रविवार 17 ज़ुलहिज्जा 1445 - 23 जून 2024
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मासिक धर्म वाली महिला को ग्रहण लगने पर क्या करना चाहिए?

प्रश्न

मैं एक महिला हूँ। अगर मैं ग्रहण की नमाज़ में उपस्थित होती हूँ और मेरे पास शरई बहाना है (जिसके कारण मैं नमाज़ नहीं पढ़ सकती) तो मुझे क्या करना चाहिएॽ 

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

सबसे पहले :

सूर्य या चंद्र ग्रहण की स्थिति में मुसलमान के लिए नमाज़, ज़िक्र, दुआ, क्षमा-याचना, दान और अन्य नेक कार्यों के साथ अल्लाह का आश्रय लेना धर्मसंगत है।

अबू मसऊद अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “सूरज और चाँद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियाँ हैं, जिनसे अल्लाह अपने बंदों को डराता है। तथा उनमें किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के कारण ग्रहण नहीं लगता है। अतः यदि तुम उनमें से कुछ देखो, तो नमाज़ पढ़ो और अल्लाह से दुआ करो यहाँ तक वह दूर कर दिया जाए जिससे तुम ग्रस्त हुए हो।” इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1041) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 911) ने रिवायत किया है। और हदीस के शब्द मुस्लिम के हैं।

बुखारी (हदीस संख्या : 1059) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 912) ने अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : “सूर्य ग्रहण हो गया, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम घबराए हुए उठे, इस बात से डर रहे थे कि वह क़ियाम की घड़ी न हो। आप मस्जिद में आए और सबसे लंबे क़ियाम, रुकू' और सजदे वाली नमाज़ पढ़ाई, कि मैंने आपको ऐसा करते हुए कभी नहीं देखा। और आपने कहा : “ये निशानियाँ जो अल्लाह भेजता है वे न तो किसी की मृत्यु के लिए होती हैं और न ही उसके जीवन के लिए, बल्कि अल्लाह अपने बंदों को इसके द्वारा भयभीत करता है, इसलिए यदि तम उसमें से कुछ भी देखो, तो उसका ज़िक्र करने, उससे दुआ करने और उससे क्षमा माँगने की तरफ जल्दी करो।”

इब्ने बत्ताल रहिमहुल्लाह ने कहा : हदीस के शब्द : (...तो उसका ज़िक्र करने, उससे दुआ करने और उससे क्षमा माँगने की तरफ जल्दी करो।), बुखारी ने इसे “बाब अज़-ज़िक्र फिल-कुसूफ़” (ग्रहण के समय अल्लाह को याद करने के अध्याय) में वर्णन किया है। उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (सूर्य या चंद्र ग्रहण) के समय दुआ करने, इस्तिग़फ़ार (क्षमा-याचना) करने का आदेश दिया, जिस तरह कि आपने हमें नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया।

इससे पता चला कि उनसे (सहबाह से) ग्रहण के समय विशेष रूप से नमाज़ को नहीं चाहा गया था, बल्कि उनसे वह काम करने की अपेक्षा की गई थी जिससे वे अल्लाह की निकटता प्राप्त कर सकें, जैसे कि नमाज़, दुआ, क्षमायाचना इत्यादि।”  

इब्ने बत्ताल की “शर्ह सहीह अल-बुखारी” (3/32) से उद्धरण समाप्त हुआ

शरीयत के सामान्य नुसूस (पाठों) के कारण; इस संबंध में महिला का हुक्म पुरुष के समान है। अतः उसके लिए वही करना धर्मसंगत है जो एक पुरूष के लिए करना धर्मसंगत है, जैसे कि नमाज़, दुआ, अल्लाह से क्षमा माँगना, दान देना, और इसी तरह की अन्य चीज़ें।

यदि किसी महिला के पास नमाज़ पढ़ने से रोकने वाली कोई शरई चीज़ (बाधा) है, तो इस स्थिति में उसके पास करने के लिए कई सारे काम बचे हैं, जैसे : दुआ करना, दान देना, अल्लाह से क्षमा माँगना, अल्लाह को याद करना, और अन्य कार्य जिनके द्वारा वह अल्लाह की निकटता प्राप्त कर सकती है।

अधिक जानकारी के लिए प्रश्न संख्या : (26753 ) का उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर