फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने “'आरियत” (عارية) की परिभाषा इस प्रकार की है :
“किसी ऐसी वस्तु के लाभ (उपयोग) की अनुमति देना, जिसका उपयोग करना वैध हो और जिसका मूल अस्तित्व उपयोग के बाद भी बना रहे, ताकि उपयोग करने वाला उसे उसके मालिक को वापस कर सके।”
इस परिभाषा से वे वस्तुएँ बाहर हो जाती हैं जिनका उपयोग केवल उनके नष्ट हो जाने के साथ ही संभव होता है, जैसे भोजन और पेय पदार्थ (क्योंकि इन्हें उपयोग करने पर इनका मूल अस्तित्व समाप्त हो जाता है)।
'आरियत की वैधता क़ुरआन, सुन्नत और इज्मा’ (विद्वानों की सर्वसम्मति) से सिद्ध है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया : وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ “और वे सामान्य उपयोग की वस्तुएँ देने से रोकते हैं।” (सूरत अल-माऊन : 7) यहाँ “माऊन” से अभिप्राय उन वस्तुओं से है जिन्हें लोग आपस में एक-दूसरे को मंगनी देते हैं। अल्लाह ने उन लोगों की निंदा की है जो आवश्यकता होने पर ऐसी वस्तुएँ उपयोग के लिए देने से इनकार करते हैं। इस आयत से कुछ विद्वानों ने यह तर्क लिया है कि आवश्यकता पड़ने पर किसी को कोई चीज़ अस्थाई उपयोग के लिए देना अनिवार्य (वाजिब) हो जाता है। यही शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिय्या रहिमहुल्लाह का चयनित मत है, जब वस्तु का मालिक संपन्न (धनवान) हो।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अबू तलहा का घोड़ा उधार लिया था, इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सफ़वान बिन उमय्या से कवच (ज़िरह) उधार लिए थे।
किसी ज़रूरतमंद को कोई वस्तु उधार देना अल्लाह की निकटता का कार्य है, जिसके कारण उधार देने वाले को बड़ा पुण्य प्राप्त होता है ; क्योंकि यह नेक काम और तक़वा में सहयोग करने के अंतर्गत आता है।
‘आरियत के सही होने की चार शर्तें हैं :
पहली शर्त :
उधार देने वाला व्यक्ति स्वैच्छा से देने की योग्यता रखता हो। क्योंकि उधार देना एक प्रकार का स्वैच्छिक अनुदान है। इसलिए नाबालिग, पागल या मूर्खतापूर्ण आर्थिक व्यवहार करने वाले व्यक्ति की ओर से उधार देना सही नहीं है।
दूसरी शर्त :
उधार लेने वाला व्यक्ति इस योग्य हो कि उसे स्वैच्छिक अनुदान दिया जा सकता हो, अर्थात उसकी ओर से उसे स्वीकार करना सही हो।
तीसरी शर्त :
उधार दी गई वस्तु का उपयोग शरीअत के अनुसार वैध हो। इसलिए किसी मुस्लिम दास को किसी काफ़िर के उपयोग के लिए उधार देना वैध नहीं है, और न ही एहराम की अवस्था में किसी व्यक्ति को शिकार आदि देना वैध है। क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया :
وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ
“पाप और अत्याचार में एक-दूसरे की सहायता न करो।”
चौथी शर्त :
उधार दी गई वस्तु ऐसी हो जिससे लाभ उठाया जा सके और उपयोग के बाद भी वह बनी रहे। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया।
क्या उधार देने वाला अपनी वस्तु वापस ले सकता है?
उधार देने वाला व्यक्ति जब चाहे अपनी वस्तु वापस मांग सकता है। लेकिन यदि वस्तु वापस लेने से उधार लेने वाले को नुकसान पहुँचता हो, तो उसे तुरंत वापस लेने का अधिकार नहीं होगा। उदाहरण के लिए, यदि उधार देने वाला किसी व्यक्ति को उसका सामान ढोने के लिए नाव उधार देता है, तो जब तक नाव समुद्र में है, वह उसे वापस नहीं ले सकता। इसी तरह, यदि उधार देने वाला किसी को अपनी लकड़ियों (बीम) के सिरे रखने के लिए दीवार उधार देता है, तो जब तक लकड़ियाँ उस पर रखी हैं, वह दीवार वापस नहीं ले सकता।
उधार लेने वाले का कर्तव्य
उधार लेने वाले पर यह अनिवार्य है कि वह उधार ली गई वस्तु की अपने स्वयं के माल से भी अधिक सावधानी से रक्षा करे, ताकि वह उसे उसके मालिक को सुरक्षित लौटा सके।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया :
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا
“निश्चय ही अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को लौटा दो।” (सूरतुन निसा : 58)
यह आयत अमानतों को लौटाने की अनिवार्यता को दर्शाती है, और ‘आरियत भी अमानतों में शामिल है।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
أدِّ الأمانة إلى من ائتمنك
“जिसने तुम्हें अमानत सौंपी है, उसे उसकी अमानत लौटा दो।”
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि मनुष्य पर यह अनिवार्य है कि वह उसे सौंपी गई वस्तु की रक्षा करे और उसे उसके मालिक को सुरक्षित लौटाए। उधार ली गई वस्तु भी इसी सामान्य नियम में शामिल है, क्योंकि उधार लेने वाला उस वस्तु का अमानतदार होता है और उसे उन्हें वापस करना होता है। उसे केवल उसी सीमा तक वस्तु का उपयोग करने की अनुमति है जितनी समाज की प्रचलित परंपरा (उर्फ़) के अनुसार स्वीकार्य हो। इसलिए उसके लिए यह वैध नहीं कि वह उस वस्तु का अत्यधिक उपयोग करे जिससे वह नष्ट हो जाए, या उसे ऐसे काम में इस्तेमाल करे जिसके लिए वह उपयुक्त नहीं है। क्योंकि मालिक ने उसे ऐसे इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
هَلْ جَزَاءُ الْإِحْسَانِ إِلَّا الْإِحْسَانُ
“क्या उपकार का बदला उपकार के सिवा कुछ और हो सकता है?” (सूरत अर-रहमान : 60)
यदि गलत उपयोग के कारण वस्तु नष्ट हो जाए
यदि व्यक्ति वस्तु को उस उद्देश्य के अलावा किसी और काम में इस्तेमाल करे जिसके लिए उसे उधार लिया गया था, और वह नष्ट हो जाए, तो उसके लिए उसका मुआवज़ा (हर्जाना) देना अनिवार्य होगा। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : على اليد ما أخذت حتى تؤديه “जो वस्तु किसी के हाथ में आए, वह उसके जिम्मे रहती है, जब तक कि वह उसे वापस न कर दे।” (इसे हदीस के पाँच संकलनकर्ताओं - बुख़ारी, मुस्लिम, अबू दाऊद, तिरमिज़ी और नसाई - ने रिवायत किया है और हाकिम ने इसे सहीह कहा है।)
यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि जो वस्तु किसी दूसरे की मिल्कियत हो और वह किसी के कब्ज़े में आए, तो उसे उसके मालिक या उसके प्रतिनिधि को लौटाना आवश्यक है, इसके बिना वह ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
यदि सामान्य उपयोग के दौरान वस्तु नष्ट हो जाए
यदि उधार ली गई वस्तु सामान्य और स्वीकृत तरीके से उपयोग करने के दौरान नष्ट हो जाए, तो उधार लेने वाला उसका जिम्मेदार नहीं होगा। क्योंकि उधार देने वाले (मालिक) ने उसे उस तरीक़े से उपयोग करने की अनुमति दी थी, और जो परिणाम वैध अनुमति के अंतर्गत उत्पन्न हो, उसका हर्जाना नहीं होता।
यदि बिना लापरवाही के वस्तु नष्ट हो जाए तो क्या हर्जाना देना होगा?
अगर उधार ली गई चीज़ उधार लेने वाले के पास उस उद्देश्य के अलावा किसी और उद्देश्य में इस्तेमाल करने से नष्ट हो जाए, तो उसकी ज़िम्मेदारी के विषय में विद्वानों का मतभेद है। विद्वानों के एक समूह का कहना है कि हर स्थिति में उधार लेने वाले पर हर्जाना अनिवार्य होगा, चाहे उसने लापरवाही की हो या नहीं। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फरमान का अर्थ सामान्य है : على اليد ما أخذت حتى تؤديه » जो वस्तु किसी के हाथ में आए, वह उसके जिम्मे रहती है, जब तक कि वह उसे वापस न कर दे।” उदाहरण के लिए, अगर उधार लिया गया जानवर मर जाए, या कपड़ा जल जाए, या उधार दी गई वस्तु चोरी हो जाए। जबकि विद्वानों के दूसरे समूह का मत यह है कि यदि उसने कोई लापरवाही या अतिक्रमण नहीं किया, तो वह जिम्मेदार नहीं होगा। क्योंकि हर्जाना तभी अनिवार्य होता है जब व्यक्ति ने गलती, लापरवाही या अतिक्रमण किया हो।
यही मत अधिक प्रबल (राजेह) प्रतीत होता है, क्योंकि उधार लेने वाले ने वस्तु मालिक की अनुमति से प्राप्त की थी, इसलिए वह उसके पास उसी प्रकार अमानत है जैसे वदीअह (सुरक्षित रखने के लिए जमा की गई वस्तु) होती है।
फिर भी उधार लेने वाले पर यह अनिवार्य है कि वह उधार ली गई वस्तु की पूरी सुरक्षा करे, उसकी अच्छी तरह देखभाल करे और उसका काम समाप्त होते ही उसे शीघ्रता से उसके मालिक को लौटा दे। तथा उसकी देखभाल करने में कोई लापरवाही न बरते और उसे नुकसान या विनाश के जोखिम में न डाले। क्योंकि वह वस्तु उसके पास एक अमानत है। और इसलिए भी कि उसके मालिक ने उसके साथ उपकार किया है। और अल्लाह तआला का कथन है :
هَلْ جَزَاءُ الْإِحْسَانِ إِلَّا الْإِحْسَانُ
“क्या उपकार का बदला उपकार के अतिरिक्त कुछ और हो सकता है?”