मंगलवार 4 सफ़र 1442 - 22 सितंबर 2020
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हस्तमैथुन का हुक्म और इस समस्या के इलाज का तरीक़ा

प्रश्न

मेरे पास एक प्रश्न है, जिसे पूछने में मुझे शर्म आती है। लेकिन एक बहन है जो हाल ही में इस्लाम में आई है, वह इसका उत्तर चाहती है और मेरे पास क़ुरआन और सुन्नत के प्रमाण के साथ इसका उत्तर नहीं है। मुझे आशा है कि आप हमारी मदद करेंगे। मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि यदि यह प्रश्न अनुचित है, तो मुझे माफ़ कर दें। लेकिन मुसलमानों के रूप में, हमें ज्ञान प्राप्त करने में कभी शर्म नहीं करना चाहिए।

उसका सवाल यह है : क्या इस्लाम में हस्तमैथुन करने की अनुमति हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

क़ुरआन और सुन्नत के निम्नलिखित प्रमाणों के आधार पर इस्लाम में हस्तमैथुन (पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए) हराम (निषिद्ध) है :

सर्व प्रथम : क़ुरआन करीम से प्रमाण :

इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह ने कहा : इमाम शाफ़ेई और उनके साथ सहमत लोगों ने हस्तमैथुन के हराम होने पर क़ुरआन की इस आयत से दलील पकड़ी है और वह अल्लाह तआला का यह फरमान है :

والذين هم لفروجهم حافظون . إلا على أزواجهم أو ما ملكت أيمانهم فإنهم غير ملومين . فمن ابتغى وراء ذلك فأولئك هم العادون

سورة المؤمنون : 4-6

“और जो लोग अपने गुप्तांगों की रक्षा करते हैं, सिवाय अपनी पत्नियों या उन लौंडियों के जिनके उनके दाहिने हाथ मालिक हैं, तो इस स्थिति में (उनसे संभोग करने में) उनपर कोई दोष नहीं है। परंतु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और तलाश करे, तो ऐसे ही लोग सीमा उल्लंघन करनेवाले है।” (सूरतुल मूमिनून : 4-6).

इमाम शाफ़ेई ने किताबुन्निकाह में कहा : यह आयत ईमान वालों के अपने गुप्तांगों की अपनी पत्नियों और लौंडियों के अलावा से रक्षा करने का उल्लेख करके, पत्नियों और लौंडियों को छोड़कर सभी यौन कृत्यों को हराम (निषिद्ध) ठहराने में स्पष्ट है... फिर इसकी पुष्टि करते हुए फरमाया :

 فمن ابتغى وراء ذلك فأولئك هم العادون

سورة المؤمنون : 6

“परंतु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और तलाश करे, तो ऐसे ही लोग सीमा उल्लंघन करनेवाले है।” (सूरतुल मूमिनून : 6) अतः पत्नी या लौंडी के अलावा में यौन अंग का इस्तेमाल जायज़ नहीं है तथा हस्तमैथुन की अनुमति नहीं है। और अल्लाह तआला ही बेहतर जानता है।” (शाफ़ेई की किताब ‘अल-उम्म’ से उद्धृत)

कुछ विद्वानों ने अल्लाह के निम्नलिखित कथन से यह दलील ग्रहण की है कि शुद्धता अपनाने के आदेश की अपेक्षा यह है कि विवाह के सिवाय यौन तृप्ति के सभी साधनों से उपेक्षा किया जाए :

 وَلْيَسْتَعْفِفِ الَّذِينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتَّى يُغْنِيَهُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ

النور : 33

“और उन लोगों को पाकदामन रहना चाहिए जो अपना विवाह करने का सामर्थ्य नहीं रखते, यहाँ तक कि अल्लाह उन्हें अपनी अनुकम्पा से धनवान् बना दे।” (सूरतुन्नूर : 33).

दूसरा : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से प्रमाण :

विद्वानों ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस को प्रमाण बनाया है। वह कहते हैं : हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ कुछ युवागण थे और हमारे पास कोई धन नहीं था। इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमसे कहा : “ऐ युवागण, तुममें से जो भी विवाह करने की क्षमता (विवाह का खर्च और संभोग की क्षमता) रखता है, उसे विवाह कर लेना चाहिए। क्योंकि यह निगाह को नीची करने वाला और शर्मगाह की रक्षा करने वाला है। और जो भी विवाह करने में सक्षम नहीं है, उसे रोज़ा रखना चाहिए। क्योंकि यह उसकी वासना को कम कर देता है (अर्थात हराम संभोग में पड़ने से सुरक्षित रखता है)।” इसे बुखारी (फत्हुल बारी, हदीस संख्या : 5066) ने रिवायत किया है

चुनाँचे इस हदीस में विवाह करने में असमर्थ होने पर, रोज़ा रखने का निर्देश दिया गया है, जबकि रोज़ा रखने में कठिनाई होती है। तथा उसे हस्तमैथुन करने का निर्देश नहीं दिया गया उसके लिए आवेग की शक्ति के बावजूद, तथा वह रोज़ा रखने से आसान भी है इसके बावजूद उसकी अनुमति नहीं दी गई है।

इस मुद्दे पर अन्य प्रमाण भी हैं, लेकिन हम केवल इतने पर निर्भर करते हैं। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

जहाँ तक इस बुरी आदत में पड़ने वाले व्यक्ति के इलाज का संबंध है, तो इससे छुटकारा पाने के लिए निम्नलिखित सुझावों और चरणों का पालन करना चाहिए :

1- इस आदत से मुक्ति हासिल करने का प्रेरक अल्लाह के आदेश का पालन करना और उसके क्रोध से बचना होना चाहिए।

2- इस समस्या का समाधान मौलिक व स्थायी सुधार के द्वारा करना और वह युवा लोगों के लिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वसीयत का पालन करते हुए विवाह करना है।

3- विचारों और वस्वसों को टालना (उनपर ध्यान न देना) तथा अपने मन और विचार को ऐसी चीज़ में व्यस्त रखना, जिसमें आपके दुनिया व आख़िरत की भलाई हो। क्योंकि निरंतर वस्वसों में पड़े रहने से वह कार्य का रूप ले लेता है। फिर वह इतना मज़बूत हो जाता है कि वह आदत बन जाता है। जिसके बाद उससे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है।

4- निगाह नीची रखना। क्योंकि आकर्षक लोगों और छवियों को देखना, चाहे वे जीवित हों या आरेखण, तथा दृष्टि को (निषिद्ध चीजों को देखने में) आज़ाद छोड़ देना, हराम की ओर ले जाता है। इसीलिए अल्लाह तआला ने फरमाया :

  قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ذَلِكَ أَزْكَى لَهُمْ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ 

سورة النور : 30

‘‘आप ईमान वाले पुरूषों से कह दीजिए कि अपनी दृष्टियों (निगाहों) को नीची रखें और अपने शर्मगाहों (सतीत्व) की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक पवित्रता का पात्र है। निःसंदेह अल्लाह उनके कार्यों से अच्छी तरह अवगत है।’’ (सूरतुन्नूर : 30)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “एक बार आकस्मिक दृष्टि पड़ जाने के बाद, दूसरी बार मत देख।” इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2777) ने रिवायत किया है और ‘सहीहुल-जामे’ (हदीस संख्या : 7953) में (अलबानी ने) इसे हसन कहा है।

यदि पहली निगाह, जो अचानक पड़ जाती है, उसमें पाप नहीं है, परंतु दूसरी निगाह हराम (निषिद्ध) है। इसी तरह, उन जगहों से दूर रहना चाहिए, जिनमें ऐसी चीज़ें पाई जाती हैं, जो वासना को भड़काती और उत्तेजित करती हैं।

5- अल्लाह की इबादत के विभिन्न कार्यों में व्यस्त रहना और पाप के लिए खाली समय न छोड़ना।

6- हस्तमैथुन के परिणामस्वरूप होने वाले स्वास्थ्य के नुकसानों को ध्यान में रखना, जैसे कि कमज़ोर दृष्टि, तंत्रिका तंत्र की कमज़ोरी, यौन अंग की कमज़ोरी, पीठ दर्द तथा चिकित्सकों द्वारा उल्लिखित अन्य नुकसान। इसके साथ-साथ ही मनोवैज्ञानिक क्षति जैसे कि चिंता और आत्मग्लानि, और सबसे बड़ी बात, बार-बार स्नान करने की आवश्यकता या उसमें कठिनाई के कारण, विशेष रूप से सर्दियों में, नमाज़ों को बर्बाद करना, इसी तरह रोज़े को खराब करना।

7- झूठी मान्यताओं का निवारण करना। क्योंकि कुछ युवाओं का मानना ​​है कि यह काम (हस्तमैथुन) स्वयं को व्यभिचार और गुदामैथुन (सोडोमी) से बचाने के बहाने जायज़ है। हालाँकि हो सकता है कि वह कुकर्म के निकट भी न हो। 

8- इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प के साथ सुसज्जित होना और शैतान को समर्पण न करना। तथा अकेलेपन जैसे कि अकेले रात बिताने से बचना। जैसा कि हदीस में आया है कि : “नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आदमी को अकेले रात बिताने से मना किया है।” इसे अहमद ने रिवायत किया है और वह ‘सहीहुल जामे’ (हदीस संख्या : 6919) में है।

9- पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए प्रभावी उपचार को अपनाना, जो कि रोज़ा रखना है। क्योंकि रोज़ा वासना की तीव्रता को तोड़ता है और काम की प्रवृत्ति को परिष्कृत (नियंत्रित) करता है।

तथा विचित्र संकेतों से सावधान रहे, जैसे कि दोबारा उसकी तरफ़ वापस न लौटने की क़सम खाना या मन्नत मानना। क्योंकि अगर वह उसके बाद दोबारा वापस लौट आता है, तो यह क़सम को उसकी पुष्टि के बाद तोड़ना होगा (जो कि निंदनीय है)। इसी तरह, यौन इच्छा को कम करने वाली दवाओं को भी नहीं लेना चाहिए। क्योंकि उनमें चिकित्सा संबंधी और शारीरिक जोखिम (खतरे) होते हैं। तथा सुन्नत में ऐसा प्रमाण साबित है जिससे पता चलता है कि स्थायी रूप से (पूरी तरह से) यौन क्षमता को प्रभावित करने वाली दवा का उपयोग करना निषिद्ध (वर्जित) है।

10- सोते समय शरई (इस्लामी) शिष्टाचार का पालन करना, जैसे कि वर्णित दुआओं को पढ़ना, दाहिनी करवट पर सोना और पेट के बल सोने से बचना क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इससे रोका है।

11- धैर्य और संयम बरतें क्योंकि निषिद्ध चीजों से धैर्य रखना (यानी रुक जाना) हमारे लिए अनिवार्य है, भले मन उसकी इच्छा करता हो। तथा हम इस बात को जान लें कि आत्मा को पवित्रता व शुद्धता पर प्रेरित करने से अंततः उसकी प्राप्ति हो जाती है और वह मनुष्य की एक स्थायी नैतिक चरित्र बन जाती है। जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :

"जो व्यक्ति पवित्रता (पाकदामनी) तलाश करता है (या माँगने से बचता है), अल्लाह उसे पवित्र (पाकदामन) बना देता है (या उसे बचा लेता है)। और जो कोई बेनियाज़ बनना चाहता है, अल्लाह उसे बेनियाज़ कर देता है। और जो कोई धैर्य से काम लेता है, अल्लाह उसे धैर्यवान बना देता है। तथा किसी व्यक्ति को धैर्य से बेहतर और व्यापक कोई अनुग्रह नहीं दिया गया।” इसे बुखारी ने रिवायत किया है (फत्हुल बारी, हदीस संख्या : 1469)।

12- यदि कोई व्यक्ति इस पाप में पड़ जाए, तो उसे पश्चाताप एवं क्षमा याचना करने और आज्ञाकारिता के कार्य करने में जल्दी करना चाहिए। तथा निराश और आशाहीन नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह प्रमुख पापों में से है।

13- अंत में, इस बात में कोई संदेह नहीं कि अल्लाह का सहारा लेना, उससे गिड़गिड़ाकर दुआ करना और इस आदत से छुटकारा पाने के लिए उससे मदद माँगना, एक सबसे बड़ा उपचार है। क्योंकि वह महिमावान अल्लाह दुआ करने वाले की दुआ को क़बूल करता है, जब भी वह उसे पुकारता है। और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद