सोमवार 15 ज़ुलक़ादा 1441 - 6 जुलाई 2020
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पुरुष और महिला दोनों का एतिकाफ़ केवल मस्जिद में मान्य है

प्रश्न

क्या कोई महिला अपने घर में एतिकाफ़ कर सकती हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।

विद्वानों की इस बात पर सर्वसहमति है कि पुरुष का एतिकाफ़ केवल मस्जिद में मान्य होता है। क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है :

  وَلا تُبَاشِرُوهُنَّ وَأَنْتُمْ عَاكِفُونَ فِي الْمَسَاجِدِ

البقرة :187

“और तुम उनसे (यानी पत्नियों से) उस समय संभोग न करो जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ की हालत में हो।” (सूरतुल बक़रा : 187).

यहाँ एतिकाफ़ को इस बात के साथ विशिष्ट किया है कि उसे मस्जिदों में किया जाना चाहिए।

देखें : “अल-मुग़्नी” (4/461).

जहाँ तक महिला का संबंध है, तो जमहूर (अधिकांश) विद्वानों का विचार है कि वह पुरुष ही की तरह है, उसका एतिकाफ़ भी केवल मस्जिद ही में मान्य है। इसका प्रमाण उपर्युक्त आयत है :

وَلا تُبَاشِرُوهُنَّ وَأَنْتُمْ عَاكِفُونَ فِي الْمَسَاجِدِ

البقرة :187

“और तुम उनसे (यानी पत्नियों से) उस समय संभोग न करो जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ की हालत में हो।” (सूरतुल बक़रा : 187).

तथा इसलिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों ने आपसे मस्जिद में एतिकाफ़ करने की अनुमति मांगी, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें अनुमति प्रदान कर दी। तथा वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद मस्जिद में एतिकाफ़ किया करती थीं।

अगर महिला के लिए अपने घर में एतिकाफ़ करना जायज़ होता, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें इसकी ओर अवश्य मार्गदर्शन करते, क्योंकि एक औरत का अपने घर में पर्दे में रहना, उसके मस्जिद के लिए बाहर निकलने से बेहतर है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि महिला का अपने घर की मस्जिद में एतिकाफ़ करना सही (मान्य) है, और इससे अभिप्राय वह जगह है जिसे वह अपने घर में नमाज़ पढ़ने के लिए विशिष्ट कर लेती है।

लेकिन जमहूर विद्वानों ने इससे मना किया है और उन्होंने कहा है कि : जिस स्थान पर वह अपने घर में नमाज़ पढ़ती है, उसे मजाज़ी तौर पर (आलंकारिक रूप में) मस्जिद का नमा दिया जाता है, वह वास्तव में मस्जिद नहीं है। इसलिए वह मस्जिद का हुक्म नहीं ग्रहण करेगा। इसी कारण उसमें जनाबत वाला व्यक्ति और मासिक धर्म वाली महिला प्रवेश कर सकती है।

देखें : “अल-मुग्नी” (4/464).

नववी ने “अल-मजमू” (6/505) में कहा :

“पुरुष या महिला का एतिकाफ़ केवल मस्जिद ही में सही (मान्य) है। वह महिला के घर की मस्जिद में या आदमी के घर की मस्जिद में मान्य नहीं है, और इससे अभिप्राय वह जगह है जो नमाज़ के लिए अलग कर ली गई हो।” उद्धरण समाप्त हुआ।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह से “मजमूउल-फ़तावा (20/264) में पूछा गया :

यदि एक महिला एतिकाफ़ करना चाहती है, तो उसे कहाँ एतिकाफ़ करना चाहिएॽ

तो उन्होंने जवाब दिया :

यदि कोई महिला एतिकाफ़ करना चाहती है, तो वह मस्जिद में एतिकाफ़ करेगी, अगर उसमें कोई शरई निषेध (बाधा) नहीं है। लेकिन अगर ऐसा करने में कोई शरई निषेध (रुकावट) है, तो वह एतिकाफ़ नहीं करेगी।” उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा “अल-मौसूअतुल फिक़्हिय्यह” (5/212) में आया है :

“विद्वानों ने महिलाओं के एतिकाफ़ करने की जगह के बारे में मतभेद किया है : जमहूर विद्वानों का मानना ​​है कि वे (महिलाएँ) पुरुषों की तरह हैं, उनका एतिकाफ़ भी केवल मस्जिद ही में मान्य है। इसके आधार पर, किसी महिला का एतिकाफ़ उसके घर की मस्जिद में सही (मान्य) नहीं है। क्योंकि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि : उनसे एक ऐसी महिला के बारे में पूछा गया जिसने अपने ऊपर यह निर्धारित कर लिया (मन्नत मानी) कि वह अपने घर की मस्जिद में एतिकाफ़ करेगी। तो उन्होंने कहा : “(यह) एक बिदअत (नवाचार) है और अल्लाह के निकट सबसे घृणित कार्य बिदअतें (नवाचार) हैं।” इसलिए एतिकाफ़ केवल ऐसी मस्जिद में मान्य है, जिसमें नमाज़ क़ायम की जाती हो। तथा इसलिए कि घर की मस्जिद न तो वास्तविक रूप में एक मस्जिद है और न तो उसपर मस्जिद का हुक्म लागू होता है। इसलिए उसे बदलना तथा जनाबत वाले आदमी का उसमें सोना जायज़ है। इसी तरह, अगर ऐसा करना जायज़ होता, तो उम्महातुल मोमिनीन रज़ियल्लाहु अन्हुन्ना ने ऐसा अवश्य किया होता, चाहे एक बार ही सही यह बयान करने के लिए कि यह अनुमेय है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर