गुरुवार 12 मुहर्रम 1446 - 18 जुलाई 2024
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क्या क़सम से पलटना जायज़ हैॽ

प्रश्न

एक आदमी ने क़सम खाई कि वह ऐसा नहीं करेगा, लेकिन वह उससे पलटना चाहता है; तो वह क्या करेॽ क्या उसे प्रायश्चित करना

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

सर्व प्रथम :

क़सम से पलटने का हुक्म

जो व्यक्ति कोई क़सम खा ले और फिर उससे वापस पलटना चाहे, तो ऐसा करना जायज़ है यदि वापस पलटने में कोई निषिद्ध कार्य करना शामिल नहीं है, और उसके लिए क़सम तोड़ने के लिए प्रायश्चित करना (कफ़्फ़ारा देना) आवश्यक है।

बुखारी (हदीस संख्या : 6718) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1649) ने अबू मूसा अल-अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : मैं तो अल्लाह की क़सम! - अगर अल्लाह ने चाहा - तो कोई क़सम नहीं खाऊँगा, फिर उसके अलावा दूसरा काम उससे बेहतर देखूँगा, तो मैं अपनी क़सम का प्रायश्चित्त कर दूँगा और मैं वह करूँगा जो बेहतर होगा।”

तथा बुख़ारी (हदीस संख्या : 6622) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1652) ने अब्दुर-रहमान बिन समुरह से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “ऐ अब्दुर-रहमान बिन समुरह! कभी भी सरकारी पद की माँग न करना। क्योंकि यदि वह तुम्हें माँगने के बाद मिलेगा, तो तुम उसके हवाले कर दिए जाओगे (अल्लाह तुमसे अपनी मदद वापस ले लेगा)। लेकिन अगर वह पद तुम्हें बिना माँगे मिल गया, तो उसपर (अल्लाह की ओर से) तुम्हारी मदद कि जाएगी। तथा जब तुम कोई क़सम खाओ और उसके सिवा किसी अन्य बात को उससे बेहतर देखो, तो अपनी क़सम का प्रायश्चित्त कर दो और वह काम करो, जो बेहतर है।”

तथा मुस्लिम (हदीस संख्या : 1650) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा :  “अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “जो व्यक्ति किसी चीज़ की क़सम खाए। फिर उसके अलावा को उससे बेहतर समझे, तो उसे वह करना चाहिए जो वह बेहतर समझे और अपनी क़सम का प्रायश्चित कर दे।”

नववी रहिमहुल्लाह ने “शर्ह मुस्लिम” (11/108) में कहा : इन हदीसों में इस बात का प्रमाण है कि अगर कोई व्यक्ति किसी चीज़ के करने या न करने की क़सम खा ले, और क़सम तोड़ना, क़सम पर बने रहने से बेहतर हो : तो उसके लिए क़सम तोड़ना अच्छा है; और ऐसी स्थिति में उसके लिए (क़सम तोड़ने का) कफ़्फ़ारा अनिवार्य है। इस बात पर सर्व सहमति है।”

फिर उन्होंने क़सम तोड़ने से पहले कफ़्फ़ारा देने के संबंध में विद्वानों के मतभेद का उल्लेख किया। उन्होंने कहा :

“वे (विद्वान) सर्वसम्मति से सहमत हैं कि क़सम तोड़ने से पहले उसपर कफ़्फ़ारा देना अनिवार्य नहीं है, और यह कि क़सम तोड़ने के बाद तक कफ़्फ़ारा को विलंब करना जायज़ है, और यह कि क़सम खाने से पहले कफ़्फ़ारा देना जायज़ नहीं है।

तथा उन्होंने क़सम खाने के बाद और क़सम तोड़ने से पहले कफ़्फ़ारा देने के जायज़ होने बारे में मतभेद किया है : मालिक, औज़ाई, सौरी, शाफ़ेई, चौदह सहाबा और ताबेईन के कई समूहों ने इसे जायज़ माना है। और यही अधिकांश विद्वानों का विचार है, लेकिन उन्होंने कहा : उसका क़सम तोड़ने के बाद होना वांछनीय है। जबकि इमाम शाफ़ेई ने रोज़े से प्रायश्चित करने के मामले को इससे अलग किया है। उन्होंने कहा : क़सम तोड़ने से पहले यह जायज़ नहीं है; क्योंकि यह एक शारीरिक इबादत है, इसलिए इसे उसके समय से पहले करना जायज़ नहीं है, जैसे कि नमाज़ और रमजान के रोज़े। जहाँ तक धन के द्वारा प्रायश्चित करने की बात है, तो उसे क़सम तोड़ने से पहले करना जायज़ है, जैसे कि समय से पहले ज़कात देना जायज़ है।

हमारे कुछ असहाब ने पाप करने की क़सम को तोड़ने के लिए प्रायश्चित करने के मामले को इससे अलग रखा है, उन्होंने कहा : उसके लिए समय से पहले प्रायश्चित करना जायज़ नहीं है, क्योंकि ऐसा करने में पाप में मदद करना पाया जाता है। लेकिन बहुसंख्यक का विचार है कि यह जायज़ है, जैसे कि पाप के अलावा मामलों में जायज़ है।

इमाम अबू हनीफा और उनके असहाब और अशहब अल-मालिकी ने कहा : किसी भी परिस्थिति में क़सम तोड़ने से पहले प्रायश्चित करना जायज़ नहीं है।

बहुसंख्यक विद्वानों का प्रमाण : इन हदीसों का प्रत्यक्ष अर्थ, और इसे समय से पहले ज़कात देने के मुद्दे पर क़यास करना है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

दूसरा :

अगर क़सम से पलटने में पाप करना शामिल है

यदि क़सम से पलटने में पाप करना शामिल है : तो उससे पलटना जायज़ नहीं है, जैसे कि एक व्यक्ति ने यह क़सम खाई : मैं ज़िना नहीं करूँगा या मैं शराब नहीं पीऊँगा, तो इस क़सम को पूरा करना अनिवार्य है और इसे तोड़ना हराम है।

क़ाज़ी अयाज़ ने “इकमाल अल-मो'लिम” (5/408) में कहा : “हदीस के शब्द (फिर मैं उसके अलावा दूसरा काम उससे बेहतर देखूँगा) का अर्थ है : जो कुछ उसने करने या छोड़ने की क़सम खाई है, उसके अलावा कोई दूसरा काम उसके लिए इस संसार में या परलोक में उससे बेहतर है, या उसके झुकाव और इच्छा के अधिक अनुकूल है, जब तक कि वह पाप न हो।” उद्धरण समाप्त हुआ।

अतः क़सम तोड़ना या क़सम से पलटना कभी तो हराम होता है, जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरण में है। तथा कभी क़सम तोड़ना अनिवार्य हो सकता है, जैसे कि किसी ने क़सम खाई हो कि वह नमाज़ नहीं पढ़ेगा या ज़कात नहीं देगा, या अपने रिश्तेदारों के साथ संबंध नहीं बनाए रखेगा, तो ऐसे में क़सम तोड़ना अनिवार्य है। इसी तरह, क़सम के अनुसार, क़सम तोड़ना वांछित (मंदूब), या अवांछित (मकरूह), या अनुमेय (मुबाह) हो सकता है। इस तरह इसमें पाँचों अहकाम आ सकते हैं।

उन्होंने “अल-इक़ना” (4/330) में कहा : क़सम खाना कभी अनिवार्य होता है : जैसे कि वह क़सम के द्वारा किसी निर्दोष जन को विनाश से बचाए, भले ही स्वयं को बचाना हो। जैसे कि उसके खिलाफ हत्या के दावे में, जबकि वह निर्दोष हो, उसे 'क़सामह' की क़सम खानी पड़ जाए।

मंदूब (वांछित) : जैसे कि वह किसी हित से संबंधित हो, जैसे कि दो विवादित पक्षों के बीच मेल-मिलाप कराना, या एक मुसलमान के दिल से क़सम खाने वाले या किसी अन्य व्यक्ति के प्रति द्वेष को दूर करना, या बुराई को दूर करना।

मुबाह (अनुमेय) : जैसे किसी अनुमेय कार्य को करने या उसे छोड़ने की क़सम खाना, या किसी समाचार की पुष्टि करने के लिए क़सम लेना जिसके बारे में वह सच्चा है : या वह समझता है कि वह उसके बारे में सच्चा है।

मकरूह (अवांछित) : जैसे कि किसी मकरूह (नापसंदीदा) कार्य को करने या किसी मंदूब (वांछित) कार्य को छोड़ने की क़सम खाना। इसी श्रेणी में खरीदते और बेचते समय क़सम खाना भी शामिल है।

हराम (निषिद्ध) : यह जानबूझकर झूठी क़सम खाना, या पाप करने की क़सम खाना या किसी वाजिब (अनिवार्य कार्य) को छोड़ने की क़सम खाना है।

यदि क़सम किसी अनिवार्य कार्य को करने या निषिद्ध कार्य को त्यागने के लिए खाई है, तो उस क़सम को तोड़ना हराम है और उसको पूरा करना अनिवार्य है।

यदि क़सम किसी मंदूब (वांछनीय) कार्य को करने या किसी मकरूह कार्य को त्याग करने के लिए खाई है : तो उसे तोड़ना मकरूह है और उसको पूरा करना वांछनीय है।

यदि क़सम किसी मकरूह (अवांछनीय) कार्य को करने या किसी मंदूब (वांछनीय) कार्य को त्याग करने के लिए खाई है : तो उसे तोड़ना वांछनीय है और उसके पूरा करना मकरूह है।

यदि क़सम किसी निषिद्ध कार्य को करने या किसी अनिवार्य कार्य को त्यागने के लिए खाई है, तो उस क़सम को तोड़ना अनिवार्य है और उसको पूरा करना हराम है।

अनुमेय काम करने की क़सम तोड़ना जायज़ है, जबकि उसे पूरा करना बेहतर है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

लेकिन अगर प्रश्नकर्ता का क़सम से पलटने का मतलब यह है कि : वह उससे पलट जाए और वह क़सम भंग हो जाए, उसपर उसका कोई प्रभाव निष्कर्षित न हो, न क़सम तोड़ना और न ही कफ़्फ़ारा देने की आवश्यकता और न ही कोई और चीज़; तो यह संभव नहीं है और न ही किसी (विद्वान) ने ऐसा कहा है। अगर ऐसा होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा अवश्य किया होता और क़सम की पाबंदी से निकलने में उसकी ओर मार्गदर्शन किया होता, जब कोई क़सम खाने के बाद उसके अलावा को उससे बेहतर देखे। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, बल्कि आपने क़सम तोड़ने का निर्देश दिया, यदि वह बेहतर है, साथ ही उसका कफ़्फ़ारा देने का आदेश दिया।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर