Mon 21 Jm2 1435 - 21 April 2014
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एक ही सफर में एक से अधिक व्यक्ति के लिए उम्रा करना

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प्रश्न: क्या एक से अधिक व्यक्ति के लिए उम्रा करना सही है ॽ ज्ञात रहे कि उम्रा करने वाला पहली बार उम्रा कर रहा है ॽ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

एक ही सफर में एक से अधिक बार उम्रा करना, चाहे वह अपनी तरफ से हो या किसी अन्य की ओर से, सुन्नत से प्रमाणित नहीं है और न ही सलफ (पूर्वजों) के तरीक़े से प्रमाणित है। क्योंकि मूल सिद्धांत यह है कि हर उम्रे के लिए एक अलग सफर है।

अतः जिस व्यक्ति ने उम्रा के लिए सफर किया वह अपने इस सफर में उसे एक बार ही करेगा, उसके हक़ में उसे अनेक बार करना धर्मसंगत नहीं है, सिवाय इसके कि वह मक्का से सफर करते हुए बाहर निकला हो फिर वहाँ वापस आया हो।

तथा इब्नुल क़ैयिम रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उम्रों में से एक भी उम्रा मक्का से बाहर निकल कर नहीं था, जैसाकि आजकल बहुत से लोग करते हैं, बल्कि आपके सभी उम्रे मक्का में प्रवेश करते हुए थे, तथा आप ने वह्य के उतरने के बाद मक्का में तेरह साल निवास किया, लेकिन आपके बारे में कहीं भी यह वर्णन नहीं किया गया है कि उस अवधि में आप ने मक्का से बाहर निकल कर उम्रा किया है। पता चला कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो भी उम्रा किया है और उसे धर्मसंगत करार दिया है वह मक्का में प्रवेश करने वाले का उम्रा है, न कि उस व्यक्ति का उम्रा जो उसमें मौजूद था फिर वह हरम की सीमा से बाहर निकल कर जाता है ताकि उम्रा करे। और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय काल में किसी ने भी ऐसा नहीं किया है, सिवाय अकेली आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के ; क्योंकि उन्हों ने उम्रा का तल्बिया पुकारा था, लेकिन वह मासिक धर्म से हो गईं तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें आदेश दिया तो उन्हों ने उम्रा पर हज्ज को दाखिल कर लिया और हज्ज क़िरान करने वाली हो गईं, और आप ने उन्हें बतलाया कि उनका बैतुल्लाह का तवाफ और सफा व मर्वा के बीच सई करना उनके हज्ज और उम्रा दोनों की तरफ से हो गया, तो उन्हों ने अपने दिल में यह सोचा कि उनकी साथ वालियाँ अलग अलग हज्ज और उम्रे के साथ लौटेंगी (क्योंकि वे हज्ज तमत्तुअ करनेवालियाँ थीं, और उन्हें मासिक धर्म नहीं आया था, और उन्हों ने क़िरान नहीं किया था) और वह अपने हज्ज के अंतर्गत उम्रे के साथ लौटेंगी, अतः आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनकी दिलजोई के लिए उनके भाई को हुक्म दिया कि उन्हें तनईम से उम्रा कराकर लायें, और आप ने स्वयं उस हज्ज में तनईम से उम्रा नहीं किया, और न ही आपके साथ मौजूद लोगों में से किसी ने किया।”

“ज़ादुल मआद” (2/89, 90) से समाप्त हुआ।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया :

कुछ लोग दूर दराज़ जगह से उम्रा करने के मक़सद से मक्का आते हैं, फिर वे उम्रा करते हैं और हलाल हो जाते हैं, फिर वे तनईम जाते हैं और फिर उम्रा करते हैं, अर्थात वह अपने सफर में कई एक उम्रा करता हैं, तो यह कैसा है ॽ

तो उन्हों ने उत्तर दिया :

“यह, अल्लाह तआला आपको आशीर्वाद दे, अल्लाह के दीन में बिद्अत (नवाचार) है, क्योंकि वह आदमी अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम से बढ़कर (भलाई का) अभिलाषी और उत्सुक नहीं है, और हम सभी जानते हैं कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के अंत में मक्का के अंदर एक विजयी के रूप में प्रवेश किए, और उन्नीस दिन मक्का में बने रहे और कभी भी तनईम की ओर नहीं निकले ताकि उम्रा का एहराम बाँधें, और इसी तरह सहाबा भी थे, अतः एक ही सफर में कई एक बार उम्रा करना बिद्अतों में से है।” इब्ने उसैमीन की बात समाप्त हुई।

“लिक़ाउल बाबिल मफतूह” (121/28)

तथा शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“तनईम से उम्रा का एहराम बाँधना, जहाँ से सैयिदा आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने एहराम बाँधा था, यह हुक्म आयशा और उनकी जैसी स्थिति वालों के साथ विशिष्ट है, और मैं तनईम से उम्रा को मासिक धर्म वाली औरत के उम्रा की संज्ञा देता हूँ, क्योंकि आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा जब हज्जतुल वदाअ के अवसर पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ हज्ज करने के लिए निकलीं, और उन्हों ने उम्रा का एहराम बाँधा था, तो जब वह मक्का के निकट एक स्थान पर पहुँचीं जिसे “सरिफ” के नाम से जाना जाता है, तो उनके पास पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आए तो उन्हें रोते हुए पाया, आप ने उन से पूछा : “तुम क्यों रो रही हो ॽ क्या तुम्हें मासिक धर्म आ गया है ॽ” उन्हों ने कहा : हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “यह तो एक ऐसी चीज़ है जिसे अल्लाह तआला ले आदम की बेटियों पर लिख दिया है, तो तुम वही सब करो जो हज्ज करनेवाला करता है, सिवाय इसके कि तुम तवाफ न करो और नमाज़ न पढ़ो।” चुनाँचे उन्हों ने न तवाफ किया और न नमाज़ पढ़ीं यहाँ तक कि अरफात में पवित्र हो गईं फिर उन्हों ने हज्ज के मनासिक का पालन किया और पूरा हज्ज किया, जब अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सफर करने और मदीना लौटने का इरादा किया तो आप उनके पास उनके खेमे में आए और फिर रोते हुए पाया, आप ने कहा : “तुझे क्या हुआ हैॽ” उन्हों ने कहा : मुझे क्या हुआ है ॽ लोग हज्ज और उम्रा के साथ लौटें और मैं बिना उम्रा के केवल हज्ज के साथ लौटूँ। क्योंकि उनके मासिक धर्म के कारण उनका उम्रा हज्ज इफ्राद में बदल गया था (शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसी को चयन किया है, जबकि उनके अलावा दूसरे विद्वानों ने इस बात को चयन किया है कि वह हज्ज क़िरान करने वाली हो गई थीं, हज्ज इफ्राद करने वाली नहीं थीं), तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनके ऊपर दया आई और आप ने उनके भाई अब्दुर्रहमान बिन अबू बक्र सिद्दीक़ को हुक्म दिया कि वह ऊँटनी पर अपने पीछे बिठाकर उन्हें तनईम ले जाएं, तो उन्हों ने ऐसा ही किया और वह वापस आईं और उम्रा किया, तो उनका दिल खुश हो गया, इसीलिए हम कहते हैं : जिस महिला को वही समस्या पेश आ जाए जो आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा को पेश आया था, कि वह मासिक धर्म से हो गईं और उन्हों ने उम्रा का एहराम बाँध रखा था, और वह उम्रा को मुकम्मल करने पर सक्षम न हो तो उसका उम्रा हज्ज में बदल जायेगा, अतः जो चीज़ उससे छूट गई उसकी छतिपूर्ति उसी ढंग से की जायेगी जिसे अल्लाह ने अपने पैगंबर की ज़ुबानी आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के लिए धर्मसंगत किया है, तो यह मासिक धर्मवाली औरत तनईम जायेगी और उम्रा करेगी, रही बात पुरूषों की तो अल्लाह का शुक्र है कि उन्हें मासिक धर्म नहीं आता है, तो फिर मासिकधर्म वाली औरत के प्रावधान से उनका क्या संबंध है ॽ और इसका प्रमाण यह है, जैसा कि पैगंबर की जीवननी (सीरत) और सहाबा के हालात के कुछ विद्वानों का कहना है, कि : रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ एक लाख सहाबा ने हज्ज किया, परंतु उनमें से किसी एक ने भी आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के उम्रा की तरह उम्रा नहीं किया।” अल्बानी की बात समाप्त हुई।

अतः जो व्यक्ति मक्का में है उसके लिए उम्रा का एहराम बाँधने के लिए तनईम जाना धर्मसंगत नहीं है, बल्कि उसके लिए धर्मसंगत यह है कि यदि वह किसी ज़रूरत के लिए मक्का से बाहर निकले, जैसे कि यदि वह मदीना, या जद्दा, या तायफ के लिए निकले . . . फिर वह मक्का वापस लौटने का इरादा करे, तो उसके लिए कोई आपत्ति की बात नहीं है कि वह उम्रा के साथ वापस लौटे।

तथा मक्का में उपस्थित उस व्यक्ति के लिए तनईम जाने की रूख्सत हो सकती है ताकि वह किसी दूसरे की ओर से उम्रा का एहराम बाँधे जो व्यक्ति दूर दराज़ जगह से आया है, उसे हरमैन शरीफैन के देश में प्रवेश करने के लिए वीज़ा और भारी खर्च की ज़रूरत होती है, और उसे नहीं पता कि उसे दुबारा इसका अवसर मिलेगा या नहीं ॽ

तो इस तरह के आदमी के लिए तनईम से किसी दूसरे की तरफ से उम्रा करने की रूख्सत हो सकती है, परंतु जिसके लिए मक्का लौटना आसान है तो वह एक ही सफर में एक से अधिक उम्रा नहीं करेगा, चाहे वह अपनी तरफ से हो या किसी दूसरे की ओर से।

दूसरा :

किसी दूसरे की ओर से उम्रा करना जायज़ है यदि वह दूसरा व्यक्ति बुढ़ापे (वयोवृद्धि) या ऐसी बीमारी की वजह से जिससे स्वस्थ्य होने की आशा नहीं है, असमर्थ और असक्षम हो, या वह मृतक हो, इस शर्त के साथ कि उम्रा करने वाला पहले अपना उम्रा कर चुका हो।

इफ्ता की स्थायी समिति के विद्वानों से प्रश्न किया गया कि :

मैं अल्लाह के पवित्र घर का उम्रा करना चाहता हूँ, और मेरा इरादा है कि जब मैं अपने उम्रा से फारिग हो जाऊँगा तो अपने माता पिता की ओर से उम्रा करूँगा - जबकि अल्लाह का शुक्र है कि वे दोनों जीवित हैं - और उन दोनों के माता पिता की ओर से भी उम्रा करुंगा - जबकि वे दोनों मृत्यु पा चुके हैं अल्लाह उन दोनों पर दया करे - क्या यह तरीक़ा मेरे लिए सही है या नहीं ॽ

तो उन्हों ने उत्तर दिया :

“यदि आप अपनी ओर से उम्रा कर चुके हैं तो आपके लिए अपने माता पिता की ओर से उम्रा करना जायज़ है यदि वे दोनो बुढ़ापे या ठीक न होने वाली बीमारी की वजह से असक्षम और असमर्थ हों। तथा आपके लिए अपने माता पिता के मृतक माता पिता की तरफ से भी उम्रा करना जायज़ है।” अंत हुआ।

“फतावा स्थायी समिति” (11/80-81).

तथा अधिक लाभ के लिए प्रश्न संख्या (111501) का उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
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