मंगलवार 5 रबीउलअव्वल 1440 - 13 नवंबर 2018
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नमाज़ के अंदर ऐसी क़मीज पहनने का हुक्म जिस पर कुछ लिखा हुआ हो

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प्रकाशन की तिथि : 25-01-2012

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प्रश्न

क्या इमाम के साथ नमाज़ के दौरान ऐसी क़मीज - जिस पर कुछ शब्द लिखे हुए हों – पहनना जाइज़ है ॽ

उत्तर का पाठ

सभी प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

अनेक प्रकार की छवियों, लिखावट और चिह्नों पर आधारित कपड़ों में नमाज़ पढ़ने के बारे के हुक्म के बारे में विस्तार है :

सर्व प्रथम :

यदि ये छवियाँ हराम और निषिद्ध चीज़ों जैसे - महिलाओं या सलीब (क्रास) की छवियाँ,या मुसलमानों के शत्रु देशों की प्रतिमाएं हैं,या जीवित चीज़ों के स्केच,या शराब और तंबाकू जैसे हराम खाद्य पदार्थों के चित्र हैं, तो दरअसल इनका पहनना ही हराम है, और इनमें नमाज़ पढ़ना और अधिक गंभीर है,क्योंकि ये छवियाँ स्वयं ही हराम हैं,अतः इन पर आधारित कपड़े पहनना विद्वानों के अधिक सही कथन के अनुसार जाइज़ नहीं है।

तथा प्रश्न संख्या (10439), (143709) के उत्तर देखिए।

दूसरा :

यदि ये कपड़े छवियों और चित्रों पर आधारित नहीं हैं,किंतु वे कुछ ऐसे वाक्यों और इबारतों पर आधारित हैं जो अवज्ञा -पाप- का आमंत्रण देते हैं,जैसेकि अंग्रेज़ी भाषा में “मुझे चुंबन कीजिए”, या इसी तरह वाक्यः “मेरे पीछे आईए” और इसी के समान अन्य वाक्य जिन्हें अश्लीलता के निमंत्रणकारी प्रयोग करते हैं,या जिनमें अक़ीदा के अंदर कोई खराबी है, तो इनका भी नमाज़ के बाहर पहनना हराम और निषिद्ध है,और इनके नमाज़ के अंदर पहनने की निषिद्धता और अधिक है,और उसके हराम होने का कारण प्रत्यक्ष है ;क्योंकि इसमें अश्लील कथन पाया जाता है,और प्रत्यक्ष बुराई है,और बुराई या कुफ्र का निमंत्रण है, जबकि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है :

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ وَمَنْ يَتَّبِعْ خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ فَإِنَّهُ يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ [النور: 21].

“ऐ ईमान वालो, शैतान के रास्ते (पदचिन्हों) की पैरवी न करो, जो व्यक्ति शैतान के रास्तों (पदचिन्हों की पैरवी करेगा, तो निःसंदेह वह अश्लीलता और बुराई का ही हुक्म देगा।” (सूरतुन्नूर : 21).

तीसरा :

यदि कपड़े छवियों (चित्रों) या हराम शब्दों से खाली हैं,किंतु वे बेल बूटों,रूपों, या अन्य इबारतों पर आधारित हैं,तो इनका हुक्म यह है कि उनमें देखा जायेगा कि :

1- यदि वह ऐसा है जो उसकी ओर देखने वाले के ध्यान को आकर्षित करता है,और उसका अधिक गुमान यह है कि वह उन नमाज़ियों को जो उसे देखते हैं उसके अंदर गौर करने में व्यस्त कर देगा तो उसके अंदर नमाज़ पढ़ना मक्रूह है,क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ के अंदर ध्यान को विचलित करने वाली चीज़ों से मना किया है,जैसाकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस में है कि:

“नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक ऐसी चादर में नमाज़ पढ़ी जिनमें चित्र बने हुए थे,तो आप ने उसकी चित्रों की ओर एक बार देखा,फिर जब आप नमाज़ से फारिग हुए तो फरमाया: मेरी यह धारीदार चादर अबू जह्म के पास ले जाओ और मेरे पास अबू जह्म की अंबजानी चादर लेकर आओ,क्योंकि इसने अभी मुझे मेरी नमाज़ से गाफिल कर दिया है।”

“खमीसा” रेशम या ऊन के धारीदार पोशाक को कहते हैं।

“आलाम” बेल बूटे और नक़्श व निगार (शिलालेख)।

“अंबजानियह” मोटा कपड़ा जिसमें बेल बूटे (शिलालेख) औरकढ़ाई न हो।

इस हदीस को बुखारी ने अपनी सहीह (हदीस संख्या : 373) में रिवायत किया है और उसके ऊपर यह शीर्षक लगाया है : “अध्याय यदि वह ऐसे कपड़े में नमाज़ पढ़े जिसमें नक़्श व निगार और बेल बूटे हों और उसकी ओर देखे।” तथा मुस्लिम ने अपनी सहीह (हदीस संख्या : 556) में रिवायत किया है और इमाम नववी रहिमहुल्लाह ने उसके ऊपर यह शीर्षक लगाया है : ऐसे कपड़े में नमाज़ पढ़ने के मक्रूह होने का अध्याय जिसमें नक़्श व निगार और बेल बूटे बने हों।

अल्लामा इब्ने दक़ीक़ अल-ईद रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“फुक़हा रहिमहुल्लाह ने इससे यह हुक्म निकाला है कि नमाज़ से ध्यान को फेरने वाली हर चीज़ जैसे – रंग,बेल बूटे,और चित्रकारी मक्रूह है,क्योंकि हुक्म इल्लत (कारण) के आम होने से आम हो जाता है,और वह इल्लत (कारण) नमाज़ से ध्यान को फेरना है।”“एहकामुल अहकाम” (पृष्ठ / 219).

तथा क़ुर्तुबी रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“इस हदीस के अंदर हर उस चीज़ से सुरक्षित रहना पाया जाता है जिसकी ओर देखना नमाज़ से ध्यान को विचलित कर देता है।” किताब “अल-मुफहिम लिमा अश्कला मिन तल्खीस मुस्लिम” (2/163).

तथा इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह फरमाते हैं:

“हर वह चीज़ जो नमाज़ी के ध्यान को उसकी नमाज़ से विचलित कर दे वह मक्रूह है . . . और जब इसने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ध्यान को - जबकि अल्लाह तआला ने आप का, गुनाहों से बचाव और खुशूअ के द्वारा, समर्थन किया था - विचलित कर दिया,तो आप के अलावा अन्य लोग इसके अधिक योग्य हैं।”“अल-मुग़नी” (2/72) से समाप्त हुआ।

तथा अल-बहूती अल-हंबली रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“हर उस चीज़ की ओर मुँह करना मक्रूह है जो उसे गाफिल कर दे, क्योंकि वह उसके ध्यान को उसकी नमाज़ को पूरा करने से विचलित कर देता है।”“कश्शाफुल क़नाअ” (1/307) से समाप्त हुआ।

तथा प्रश्न संख्या (90097) का उत्तर देखें।

2- लेकिन यदि उन बेल बूटों और –अवर्जित- शब्दों की मात्रा कम है, जिनकी ओर नमाज़ी आकर्षित नहीं होता है,या जिनके लोग अपने पोशाकों (पहनावे) में इस तरह आदी हो चुके हैं कि उसकी ओर देखने वाले के ध्यान को वह विचलित नहीं करता है, तो इसमें नमाज़ पढ़ना मक्रूह (घृणित) नहीं है ; क्योंकि उसमें मक्रूह होने का कारण समाप्त हो गया।

हरब ने फरमाया :

मैं ने इसहाक़ से रूमाल में नमाज़ पढ़ने के बारे में प्रश्न किया - और मैं ने उन्हें एक रूमाल दिखाया जिसमें हरे बेल बूटे और धारियाँ थीं ॽ

तो उन्हों ने कहा : जाइज़ है। इब्ने रजब की “फत्हुल बारी” (2/206) से समाप्त हुआ।

तथा शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“यदि अनुमानित कर लिया जाए कि इमाम के अंधा होने के कारण उसका ध्यान विचलित नहीं होगा,या इस कारण कि उसके ऊपर यह चीज़ बहुत बार गुज़री है यहाँ तक उसकी हालत यह हो गई है कि वह उस पर ध्यान नहीं देता है, तो उस पर नमाज़ पढ़ने के बारे में हम कोई आपत्ति हर्ज) नहीं समझते हैं।”“मजमूओ फतावा अश्शैख इब्ने उसैमीन” (12/362).

सारांश यह कि जिस क़मीज़ के बारे में प्रश्न किया गया है,यदि वह ऐसे लेखन पर आधारित है जो हराम नहीं है,किंतु वह धयान को आकर्षित करने वाला है,उसकी ओर देखने वाले के ध्यान को विचलित कर देता है, तो ऐसी स्थिति में उसके अंदर नमाज़ पढ़ना मक्रूह है, अन्यथा मक्रूह नहीं है।

लेकिन यदि वह लेखन निषिद्ध और हराम अर्थ पर आधारित है,तो उनका सिरे से पहनना ही जाइज़ नहीं है चाहे वह नमाज़ के बाहर हो या उसके अंदर।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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