शुक्रवार 8 रबीउलअव्वल 1440 - 16 नवंबर 2018
Hindi

क्या सोने से पहले सूरतुल मुल्क सुनने वाले को उसका पाठ करने वाले की तरह अज्र (पुण्य) मिलेगाॽ

प्रश्न

जो आदमी पढ़ना नहीं जानता है उसके लिए सोने से पहले क़ब्र की यातना से मुक्ति दिलाने वाली सूरत ''अल-मुल्क'' सुनने का क्या हुक्म हैॽ क्या उसका अज्र व सवाब (पुण्य) उसे पढ़ने वाले के अज्र व सवाब के बराबर होगाॽ

उत्तर का पाठ

उत्तरः

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सूरतुल मुल्क की फज़ीलत (विशेषता) में वह हदीस आई है जिसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 2891) ने रिवायत किया है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नें फरमायाः ''क़ुरआन की एक तीस आयतों पर आधारित सूरत ने एक आदमी के लिए सिफ़ारिश की यहाँ तक कि उसे क्षमा कर दिया गया। वह सूरत 'तबारका अल्लज़ी बि-यदिहिल मुल्क' है।'' इस हदीस को शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने ''सहीह सुनन तिर्मिज़ी'' में हसन कहा है।

तथा तिर्मिज़ी (हदीस संख्याः 2892) ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है किः ''नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नहीं सोते थे यहाँ तक कि सूरत ''अलिफ़ लाम तंज़ील'' और सूरत 'तबारका अल्लज़ी बि-यदिहिल मुल्क' पढ़ लेते।'' शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसे सहीह कहा है।

नसाई (हदीस संख्याः 10479) ने इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहाः ''जिसने हर रात सूरत ''तबारका अल्लज़ी बि-यदिहिल मुल्क'' का पाठ किया, अल्लाह उसे उसके कारण क़ब्र की यातना से सुरक्षित रखेगा। हम लोग अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समयकाल में उसे रोकने वाली (अर्थात क़ब्र की यातना से सुरक्षित रखने वाली) सूरत का नाम देते थे। निःसंदेह वह अल्लाह की किताब में एक ऐसी सूरत है कि जिसने हर रात में उसका पाठ किया तो उसने अधिक और अच्छा किया।'' इसे शैख अल्बानी रहिमहुल्लाह ने ''सहीह अत्तर्ग़ीब वत्तर्हीब'' (1589) में हसन कहा है।

इसका मतलब यह है – जैसा कि उक्त हदीसों से प्रतीत होता है – कि वर्णित विशेषता उस व्यक्ति के लिए है जिसने उस सूरत का पाठ किया। अधिक लाभ के लिए प्रश्न संख्याः (26240) का उत्तर, तथा प्रश्न संख्याः (191947) का उत्तर देखें।

जहाँ तक बिना पाठ के मात्र सुनने का प्रश्न है, तो ऐसा करने वाले को पढ़ने वाला या पाठ करने वाला नहीं समझा जाएगा, यद्वपी वह भी एक धर्मसंगत व अपेक्षित इबादत है। लेकिन ज़रूरी नहीं है कि उसके लिए वही अज्र व सवाब और विशेषताएं हों जो पढ़ने वाले के लिए हैं। वास्तव में, इस बराबरी और समानता का हम कोई प्रमाण नहीं जानते।

इस आधार पर, जो भी व्यक्ति हदीसों में वर्णित विशेषता को प्राप्त करना चाहता है, उसे इस सूरत का पाठ करना चाहिए, केवल उसे सुनने पर निर्भर नहीं करना चाहिए।

यदि वह उसका पाठ करने में सक्षम नहीं है, और वह किसी पाठक के पीछे उसे दोहरा सकता है, विशेष रूप से जब विभिन्न माध्यमों से सुनना आसान हो गया है, तथा रिकार्ड किए हुए ऐसे पाठ मौजूद हैं, जो सुनने वाले को दोहराने की अनुमति प्रदान करते हैं; तो जब भी उसके लिए ऐसा करना संभव हैः तो यह इन शा अल्लाह अच्छा है, और इससे यह सिद्ध हो जाएगा कि उसने पाठ किया है। हो सकता है उसे उसके कष्ट व कठिनाई पर धैर्य करने पर महान अज्र व सवाब प्राप्त हो।

जो व्यक्ति इसमें से कोई भी चीज़ करने में सक्षम नहीं है, या उसके ऊपर यह कष्ट व कठिनाई का कारण है, अतः उसने केवल सुनने पर निर्भर किया जिस पर वह सामर्थ्य रखता हैः तो हमें आशा है कि वह पाठ करने वाले के अज्र व सवाब (पुण्य) से, तथा इस तरह के पाठ करने में वर्णित विशेषताओं से वंचित नहीं रहेगा, जबकि वह जो कुछ करने में सक्षम था, उसे उसने किया है।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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