शनिवार 13 ज़ुलक़ादा 1441 - 4 जुलाई 2020
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छूटी हुई नमाज़ों की क़ज़ा कैसे की जानी चाहिएॽ

प्रश्न

मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदि नमाज़ का समय निकल जाए, तो कितनी रकअत नमाज़ (क़ज़ा) पढ़नी चाहिएॽ कुछ लोग कहते हैं कि हमें उसी छूटी हुई फ़र्ज़ नमाज़ की रकअतों की संख्या में नमाज़ पढ़ना चाहिए। मैं वर्तमान समय में यही कर रहा हूँ जब मेरे पास नमाज़ पढ़ने का समय नहीं होता है और नमाज़ का समय निकल चुका होता है।

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

एक मुसलमान के लिए बिना किसी कारण के नमाज़ को उसका समय निकल जाने तक विलंबित करना जायज़ नहीं है। अल्लाह तआला ने फरमाया :

  إِنَّ الصَّلاةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَاباً مَوْقُوتاً

سورة النساء: 103

"निःसंदेह नमाज़ मोमिनों पर एक निश्चित समय पर अनिवार्य है।'' [सूरतुन-निसा : 103] अर्थात उसका एक निर्धारित समय है।

जो कारण नमाज़ को उसके समय से विलंबित करने की अनुमित देते हैं, उनमें नींद और भूलना शामिल हैं। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो व्यक्ति किसी नमाज़ को भूल जाए या उससे सो जाए, तो उसका प्रायश्चित यह है कि उसको याद करते ही (उसे) पढ़ ले।'' इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 684) ने रिवायत किया है।

जहाँ तक काम और अध्ययन (पढ़ाई) आदि का संबंध है, तो ये नमाज़ को उसके समय से विलंबित करने की अनुमति देने वाले कारण नहीं हैं। अल्लाह तआला ने कुछ लोगों की अपने इस कथन के द्वारा प्रशंसा की है :

 رِجَالٌ لا تُلْهِيهِمْ تِجَارَةٌ وَلا بَيْعٌ عَنْ ذِكْرِ اللَّهِ وَإِقَامِ الصَّلاةِ وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ يَخَافُونَ يَوْماً تَتَقَلَّبُ فِيهِ الْقُلُوبُ وَالأَبْصَارُ

النور : 37

''ऐसे लोग जिन्हें व्यापार और क्रय-विक्रय अल्लाह तआला के ज़िक्र और नमाज़ का़यम करने और ज़कात अदा करने से असावधान नहीं करते, वे उस दिन से डरते हैं जिस दिन बहुत से ह्रदय और बहुत सी आँखें उलट पलट हो जाएँगी।'' (सूरतुन्नूर : 37)

दूसरा :

जिस व्यक्ति ने बिना किसी कारण के नमाज़ को छोड़ दिया यहाँ तक कि उसका समय निकल गया, तो उसने एक ऐसा पाप किया है जो प्रमुख (घोर) पापों में से है। उसके लिए अनिवार्य है कि अल्लाह तआला के समक्ष तौबा (पश्चाताप) करे और नमाज़ को नियमित रूप से उसके समय पर पढ़ने का संकल्प करे। तथा नमाज़ को उसका समय खत्म होने के बाद अदा करने से उसे कोई फायदा नहीं होगा जबकि उसने उसे बिना किसी कारण के नष्ट कर दिया है। उसे अधिक से अधिक नफ्ल (स्वैच्छिक) नमाज़ें पढ़नी चाहिए, इस उम्मीद में कि वे उसकी अनिवार्य नमाज़ों में होने वाली कमी की पूर्ति कर दें।

जहाँ तक उस व्यक्ति का संबंध है जिसने किसी कारणवश, जैसे कि सो जाने या भूल जाने की वजह से, नमाज़ को विलंबित कर दिया यहाँ तक कि उसका समय निकल गया, तो उसे चाहिए कि जैसे ही कारण समाप्त हो जाए, नमाज़ की अदायगी करे। क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : “जो व्यक्ति कोई नमाज़ भूल जाए, तो वह उसे याद आते ही पढ़ ले। इसका उसके अलावा कोई दूसरा कफ्फारा (परायश्चित) नहीं है।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

तथा वह उसे उसी तरह पढ़ेगा जिस तरह वह उसे उसके नियमित समय पर पढ़ा करता था, उसमें कोई वृद्धि या कमी नहीं करेगा, या उसके तरीक़े और विधि में कोई परिवर्तन नहीं करेगा।

सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 681) में अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथियों के यात्रा के दौरान सूर्य के उदय होने तक फज्र की नमाज़ से सोए रहने की कहानी में है कि अबू क़तादा ने कहा : “फिर बिलाल ने नमाज़ के लिए अज़ान दी और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो रकअत नमाज़ अदा की, फिर आपने फ़ज्र की (फ़र्ज़) नमाज़ पढ़ी। इस प्रकार आपने वैसे ही किया, जैसे कि आप प्रति दिन किया करते थे।”

नववी ने कहा : “जैसे कि आप प्रति दिन किया करते थे।” इसमें इस बात का संकेत मिलता है कि छूटी हुई नमाज़ की क़जा का तरीक़ा उसी तरह है, जिस तरह कि सामान्य रूप से नमाज़ अदा की जाती है।”

विद्वानों के यहाँ यह नियम है कि : “क़ज़ा, अदा के समान है।” अर्थात इबादत की क़ज़ा, उसे अदा करने ही की तरह की जाएगी।

और अल्लाह तआला ही सबसे बेहतर जानता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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