक अच्छे प्रकार का ऋण) है जिसमें सूद का प्रवेश नहीं होता, तो फिर उसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है।

दूसरा :

रही बात हज्ज की : तो जो व्यक्ति हाथ तंग होने के कारण स्वयं अपने ऊपर खर्च करने में सक्षम नहीं है तो उसके ऊपर हज्ज अनिवार्य नहीं है। लेकिन प्रश्न यह है कि दोनों में से कौन सी चीज़ बेहतर हैः हज्ज करना या ऋण को चुकाना?

सबसे सही विचार (राजेह) : यह है कि ऋण चुकाना प्राथमिकता रखता है, इसलिए कि ऋणी (देनदार) व्यक्ति पर हज्ज अनिवार्य नहीं है, क्योंकि हज्ज की शर्तों में से सामर्थ्य और सक्षमता का होना है।

यदि आपके हज्ज का मामला क़र्ज़ चुकाने के साथ टकरा जाए तो आप क़र्ज की चुकौती को प्राथमिकता दें। लेकिन यदि दोनों में कोई टकराव नहीं है जैसे कि भुगतान के समय में देरी है, या ऋणदाता अपने ऋण पर धैर्य करने वाला है तो सही मत यही है कि हज्ज या उम्रा करने में कोई आपत्ति की बात नहीं है।

शैखुल-इस्लाम इब्ने तैमिय्या (अल्लाह उन पर दया करे) फरमाते हैं :

“तंगदस्त ऋणी के लिए हज्ज करना जायज़ है यदि कोई दूसरा उसे हज्ज कराए और ऐसा करने में ऋण के हक़ की बर्बादी न हो, या तो उसके कमाई करने में असमर्थ होने की वजह से और या तो ऋणदाता (लेनदार) के अनुपस्थित होने के कारण जिसे कमाई से चुकाना संभव न हो।''

मजमूउल फतावा (16/26).

और यह सब परिपूर्ण सक्षमता की शर्त के साथ है, साथ ही साथ उन सभी के ऋण की चुकौती कर दी जाए जो आपसे तकाज़ा कर रहे हैं जबकि क़र्ज़ चुकाने की अवधि आ गई हो यदि आप एक से अधिक ऋणदाता के ऋणी हों, इसी तरह सवारी (परिवहन का साधन) तथा परितोष और यात्रा के दौरान अपने आपको ठीक रखने के लिए आवश्यक चीज़ें उपलब्ध हों तथा आप अपने परिवार, बाल-बच्चों को या जिनका खर्च आपके ऊपर अनिवार्य है उनकी उपेक्षा करने वाले न हों। इस प्रकार कि आप उनके लिए उनकी जरूरत भर की चीज़ें छोड़ कर जाएं। यदि आप ने ऐसा नहीं किया तो आप दोषी होंगे और उन लोगों की अनदेखी करने वाले होंगे जिनकी देखभाल को अल्लाह ने आपके लिए आवश्यक क़रार दिया है।

खैसमा से वर्णित है कि उन्हों ने कहा : हम अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा के साथ बैठे थे कि उनके पास उनका एक मुंशी आया और अंदर प्रवेश किया तो उन्हों ने पूछाः क्या गुलामों को उनका आहार दे दिए। उसने कहा नहीं। तो उन्हों ने कहाः जाओ और उन्हें दे दो। फिर कहा : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया हैः “आदमी के पापी होने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह जिसके आहार का मालिक हो उसका आहार रोक ले।'' सहीह मुस्लिम (हदीस संख्याः 996).

तथा इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "आदमी के पाप के लिए यह पर्याप्त है कि वह जिसकी रोज़ी का ज़िम्मेदार हो उसे बर्बाद कर दे।'' इसे अबू दाऊद (1692) ने रिवायत किया है।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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