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ज़िक्र और दुआ के दौरान आँखें बंद करने का हुक्म

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प्रकाशन की तिथि : 29-01-2015

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प्रश्न

क्या ज़िक्र और दुआ के दौरान दोनों आँखें बंद करना संभव है?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सुन्नत (हदीस) में यह बात ज्ञात नहीं है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी भी इबादत के अंदर अपनी दोनों आँखे बंद करते थे, चाहे वह नमाज़ में हो या क़ुरआन के पाठ में, या ज़िक्र या दुआ या खुत्बा या इसके अलावा किसी अन्य में।

तथा प्रश्न संख्या : (22174) के उत्तर में यह बात उल्लेख की जा चुकी है कि नमाज़ में आँखें बंद करना मकरूह (घृणित) है, सिवाय इसके कि कोई आवश्यकता हो : अर्थात कोई ऐसी चीज़ पाई जाती हो जो नमाज़ी को नमाज़ के दौरान व्यस्त कर दे, जैसेः बेल-बूटे और सजावटें, या छवियाँ (चित्र), या किसी औरत का गुज़रना और इसके समान अन्य चीज़ें। और यदि कोई आवश्यकता नहीं पाई जाती है तो आँखें बंद करना धर्म संगत नहीं है।

अतः यदि दोनों आँखे बंद करने के लिए कोई कारण पाया जाए, तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है, जैसे कि उस स्थान पर कोई चीज़ पाई जाती हो जो दुआ करने वाले या अल्लाह का ज़िक्र करने वाले के ध्यान को फेर दे।

लेकिन यदि इसका कोई कारण मौजूद न हो तो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमका अनुसरण करना ही निःसंदेह सबसे बेहतर है।

तथा कुछ लोग विनम्रता प्राप्त करने के लिए अपनी आँखें बंद कर लेते हैं, हालांकि ऐसा करना धर्म संगत नहीं है, और विद्वानों ने इसका खण्डन किया है।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया :

नमाज़ में क़ुरआन का पाठ करते समय और क़ुनूत की दुआ पढ़ते समय आँखें बंद करने का क्या हुक्म है ताकि नमाज़ में विनम्रता हासिल किया जा सके?

तो उन्हों ने उत्तर दिया :

''विद्वानों ने उल्लेख किया है कि नमाज़ में आँखें बंद करना मकरूह है, सिवाय इसके कि कोई कारण पाया जाता हो, उदाहरण के तौर पर उसके सामने कोई चीज़ हो जो उसके ध्यान को फेरने वाली हो, या चमकदार ताक़तवर रोशनी हो जो उसकी आँखों को प्रभावित करती हो, तो ऐसी हालत में इस खराबी (नुक़सान) को दूर करने के लिए वह अपनी आँखें बंद कर सकता है।

जहाँ तक कुछ लोगों का यह दावा करना है कि अगर वह अपनी आँखें बंद कर लेगा तो यह उसके लिए अपनी नमाज़ में अधिक विनम्रता का कारण है, तो मुझे इस बात का भय है कि यह शैतान के छल और धोखे में से है ताकि उसे इस घृणित काम में फंसा दे जबकि उसे इसका एहसास भी न हो। और अगर उसने अपने आपको इस बात का आदी (अभ्यस्त) बना लिया कि उसे उसी वक़्त विनम्रता हासिल होती है जब वह अपनी आँखें बंद कर लेता है, तो यही वह चीज़ है जो उसकी यह मानसिकता बना देती है वह आँखें बंद करने की स्थिति में आँखे खुली रखने की हालत से अधिकतर विनम्रता हासिल करता है।''

मजमूओ फतावा व रसाइल अल-उसैमीन (13/299).

कभी-कभी दुआ या ज़िक्र के दौरान बिना किसी इरादा के आँखें बंद हो जाती हैं, तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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