रविवार 23 मुहर्रम 1441 - 22 सितंबर 2019
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एक हाजी ने अरफात से आकर तवाफ़े इफ़ाज़ा किया और मुज़दलिफ़ा नहीं आया या तवाफ़ करने के बाद आया।

प्रश्न

एक हाजी अरफात से वापस आया और तवाफ़े इफ़ाज़ा किया और एहराम से बाहर निकल गया। फिर वह मुज़दलिफा गया ताकि जमरात को कंकड़ी मारे, तो क्या उसका हज्ज सही हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

फुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की इस बात पर सर्वसहमति है कि तवाफ़े इफ़ाज़ा हज्ज के स्तंभों में से एक स्तंभ है जिसके बिना हज्ज परिपूर्ण नहीं होता है। तथा उन्हों ने उसके प्रथम समय के बारे में मतभेद किया हैः हनफिय्या और मालिकिय्या इस बात की ओर गए हैं कि वह यौमुन्नह्र (दसवीं ज़ुलहिज्जा) के फ़ज्र से आरंभ होता है और उससे पहले सही (मान्य) नहीं होगा।

“बदाएउस्सनाए” (२/१३२) [हनफ़ी] में कहा गया है की : “रही बात इस तवाफ़ के ज़माना की, जो कि उसका समय है : तो उसका प्रथम समय क़ुर्बानी के दिन दूसरी सुबह (फज्रे-सादिक़) के उदय होने से आरंभ होता है, इस बारे में हमारे साथियों के बीच कोई मतभेद नहीं है, यहाँ तक कि उससे पहले करना जायज नहीं है।

तथा इमाम शाफ़ेई ने कहा: उसका प्रथम समय क़ुर्बानी की रात को आधी रात है।”

उद्धरण समाप्त हुआ।

अस-सावी ने “बुलग़तुस-सालिक” [मालिकी] में कहा : "(और उसका समय) अर्थात तवाफ़े इफ़ाज़ा का समय (क़ुर्बानी के दिन फज्र के उदय होने से) शुरू होता है। अतः उससे पहले मान्य नहीं है (जमरतुल अक़बह की तरह) अर्थात उसके जमरह को कंकड़ी मारने का तरह, चुनाँचे फज्र के उदय होने से पहले तवाफ़े इफ़ाज़ा करना मान्य नहीं है।" उद्धरण समाप्त हुआ।

शाफेइय्या और हनाबिला इस बात की ओर गए हैं कि यह क़ुर्बानी की आधी रात से सही (मान्य) है।

अन-नववी रहिमहुल्लाह [शाफेई] ने कहा : “जमरतुल अक़बह को कंकड़ी मारने और तवाफ़े इफ़ाज़ा करने का समयः क़ुर्बानी की आधी रात से शुरू होता, बशर्ते कि उससे पहले अरफात के मैदान में ठहरा हो।

रही बात सिर मुंडाने कीः तो अगर हम यह कहते हैं कि : वह एक नुसुक (अनुष्ठान) है; तो वह भी जमरतुल अक़बह को कंकड़ी मारने और तवाफ़े इफाज़ा करने की तरह है। अन्यथा, उसका समय कंकड़ी मार लेने या तवाफ़ इफ़ाज़ा कर लेने से प्रवेश करेगा। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।” “अल-मज्मू (8/191)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह [हंबली] ने कहा : “इस तवाफ़ का दो समय हैः प्रतिष्ठा का समय और पर्याप्त होने का समय

... प्रतिष्ठा का समय : क़ुर्बानी का दिन, कंकड़ी मारने, क़ुर्बानी करने और सिर मुंडाने के बाद है।

रही बात पर्याप्त होने (वैध होने) के समय की : तो उसका प्रथम समय क़ुर्बानी की रात को आधी रात से है। यही बात शाफ़ेई ने भी कही है।

अबू हनीफा ने कहा: उसका प्रथम समय क़ुर्बानी के दिन फ़ज्र का उदय होना है, और उसका अंतिम समय क़ुर्बानी का अंतिम दिन है।” “अल-मुगनी (3/226)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

इस आधार पर, यदि इस हाजी ने तवाफ़े इफ़ाज़ा आधी रात के बाद किया हैः तो शाफेइय्या और हनाबिला के मतानुसार उसका तवाफ सही (मान्य) है।

मध्यरात्रि को मग़्रिब और फज्र के बीच के समय की गणना करके और उसे दो से विभाजित करके जाना जा सकता है।

और यदि उसका तवाफ़ आधी रात से पहले हुआ हैः तो सर्वसहमति के साथ वह सही व मान्य नहीं है, और उसका हज्ज पूरा नहीं हुआ था, और उसे दूसरा तहल्लुल प्राप्त नहीं हुआ था (अर्थात पूर्णतया एहराम की पाबंदी से बाहर नहीं निकला था)। इसलिए उसके लिए तवाफ़े इफाज़ा को दोहराना ज़रूरी है।

दूसरा:

मुज़दलिफा में रात बिताना जमहूर विद्वानों के निकट वाजिब (अनिवार्य) है, जबकि कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि वह एक रुक्न (स्तंभ) है।

फिर मुज़दलिफ़ा में रात बिताने की अनिवार्य मात्रा के बारे में कई कथनों पर मतभेद किया गया है :

“शाफेइय्या और हनाबिला के निकटः मुज़दलिफ़ा में उपस्थित होना अनिवार्य है चाहे एक पल ही के लिए हो, बशर्ते कि वह अरफह में ठहरने के बाद रात के दूसरे अर्ध में हो। तथा ठहरना शर्त नहीं है, बल्कि मात्र वहाँ से गुज़रना पर्याप्त है।

जो व्यक्ति आधी रात से पहले मुज़दलिफा से रवाना हो गया, और फिर फज्र से पहले वहाँ वापस लौट आया : तो उस पर कुछ भी अनिवार्य नहीं है; क्योंकि उसने कर्तव्य को पूरा किया है। यदि वह आधी रात के बाद वापस नहीं आया यहाँ तक कि फज्र उदय हो गयाः तो उसपर, सबसे राजेह (सही) कथन के अनुसार, एक दम (बलिदान) अनिवार्य है।

हनफिय्या के निकटः फ़ज्र उदय होने के बाद सूरज निकलने तक मुज़दलिफा में ठहरना आवश्यक (वाजिब) है, और उसके लिए उस समय में ठहरना अनिवार्य है चाहे एक क्षण ही के लिए हो। यदि उसने किसी उज़्र (कारण) से ठहरना छोड़ दिया तो उसपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है। उज़्र जैसे उसे कमज़ोरी या कोई बीमारी हो या कोई महिला हो जो भीड़ से डरती हो।

और अगर उसने मुज़दलिफ़ा से उससे पहले बिना किसी उज़्र के प्रस्थान किया है, तो उस पर एक दम (बलिदान) अनिवार्य है।

और यह स्पष्ट है कि अगर वह सूरज उगने से पहले मुज़दलिफा में वापस जाकर ठहर जाता है, तो उससे दम (बलिदान) समाप्त हो जाएगा।

मालिकिय्या के निकटः मुज़दलिफ़ा में कजावा रखने की मात्रा में उतरना वाजिब (अनिवार्य) है – भले ही वास्तव में कजावा न रखा जाए-, यदि कोई व्यक्ति कजावा रखने के बराबर वहाँ नहीं ठहरा यहाँ तक कि फज्र उदय हो गया तो उसपर दम अनिवार्य है, सिवाय इसके कि कोई उज़्र (वैध कारण) हो। यदि वह किसी उज़्र कि वजह से वहाँ नहीं उतरा है तो उस पर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है।” “अल-मौसूअतुल फ़िक़्हिय्या (11/108)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

इस आधार पर, यदि यह हाजी पहले मुज़दलिफ़ा नहीं आया था, बल्कि उसने आधी रात के बाद तवाफ़े इफाज़ा किया। फिर वह मुज़दलिफा लौट आया और आधी रात के बाद वहाँ से गुज़रा, तो उसपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है।

अगर वह तवाफ़ के बाद मुजदलिफा किसी ऐसे उज़्र की वजह से नहीं आया था जो उसके लिए वहाँ रात बिताना त्यागने की अनुमित देता है, जैसे कि कोई ऐसी बीमारी जिसके चलते वह मुज़दलिफ़ा में बैठने में सक्षम नहीं रहता है, तो उस पर दम अनिवार्य नहीं है। और यदि वह बिना किसी उज़्र के वहाँ नहीं आया थाः तो उस पर दम अनिवार्य है।

खतीब अश-शरबीनी ने “मुग्नी अल-मुहताज” (2/265) में कहा: “रही बात उज़्र वाले व्यक्ति की, तो जो कुछ मिना में रात बिताने के बारे में आएगाः उसपर निश्चित रूप से दम अनिवार्य नहीं है।

क्षम्य लोगों में से : वह व्यक्ति भी है जो अरफा में रात के समय आया और वहाँ ठहरने में व्यस्त होकर (मुज़दलिफा नहीं आ सका)। और जो व्यक्ति अरफा से मक्का आया और रुक्न (इफ़ाज़ा) का तवाफ़ किया और मुज़दलिफ़ा आना छूट गया।

अल-अज़रई ने कहा: इसे ऐसे व्यक्ति के अर्थ में लेना चाहिए जिसके लिए बिना कष्ट के मुज़दलिफ़ा जाना संभव नहीं है।

यदि उसके लिए संभव है, तो ऐसा करना अनिवार्य है, दोनों वाजिब को एकत्रित करते हुए, और यह स्पष्ट है।

और इसी में से : यह भी है कि अगर महिला को मासिक धर्म या निफास (प्रसव) के आने का डर हो, तो वह जल्दी से मक्का जाकर तवाफ़ कर ले।” उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा “अल-मजमू (8/153)” देखें।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से पूछा गया : जो व्यक्ति मुज़दलिफा में रात नहीं बिताया उसका क्या हुक्म हैॽ

तो उन्होंने उत्तर दिया : “जिसने मुज़दलिफा में रात नहीं बताया : उसने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अवज्ञा की, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

 فَإِذَا أَفَضْتُمْ مِنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا الله عِنْدَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ

سورة البقرة: 199  

“फिर जब तुम अरफ़ात से वापस आओ तो 'मशअरे हराम' के निकट ठहरकर अल्लाह को याद करो।” (सूरतुल बक़राः 199)

और 'मशअरे हराम' मुज़दलिफा को कहते हैं।  अतः जब उसने मुज़दलिफ़ा में रात नहीं गुज़ारी, तो उसने अल्लाह की अवज्ञा की और उसने पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की भी अवज्ञा की क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नें मुज़दलिफा में रात गुज़ारी और फरमायाः “मुझ से अपने मनासिक (हज व उम्रा के कार्यों को) सीख लो।” और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी को मुज़दलिफा में रात न गुज़ारने की छूट नहीं दी, सिवाय कमज़ोर लोगों के जिन्हें आपने मुज़दलिफा से रात के अंत में प्रस्थान करने की अनुमति प्रदान की।

और उसपर विद्वानों के यहाँ एक फिद्या अनिवार्य है जिसे वह मक्का में ज़बह करके वहाँ के गरीबों में वितरित कर देगा।” “मजमूओ फतावा अश-शैख इब्ने उसैमीन (23/97)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

तीसरा:

यदि इस हाजी ने तवाफ़े इफ़ाज़ा किया था, फिर हलाल हो गया (एहराम खोल दिया) अर्थात सिर के बाल मुंडा लिए या छोटे करवालिए, फिर सिला हुआ कपड़ा पहन लिया, तो उसपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है; क्योंकि छोटा तहल्लुल तीन चीज़ों : कंकड़ी मारने, सिर के बाल मुंडाने या कटवाने और तवाफ में से, दो चीज़ें करने से प्राप्त होता है।

और अगर उसने तवाफ किया था, फिर सिर के बाल मुंडाने या उसे छोटा करवाने से पहले उसने सिले हुए कपड़े पहन लिए थे, तो उसने एक निषिद्ध कार्य किया।

लेकिन अगर वह अज्ञानी थाः तो उसपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं है।

इसी तरह वह भी है जिसने अज्ञानता में सुगंध इस्तेमाल कर लिया यह सोचते हुए कि वह एहराम से हलाल हो गया है।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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