बुधवार 11 रबीउलअव्वल 1442 - 28 अक्टूबर 2020
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नवजात बच्चे के अक़ीक़ा के क्या नियम हैंॽ

प्रश्न

नौ मौलूद बच्चे के लिए अक़ीक़ा के क्या नियम हैंॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

अक़ीक़ा : उस ज़बीह़ा (बलिदान) को कहते हैं जो नवजात शिशु की ओर से उसके जन्म के सातवें दिन ज़बह किया जाता है। अक़ीक़ा जाहिलिय्यत (अज्ञानता) के काल में अरबों के यहाँ सर्वज्ञात था। अल-मावर्दी ने कहा : रही बात अक़ीक़ा की, तो यह एक बकरी है जो जन्म के समय ज़बह की जाती थी। इस्लाम से पहले अरबों के यहाँ इसका प्रचलन था।”

“अल-हावी अल-कबीर” (15/126)।

अक़ीक़ा की वैधता नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित सहीह हदीसों में साबित है, जिनमें निम्नलिखित हदीसें शामिल हैं :

1- बुरैदा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : (जाहिलिय्यत के काल में हमारी यह स्थिति थी कि अगर हम में से किसी के यहाँ कोई लड़का पैदा होता था, तो वह एक बकरी ज़बह करता और उसके खून से उस (बच्चे) के सिर को लथेड़ देता था। जब अल्लाह की कृपा से इस्लाम आ गया, तो हम एक बकरी ज़बह करते थे और उसके सिर को मूँडते थे और उसपर ज़ाफरान (केसर) मलते थे।”

इस हदीस को अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2843) ने रिवायत किया है और शैख अल्बानी ने “सहीह अबी दाऊद” में इसे सहीह करार दिया है।

ज़ाफरान : एक प्रकार का सुगंध (इत्र) है।

2- सलमान बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “लड़के के साथ एक अक़ीक़ा है। अतः उसकी ओर से खून बहाओ और उससे गंदगी को दूर करो।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 5154) ने रिवायत किया है।

नवजात बच्चे (पुरुष) की ओर से दो भेड़-बकरी ज़बह करना और नवजात बच्ची (मादा) की ओर से एक भेड़-बकरी ज़बह करना धर्म संगत है, जैसा कि सही और स्पष्ट प्रमाणों से इसका पता चलता है, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :

1- उम्मे कुर्ज़ से वर्णित है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अक़ीक़ा के बारे में पूछा, तो आप ने फरमाया : “बच्चे की ओर से दो बकरियाँ, तथा बच्ची की ओर से एक बकरी है, इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा कि वह भेड़-बकरी नर हो या मादा।”

इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 1516) ने रिवायत किया है और कहा है कि : यह हदीस हसन सहीह है। तथा नसाई (हदीस संख्या : 4217) ने रिवायत किया है और शैख अल्बानी ने इसे “इर्वाउल-ग़लील” (4/391) में सहीह कहा है।

2- आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने : “उन्हें लड़के की ओर से दो समकक्ष बकरियाँ और लड़की की ओर से एक बकरी ज़बह करने का आदेश दिया।”

इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 1513) ने रिवायत किया है और कहा है कि : यह हसन सहीह है। तथा शैख अलबानी ने इसे “सहीह अत-तिरमिज़ी” में सहीह क़रार दिया है।

ये हदीसें अक़ीक़ा में नर और मादा के बीच अंतर को दर्शाने में स्पष्ट हैं।

अल्लामा इब्नुल-क़ैयिम ने नर और मादा के बीच इस अंतर का कारण इन शब्दों में उल्लेख किया है :

“यह शरीयत का नियम है। क्योंकि अल्लाह महिमावान् ने पुरुष और महिला के बीच अंतर किया है और महिला को विरासत, रक्त धन, गवाही, आज़ादी और अक़ीक़ा में पुरुष का आधा क़रार दिया है, जैसा कि तिर्मज़ी ने उमामह की हदीस से रिवायत किया है और सहीह करार दिया है, कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “जिस मुसलमान ने भी किसी मुसलमान को आज़ाद किया, वह उसके लिए आग (जहन्नम) से मुक्ति का कारण होगा; उस आज़ाद किए गए व्यक्ति का प्रत्येक अंग इस आज़ाद करने वाले के एक अंग के लिए पर्याप्त होगा। और जो भी मुसलमान व्यक्ति दो मुस्लिम महिलाओं को मुक्त करेगा, तो वे दोनों उसके लिए (जहन्नम की) आग से मुक्ति का कारण होंगी, उन दोनों का प्रत्येक अंग, इसके एक अंग के लिए पर्याप्त होगा।” इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 1547) ने रिवायत किया है। तो अक़ीक़ा में वरीयता भी इसी के समान है अगरचे उसके बारे में कोई स्पष्ट सुन्नत (हदीस) न होती, फिर उस समय कैसे ने हो जबकि प्रमाणित हदीसें वरीयता के बारे में स्पष्ट हैं।” उद्धरण समाप्त हुआ।

“तोहफ़तुल-मौदूद” (पृष्ठ : 53-54).

तथा इब्नुल-क़ैयिम ने यह भी कहा :

“अल्लाह महिमावान् ने पुरुष को स्त्री पर वरीयता दी है, जैसा कि उसका फरमान है :

 وَلَيْسَ الذَّكَرُ كَالْأُنْثَى  آل عمران :36 

“और पुरुष, स्त्री की तरह नहीं है।” (सूरत आल-इमरान : 36), और इस वरीयता और अंतर की अपेक्षा यह है कि : शरीयत के अहकाम (नियमों और प्रावधानों) में पुरुष को स्त्री पर प्राथमिकता दी जाए। और शरीयत में इस वरीयत का प्रतीक यह है कि पुरुष को गवाही, विरासत और दीयत (रक्त धन, खून-बहा) में दो महिलाओं के समान ठहराया गया है। तो इसी तरह अक़ीक़ा को भी इन्हीं अहकाम के साथ मिला दिया गया है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

“ज़ादुल मआद” (2/331)

फायदा :

इब्नुल-क़ैयिम रहिमहुल्लाह ने कहा, जिसका सारंश यह है :

“अक़ीक़ा के लाभों में से यह है कि : यह एक ऐसी क़ुर्बानी (भेंट) है जो नवजात शिशु की ओर से उसके इस दुनिया में आने के प्रथम समय में पेश की जाती है ...

तथा उसके लाभों में से यह भी है कि : वह नवजात शिशु के बंधन को खोल देता है, क्योंकि वह अपने माता-पिता के लिए सिफारिश करने के लिए अपने अक़ीक़े का बंधक है।

तथा उसके लाभों में से यह भी है कि : वह एक फ़िद्या (फिरौती) है जिसके बदले नवजात शिशु को छुड़ाया जाता है, जैसे कि अल्लाह ने इसमाईल अलैहिस्सलाम को मेंढे के बदले छुड़ाया।” उद्धरण समाप्त हुआ।

“तोहफ़तुल-मौदूद” (पृष्ठ : 69).

अक़ीक़ा के लिए सबसे बेहतर समय जन्म के सातवें दिन है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “हर बच्चा अपने अक़ीक़ा के बदले गिरवी रखा हुआ है, जिसे सातवें दिन उसकी ओर से ज़बह किया जाएगा, तथा उसका सिर मूँडा जाएगा और उसका नाम रखा जाएगा।” इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 2838) ने रिवायत किया है और शैख अलबानी ने “सहीह अबू दाऊद” में उसे सहीह क़रार दिया है।

यदि उसमें सातवें दिन से देरी हो जाए, तो उसमें कोई हर्ज की बात नहीं है, और जब भी मुसलमान ऐसा करने में सक्षम हो, उसे ज़बह किया जा सकता है।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर