शनिवार 10 ज़ुलक़ादा 1445 - 18 मई 2024
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सह्व के दो सजदों में और उन दोनों के बीच में क्या पढ़ना चाहिएॽ

प्रश्न

सह्व (विस्मृति) के दो सजदों में और उन दोनों सजदों के बीच में हमें क्या पढ़ना चाहिएॽ क्या हमें वही कहना चाहिए जो हम फ़र्ज़ नमाज़ में कहते हैंॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

जहाँ तक हम जानते हैं सह्व के दो सजदों में कहने के लिए कोई विशिष्ट ज़िक्र वर्णित नहीं है। इस आधार पर, उनका हुक्म नमाज़ के सजदों के हुक्म के समान है। इसलिए उनमें वही कहा जाएगा जो नमाज़ के सजदों में कहा जाता है, जैसे कि "सुब्हाना रब्बियल-आ'ला” (मेरा सर्वोच्च पालनहार बहुत पवित्र है), तथा दुआ की जाएगी ; क्योंकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "बंदा अपने पालनहार के सबसे क़रीब सजदे की अवस्था में होता है। इसलिए अधिक से अधिक दुआ करो।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 482) ने रिवायत किया है।

तथा प्रश्न संख्या : (7886) औऱ (39677) भी देखें। 

सह्व के दो सजदों के बीच वही कहा जाएगा जो नमाज़ के दो सजदों के बीच कहा जाता है, जैसे कि “रब्बिग़-फ़िर-ली” (ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे)।

प्रश्न संख्या (13340) देखें।

नववी ने “अल-मजमू'” (4/72) में कहा :

“सह्व के सजदे दो सजदे हैं, जिनके बीच में एक बैठक है। इस बैठक में इफ़तिराश (बाएं पैर को बिछाकर उस पर बैठने और दाहिने को खड़ा रखने) का आसन सुन्नत है। और उनके बाद वह तवर्रुक करेगा यहाँ तक कि सलाम फेर दे। इन दोनों सजदों की विधि आसन और ज़िक्र में नमाज़ के सजदों के समान है। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

उन्होंने “अश-शर्ह अल-कबीर” (4/96) में कहा :

“वह सह्व के सजदे में वही कहेगा जो नमाज़ के सजदे में कहता है, उसी पर क़ियास करते हुए।” उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा उन्होंने “असनल-मतालिब” (1/195) में कहा :

“सह्व के सजदे दो सजदे हैं... और उनका तरीक़ा नमाज़ के दो सजदों के समान है। वह उन दोनों के बीच में इफ़तिराश के आसन में बैठेगा और वह उनमें नमाज़ के सजदे के ज़िक्र को पढ़ेगा।” उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा “मुग़्नी अल-मुहताज” (1/439) में कहा गया है :

“और उन दोनों (सजदों) का तरीक़ा उसके अनिवार्य एवं एच्छिक चीज़ों में नमाज़ के सजदे के समान है, जैसे कि माथे को (ज़मीन पर) रखना और इतमिनान से करना ... और उनमें नमाज़ के सजदे का ज़िक्र करेगा...

अल-अज़रई ने कहा : और उन्होंने उन दोनों के बीच में कहे जाने वाले ज़िक्र के बारे में कुछ नहीं कहा। प्रत्यक्ष यही होता है कि वह मूल नमाज़ के दो सजदों के बीच के ज़िक्र के समान है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा “फतावा अल-लजना अद-दाईमा” (6/443) में आया है :

“सजदा करने वाला सह्व (भूलने) और क़ुरआन की तिलावत के सजदों में उसी तरह कहेगा, जो वह अपनी नमाज़ के दौरान सजदा करते समय कहता है : “सुब्हाना रब्बी अल-अला” (मेरा सर्वोच्च पालनहार बहुत पवित्र है)। इसमें अनिवार्य एक बार कहना है, और पूर्णता का न्यूनतम स्तर तीन बार कहना है। महत्वपूर्ण शरई दुआओं में से अल्लाह जो आसान कर दे सजदे में दुआ करना मुस्तहब है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

कुछ विद्वानों ने उल्लेख किया है कि इन दोनों सजदों में यह कहना मुस्तहब है : “सुब्हान मन ला यनामू वला यस्-हू।” (पवित्र है वह हस्ती जो न सोती है और न भूलती है।)

हाफ़िज़ इब्ने हजर ने “अत-तल्खीस” (2/12) में कहा : “मुझे इसका कोई आधार नहीं मिला।” उद्धरण समाप्त हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर