ग़ैर-महरम (परायी) महिलाओं से बातचीत करना या तो किसी आवश्यकता (हाजत) के कारण होता है या बिना किसी आवश्यकता के।
यदि बातचीत बिना आवश्यकता के हो और उसमें महिला की आवाज़ सुनकर आनंद (मज़ा) लेना शामिल हो, या महिला नरमी और लुभावने अंदाज़ में बात करे, तो यह हराम है। यह ज़बान और कान के उस ज़िना (व्यभिचार) में शामिल है जिसके बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूचना देते हुए फ़रमाया : "आदम की संतान पर उसके हिस्से का ज़िना लिख दिया गया है, जिससे वह अवश्य दो-चार होगा। आँखों का ज़िना देखना है, कानों का ज़िना सुनना है, ज़बान का ज़िना बात करना है, हाथों का ज़िना पकड़ना है, पैरों का ज़िना चलकर जाना है, और दिल इच्छा करता है तथा तमन्ना करता है; फिर गुप्तांग उसे सत्य सिद्ध करता है या झुठला देता है।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2657) ने इसी शब्द के साथ रिवायत किया है।
परंतु यदि किसी औरत से बातचीत करने की आवश्यकता हो, तो मूल नियम यह है कि उससे बात करना जायज़ है, लेकिन निम्नलिखित शिष्टाचारों का पालन करना आवश्यक है :
- बातचीत केवल आवश्यकता भर हो
बात उतनी ही हो जितनी आवश्यक हो और उसी उद्देश्य तक सीमित रहे जिसके लिए बातचीत की जा रही है। अधिक विस्तार न किया जाए, और विषय के इधर-उधर की बातों में न पड़ा जाए। और आप, मेरे प्यारे भाई! इस संबंध में सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के शिष्टाचार पर ध्यान दें, ताकि आप उनकी तुलना आज हमारे हालात से कर सकें।
उम्मुल-मूमिनीन आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपने ऊपर मुनाफ़िक़ों द्वारा लगाए गए झूठे आरोप (इफ़्क) की घटना का वर्णन किया है, जिसमें उनका कहना है :
"सफ़वान बिन मुअत्तल अस्सुलमी, अज़्ज़कवानी (रज़ियल्लाहु अन्हु) सेना के पीछे-पीछे आते थे। वे सुबह मेरे ठहरने के स्थान पर पहुँचे और उन्होंने एक सोए हुए इनसान की काली छाया देखी। उन्होंने मुझे देखते ही पहचान लिया, क्योंकि पर्दे का हुक्म आने से पहले वह मुझे देख चुके थे। उनके “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” कहने पर मेरी आँख खुली। मैंने तुरंत अपनी चादर से अपना चेहरा ढक लिया। अल्लाह की क़सम! हमने एक भी बात नहीं की, और न हीं मैंने उनसे, उनके “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” कहने के अलावा, कोई शब्द सुना। फिर उन्होंने अपना ऊँट बैठाया, उसकी अगली टांग पर अपना पैर रखा ताकि मैं सवार हो सकूँ। मैं उठी और उस पर सवार हो गई और वह ऊँट की लगाम पकड़कर मुझे लेकर चल पड़े, यहाँ तक कि हम सेना तक पहुँच गए।" (सहीह बुख़ारी : 4141, सहीह मुस्लिम : 2770)
इमाम इराक़ी रहिमहुल्लाह कहते हैं:
"आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा का यह कहना कि 'मैंने उनसे कोई शब्द नहीं सुना' कोई पुनरुक्ति नहीं है। क्योंकि संभव है कि उन्होंने उनसे बात न की हो, लेकिन वह स्वयं से बात किए हों, या ऊँची आवाज़ में क़ुरआन पढ़े हों या ज़िक्र किए हों, जो उन्हें सुनाई दे सके। तो उनसे ऐसा भी नहीं हुआ। बल्कि उन्होंने उस परिस्थिति में शिष्टाचार और पवित्रता के कारण, और जिस स्थिति में वह थे उसकी गंभीरता के कारण, पूर्ण मौन धारण किया।”
इस हदीस से यह भी पता चलता है कि : अजनबी (ग़ैर-महरम) महिलाओं के साथ अत्यंत उत्तम शिष्टाचार अपनाना चाहिए, खासकर जब रेगिस्तान (सुनसान स्थान) में या कहीं और ज़रूरत पड़ने पर उनके साथ अकेले हों, जैसा कि सफ़वान रज़ियल्लाहु अन्हु ने बिना कोई बातचीत किए या बिना कोई प्रश्न पूछे ऊँट बैठाकर किया।" “तरहुत-तस्रीब” (8/53).
- हँसी-मज़ाक से बचना
मज़ाक करने और हंसने से बचें, क्योंकि यह अच्छे शिष्टाचार और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।
- घूरकर न देखना
घूरने से बचें और जहाँ तक संभव हो, नज़र नीची रखने की कोशिश करें।
यदि बातचीत के उद्देश्य के कारण सामने वाले की ओर कभी-कभार देखना पड़े, तो इन-शा-अल्लाह इसमें कोई हर्ज नहीं है।
- दोनों पक्षों में से किसी का आवाज़ को लुभावना न बनाना
किसी भी पक्ष को लुभाने वाले तरीके से बात नहीं करनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि न पुरुष अपनी आवाज़ में कृत्रिम कोमलता या आकर्षण पैदा करे और न महिला। बल्कि दोनों सामान्य, स्वाभाविक और गंभीर ढंग से बात करें। अल्लाह तआला ने उम्महातुल-मोमिनीन को संबोधित करते हुए फ़रमाया :
فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَعْرُوفًا
"तो तुम बात करने में ऐसी कोमलता न दिखाओ कि जिसके दिल में रोग है वह लालच में पड़ जाए, बल्कि सीधी और भली बात कहा करो।" (सूरतुल-अहज़ाब : 32)
- प्रेम या आकर्षण का संकेत देने वाले शब्दों से बचना
ऐसे शब्द, वाक्य या संकेत न प्रयोग किए जाएँ जिनमें प्रेम, आकर्षण या भावनात्मक निकटता का अर्थ निकलता हो, या जो सामान्यतः स्त्री-पुरुष के निजी संबंधों में प्रयुक्त होते हैं।
- प्रभाव डालने की अत्यधिक कोशिश न करना
कुछ लोग हाथों के इशारों, चेहरे के हाव-भाव, शायरी, कहावतों या भावनात्मक वाक्यों के माध्यम से सामने वाले को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। यह एक ऐसा दरवाज़ा है जो शैतान स्त्री-पुरुष के बीच अवैध आकर्षण के लिए खोलता है।
इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह कहते हैं :
"सभी कवि अजनबी (ग़ैर-महरम) महिलाओं से बातचीत करने, उन्हें देखने और उनसे संबोधित होने में कोई बुराई नहीं समझते। जबकि यह शरीअत और स्वस्थ बुद्धि—दोनों के विरुद्ध है। इसमें मानव स्वभाव को ऐसी स्थिति में डालना है, जिसकी ओर वह स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है; क्योंकि पुरुष और स्त्री—दोनों में से प्रत्येक के भीतर दूसरे की ओर स्वाभाविक झुकाव और आकर्षण रखा गया है। और कितने ही लोग ऐसे हैं जो इसी कारण अपने दीन (धर्म) और अपनी दुनिया (सांसारिक जीवन) — दोनों में फ़ितने (परीक्षा) का शिकार हो चुके हैं।" (रौज़तुल-मुहिब्बीन, पृष्ठ 88)
और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।