36902: दुआ के कुछ शिष्टाचार


दुआ के आदाब (शिष्टाचार) और उसकी कैफियत (मांगने का तरीक़ा) क्या हैॽ उसके वाजिबात (अनिवार्य चीज़ें) और उसकी सुन्नतें क्या हैंॽ उसे कैसे आरंभ किया जाए और कैसे उसका समापन किया जाएॽ क्या सांसारिक मामलों से संबंधित प्रश्न को आख़िरत से संबंधित मांग पर प्राथमिकता दे सकते हैंॽ
तथा दुआ में हाथ उठाना कहाँ तक सही है और यदि हाथ उठाना सही है तो उसका क्या तरीक़ा हैॽ

Published Date: 2017-06-04

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथमः

अल्लाह तआला पसंद करता है कि उससे सवाल किया जाए, और हर चीज़ उसी से मांगी जाए, बल्कि जो अल्लाह से नहीं मांगता, अल्लाह तआला उसपर नाराज़ होता है। तथा अल्लाह तआला अपने बन्दों से अपेक्षा करता है कि वे उससे मांगें और सवाल करें। अल्लाह तआला का फरमान हैः

( وقال ربكم ادعوني أستجب لكم ) [غافر:60] .

‘‘और तुम्हारे रब (पालनहार) ने कह दिया है कि मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआ स्वीकार करूंगा।'' (सूरत ग़ाफिर : 60)

अल्लाह से दुआ मांगने का इस्लाम धर्म में बहुत ऊॅंचा व बुलंद स्थान है, यहाँ तक कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान है किः ''दुआ (ही) उपासना है।''

इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 3372), अबू दाऊद (हदीस संख्याः 1479) और इब्ने माजा (हदीस संख्याः 3828) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 2590) में सहीह कहा है।

दूसराः

दुआ के आदाब (शिष्टाचार):

1- दुआ करने वाला व्यक्ति अल्लाह तआला को उसकी रुबूबियत, उसकी उलूहियत और उसके अस्मा व सिफ़ात (नामों और गुणों) में अकेला मानने वाला हो और उसका दिल तौहीद (एकेश्वरवाद) से भरा हुआ हो। चुनाँचे अल्लाह तआला के दुआ को स्वीकार करने की शर्त यह है किः बन्दा अपने पालनहार की आज्ञा का पालन करे और उसकी अवज्ञा (नाफरमानी) करने से दूर रहे, अल्लाह तआला का फरमान हैः

 (وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ فَلْيَسْتَجِيبُوا لِي وَلْيُؤْمِنُوا بِي لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ) [ البقرة: 186]

''और जब आप से मेरे बन्दे मेरे बारे में प्रश्न करें तो (आप उन्हें बतला दें कि) मैं बहुत ही निकट हूँ, जब पुकारने वाला मुझे पुकारे तो मैं उसकी दुआ क़बूल करता हूँ, अतः लोगों को भी चाहिए कि वे मेरी बात मानें और मुझ पर ईमान लाएं ताकि वे सही मार्ग पाएं।'' (सूरतुल बक़रा : 186).

2- दुआ में अल्लाह तआला का इख़्लास हो, अल्लाह तआला का फरमान हैः

( وما أمروا إلا ليعبدوا الله مخلصين له الدين حنفاء ) البينة/5

"उन्हें इस के सिवाय कोई हुक्म नहीं दिया गया कि केवल अल्लाह की इबादत करें, उसी के लिए धर्म (उपासना) को खालिस करते हुए, यकसू (एकाग्र) हो कर।" (सूरतुल बैयिना : 5)

और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान के अनुसार दुआ ही इबादत (उपासना) है। इसलिए दुआ की कुबूलियत (स्वीकृति) के लिए इख्लास (शुद्धहृदयता) का होना शर्त है।

3- अल्लाह तआला से उसके अच्छे-अच्छे नामों का वास्ता देकर मांगा जाए, अल्लाह तआला का फरमान हैः

( ولله الأسماء الحسنى فادعوه بها وذروا الذين يلحدون في أسمائه ) الأعراف/180

"और अच्छे अच्छे नाम अल्लाह ही के लिए हैं, अतः तुम उसे उन्हीं नामों से पुकारो। और ऐसे लोगों से संबंध भी न रखो जो उसके नामों में सत्य मार्ग से हटते हैं (या टेढ़ापन करते हैं), उनको उनके किए का दण्ड अवश्य मिलेगा।" (सूरतुल-आराफ़ : 180)

4- दुआ करने से पहले अल्लाह तआला की उसकी महिमा के अनुकूल प्रशंसा करना। तिर्मिजी (हदीस संख्याः 3476) ने फज़ालह बिन उबैद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है, वह कहते हैं : हम अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ बैठे हुए थे कि एक आदमी आया और उसने नमाज़ पढ़ी, और दुआ करते हुए कहाः अल्लाहुम्मग़-फिर्ली वर्-हम्नी (ऐ अल्लाह! मुझे माफ कर दे, और मुझ पर दया कर), तो पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ''ऐ नमाजी! तुमने जल्दबाजी से काम लिया। जब तुम नमाज़ में तशह्हुद के लिए बैठो, तो पहले अल्लाह की उसकी महिमा योग्य प्रशंसा करो, और मुझ पर दरूद पढ़ो, फिर अल्लाह से दुआ करो।''

और तिर्मिज़ी ही की एक और रिवायत (हदीस संख्याः 3477) में है किः ''जब तुम में से कोई नमाज़ पढ़े तो सबसे पहले अल्लाह तआला की प्रशंसा और स्तुति बयान करे, फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजे, फिर इस के बाद जो चाहे दुआ मांगे।'' रावी (हदीस के वर्णनकर्ता) कहते हैं कि : इस के बाद एक और व्यक्ति ने नमाज़ पढ़ी, तो उसने अल्लाह तआला की स्तुति बयान की, फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजा, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उससे कहाः ''ऐ नमाजी! अब दुआ मांग, तेरी दुआ स्वीकार  की जाए गी।'' इस हदीस को अल्बानी रहिमहुल्लाह ने सही तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 2765, 2767) में सहीह क़रार दिया है।

5- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमान है: ''प्रत्येक दुआ स्वीकृति से वंचित रहती है, जब तक कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद न पढ़ा जाए।'' इस हदीस को तब्रानी ने ''अल-औसत'' (1/220) में रिवायत किया है और शैख अल्बानी ने इसे ''सहीहुल जामिअ'' (हदीस संख्याः 4399) में सहीह क़रार दिया है।

6- क़िब्ला की ओर मुँह करके दुआ करना, सहीह मुस्लिम (हदीस संखयाः 1763) में उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने कहाः जब बद्र की लड़ाई के दिन अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुश्रिकीन को देखा कि उनकी संख्या एक हज़ार है और आप के साथियों की संख्या 319 है, तो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कि़ब्ला की ओर रुख किया फिर आप ने अपने दोनों हाथ फैलाए और अपने पालनहार से विनती करने लगेः ''ऐ अल्लाह! मुझ से किया हुआ वादा पूरा फरमा, ऐ अल्लाह! मुझे से किया हुआ वादा पूरा फरमा। ऐ अल्लाह अगर आज तूने मुसलमानों की इस जमाअत का सफाया कर दिया तो ज़मीन पर तेरी पूजा न की जाएगी।'' आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लगातार अपना हाथ उठाए, क़िब्ला की ओर मुँह किए अपने पालनहार को पुकारते रहे, यहाँ तक कि आपकी चादर आपके कंधों से गिर गई . . . हदीस।

इमाम नववी रहिमहुल्लाह सहीह मुस्लिम की शर्ह में कहते हैं : ''इस हदीस से यह मालूम होता है कि दुआ करते समय क़िब्ला रुख होना और दोनों हाथों को उठाना मुस्तहब है।''

7- दोनों हाथों को उठाकर दुआ करना चाहिए, अबू दाऊद (हदीस संख्याः 1488) ने सलमान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ''बेशक तुम्हारा रब तबारका व तआला बड़ा हयादार (लज्जावान) और दानशील है, जब उसका बंदा उसकी तरफ अपना हाथ उठाकर दुआ मांगता है तो उसे उन्हें खाली लौटाते हुए हया (लज्जा) आती है।'' इस हदीस को शैख अल्बानी ने ''सहीह अबू दाऊद'' (हदीस संख्याः 1320)  में सहीह क़रार दिया है।

और हथेली का भीतरी भाग आकाश की ओर हो,  एक  गरीब विनम्र मांगनेवाले व्यक्ति की तरह जो दिए जाने का इंतजार करता है। अबू दाऊद (हदीस संख्याः 1486) ने  मालिक बिन यसार रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ''जब तुम अल्लाह से मांगो तो अपनी हथेलियों के भीतरी भाग से मांगो, हथेली के पीछे वाले भाग से न मांगो।'' इस हदीस को शैख अल्बानी ने ''सहीह अबू दाऊद'' (हदीस संख्याः 1318) में सहीह क़रार दिया है।

अब सवाल यह है कि क्या वह अपने दोनों हाथों को  उन्हें उठाते समय मिलाकर रखेगा या उन दोनो के बीच अंतराल (गैप) रखेगा?

तो इस बारे में शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने ‘‘अश्शर्हुल मुम्तिअ’’ (4/25) में स्पष्ट रूप से वर्णन किया है कि वे (दोनों हाथ) मिले हुए होंगे। उनके शब्द यह हैं :  ‘‘रही बात दोनों हाथों के बीच अंतराल  और दूरी रखने की तो इससे संबंधित सुन्नत (हदीस) में या विद्वानों के वक्तव्य में कोई आधार मैं नही जानता।’’ अन्त हुआ।

8- अल्लाह ताला के प्रति दुआ के स्वीकार करने का पूरा विश्वास, और दिल की उपस्थिति के साथ दुआ मांगना। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः (अल्लाह से इस हाल में दुआ करो कि तुम्हें उसकी स्वीकृति का यक़ीन हो, और यह याद रखो कि अल्लाह तआला किसी बेसुध और लापरवाह दिल की दुआ स्वीकार नहीं करता है।) इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 3479) ने रिवायत किया है और शैख अल्बानी ने इसे सही तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 2766) में हसन कहा है।

9- अधिक से अधिक दुआ करना, चुनाँचे बन्दा अपने पालनहार से लोक और परलोक की भलाइयों में से जे चाहे मांगे, खूब गिड़गिड़ा कर मांगे, दुआ की स्वीकृति के लिए जल्दी न मचाए। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः ''जब तक कोई बंदा पाप या रिश्ते-नाते काटने की दुआ न करे तब तक उसकी दुआ स्वीकार की जाती है, बशर्ते कि जल्दी न मचाए।'' कहा गयाः ''जल्दी मचाना क्या है?'' तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ''मैं ने दुआ की, मैं ने दुआ की। पर मैं नहीं समझता की मेरी दुआ स्वीकार होती है, तो उस समय वह निराश हो जाता है और दुआ करना छोड़ देता है।'' इसे बुखारी (हदीस संख्याः 6340)  और मुस्लिम (हदीस संख्याः 2735) ने रिवायत किया है।

10- सुदृढ़ता और निश्चितता के साथ दुआ करे, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः (तुम में से कोई यह न कहेः ''ऐ अल्लाह! यदि तू चाहे तो मुझे माफ कर दे, ऐ अल्लाह यदि तू चाहे तो मुझ पर दया कर। बल्कि दृढ़ता के साथ मांगे। क्योंकि अल्लाह को कोई मजबूर नहीं कर सकता है।'' इसे बुखारी (हदीस संख्याः 6339) मुस्लिम (हदीस संख्याः 2679) ने रिवायत किया है।

11- विलाप, विनम्रता, अल्लाह की दया की चाहत और उसकी यातना के डर की भावना के साथ दुआ करना, अल्लाह तआला का फरमान हैः

( ادعوا ربكم تضرعاً وخفية ) الأعراف/55

''अपने पालनहार को गिड़गिड़ा कर और चुपके से पुकारो।'' (सूरतुल आराफः 55)

इसी तरह अल्लाह का फरमान हैः

( إنهم كانوا يسارعون في الخيرات ويدعوننا رغباً ورهباً وكانوا لنا خاشعين ) الأنبياء/90

''बेशक वे नेकियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते और हमें आशा और भय के साथ-पुकारते थे,  और वे हमसे डरते थे।'' (सूरतुल अंबियाः 90)

इसी तरह कहाः

( واذكر ربك في نفسك تضرعاً وخيفة ودون الجهر من القول بالغدو والآصال ) الأعراف/205

''और अपने पालनहार को अपने मन में विनम्रता और डर से सुबह और शाम याद करें और जोर के बिना भी और गाफिलों  में से ना हो जाएं।'' (सूरतुल आराफः 205)

12- दुआ को तीन बार दुहराना चाहिए। बुखारी (हदीस संख्याः 240) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 1794) ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने वर्णन कियाः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बैतुल्लाह (काबा) के पास नमाज़ पढ़ रहे थे, जबकि अबु जह्ल अपने साथियों के साथ (वहीं) बैठा था। पिछले दिन ऊंट काटे गए थे। तो अबू जह्ल ने कहाः कौन है जो अमुक जनजाति वालों के ऊंटों की ओझड़ियाँ उठाकर लाए और जब मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सज्दे में जाएं तो उसे आपकी पीठ पर डाल दे। यह सुनकर क़ौम का सबसे अभागा व्यक्ति उठा और उसे ले आया। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सज्दे में गए तो ओझड़ी को आप के दोनों कंधों के बीच में रख दिया। रावी कहते हैं : फिर वे लोग आपस में हंस हंस कर लोट-पोट होने लगे। जबकि मैं खड़ा देखता रहा। अगर मेरे पास शक्ति होती तो मैं पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पीठ मुबारक से उसको हटा देता। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसी तरह सज्दे में पड़े हुए थे आप अपना सिर नहीं उठा पा रहे थे यहाँ तक कि एक व्यक्ति ने जाकर फातिमा को बतलाया, तो वह दौड़ी हुई आईं, जबकि वह एक छोटी बच्ची थीं। चुनाँचे उन्हों ने उसे आपकी पीठ से हटाया, फिर उन लोगों को बुर-भला कहने लगीं। जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी नमाज़ पूरी कर ली, तो आप ने अपनी आवाज़ को बुलन्द किया फिर उनपर शाप फरमाई, - आप जब दुआ करते थे तो तीन बार दुआ करते थे, और जब कोई चीज़ मांगते, तो तीन बार मांगते – आप ने तीन बार कहा : ''ऐ अल्लाह! कुरैश को पकड़ ले।'' जब उन्हों ने आपकी आवाज़ सुनी तो उनकी हंसी बंद हो गई, और आपकी शाप से सहम गए। फिर आप ने फरमायाः ''ऐ अल्लाह! अबु जह्ल बिन हिशाम, उत्बा बिन रबीआ, शैबा बिन रबीआ, वलीद बिन उक़्बा, उमैय्या बिन ख़लफ़ और उक़्बा बिन अबी मुईत पर अपनी पकड़ नाजिल फरमा - आप ने सातवें व्यक्ति का भी नाम लिया लेकिन मुझे अब याद नहीं - क़सम है उस अस्तित्व की जिसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सत्य के साथ भेजा, जिन-जिन लोगों का नाम आप ने लिया था वे सब बद्र के दिन मुंह के बल पड़े हुए थे, फिर उन सभी को बद्र के कुँए में डाल दिया गया।''

13- खाना और पोशाक हलाल होना चाहिए। मुस्लिम (हदीस संख्याः 1015) ने अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः (लोगो! अल्लाह पवित्र है और शुद्ध व पवित्र चीज़ ही स्वीकार करता है। और अल्लाह तआला ने रसूलों को जिन चीज़ों का आदेश दिया है वही आदेश मोमिनों (विश्वासियों) को भी दिया है। अल्लाह तआला का फरमान हैः

 ( يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنْ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ )

''और मेरा आम हुक्म था कि ऐ (मेरे पैगम्बर) पाक व पाकीज़ा चीज़ें खाओ और अच्छे अच्छे काम करो (क्योंकि) तुम जो कुछ करते हो मैं उससे बखूबी वाकिफ हूँ।'' (सूरतुल मूमिनूनः 51)

और विश्वासियों को आदेश देते हुए कहाः

 ( يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ )

''ऐ ईमान वालो! जो अच्छी चीजें तुम्हें दी हैं उनमें से खाओ। (अल-बक़राः 172)।

फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक व्यक्ति का उल्लेख किया, जो लम्बे सफर में बिखरे स्थिति के साथ-दोनों हाथ आकाश की ओर बढ़ाते हुए पुकारता है, या रब या रब! की स्वर बुलंद करता है, हालांकि उसका खाना हराम है, उसका पीना हराम है, उसका कपड़ा हराम है और उसकी परवरिश भी हराम खूराक से हुई है, तो उसकी दुआएँ क्योंकर स्वीकार की जाए!?

इब्ने रजब रहिमहुल्लाह कहते हैं किः ''इससे पता चला कि हलाल पीने, पहनने, और हलाल पर पोषण पाना दुआ की स्वीकृति का कारण है।'' समाप्त हुआ।

14-  दुआ को गुप्त रखना उसे प्रकट न करना।

अल्लाह तआला का फरमान हैः

( ادعوا ربكم تضرعا وخفية ) الأعراف/55

 ''अपने पालनहार को गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारो।’’ (सूरतुल आराफः 55).

तथा अल्लाह तआला ने अपने बन्दे ज़करिया अलैहिस्सलाम की प्रशंसा करते हुए फरमायाः

   ( إذ نادى ربه نداءً خفياً ) مريم/3

‘‘जबकि उस (ज़करिया) ने अपने रब को चुपके-चुपके पुकारा।’’ (मरयमः 3)

हमारी वेबसाइट पर दुआ से संबंधित एक संक्षेप वर्णन, दुआ करनेवाले के लिए दुआ की स्वीकृति पर सहायक कारणों, दुआ के शिष्टाचार, दुआ की स्वीकृति के संभावित स्थान और समय, दुआ करनेवाले की स्थितियों,   दुआ की स्वीकृति की बाधाओं और दुआ की स्वीकृति के प्रकार का उल्लेख पहले बीत चुका हैः इन सब का वर्णन प्रश्न संख्याः (5113) के उत्तर में हुआ है।

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