आख़िरत में शफ़ाअत (सिफ़ारिश)

प्रश्न: 21672

शफ़ाअत (सिफ़ारिश) क्या है? क्या इसके कई प्रकार हैं? क्या सभी लोग शफ़ाअत करेंगे या केवल अंबिया (अलैहिमुस्सलाम) ही को इसकी अनुमति होग ? क्या कुछ ऐसे लोग भी होंगे जिनकी शफ़ाअत स्वीकार नहीं की जाएगी?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

जब क़ियामत के दिन "मैदाने-महशर" में लोगों की हालत बहुत कठिन हो जाएगी और उनके खड़े रहने की अवधि बहुत लंबी हो जाएगी, जबकि वे गर्मी, भय और कष्टों से गुज़र रहे होंगे। जिसके बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं :

"तुम्हारा क्या हाल होगा जब अल्लाह तुम्हें इस प्रकार इकट्ठा करेगा जैसे तीरों को तरकश में रखा जाता है, पचास हज़ार साल तक, फिर अल्लाह तुम्हारी ओर नज़र भी न करेगा।” (सिलसिला सहीहा : 2817)

ऐसी स्थिति में लोग ऊँचे दर्जों वाले लोगों को ढूँढेंगे कि वे उनके रब के पास उनके लिए सिफ़ारिश करें ताकि उनकी कठिनाई दूर हो सके और अल्लाह बंदों के बीच फ़ैसला करने के लिए आए।

सबसे पहले वे आदम (अलैहिस्सलाम) के पास जाएंगे, लेकिन वह माज़रत कर लेंगे। फिर वे नूह (अलैहिस्सलाम) के पास जाएंगे, वे भी माज़रत कर लेंगे। इसके बाद वे (बारी-बारी) इब्राहीम (अलैहिस्सलाम), मूसा (अलैहिस्सलाम) और फिर ईसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाएँगे, लेकिन वे सभी माज़रत कर लेंगे। अंत में लोग हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास जाएँगे, तो आप फरमाएँगे : "मैं ही इसके योग्य हूँ, मैं ही इसके योग्य हूँ!" फिर आप मैदाने-महशर में उपस्थित लोगों के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगे कि उनके बीच फैसला हो। यही वह "मक़ामे-मह्मूद" (प्रशंसनीय स्थान) है जिसका वादा अल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से किया है, जैसा कि अल्लाह के इस कथन में है :  وَمِنْ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ عَسَى أَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا "तथा आप रात के कुछ समय में उठकर नमाज़ (तहज्जुद) पढ़िए। यह आपके लिए अतिरिक्त है। क़रीब है कि आपका पालनहार आपको "मक़ामे-मह्मूद" पर खड़ा करे।" (सूरतुल इसरा : 79)

अब हम शफ़ाअत से संबंधित विस्तृत हदीस का उल्लेख कर रहे हैं। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमसे फरमाया : "क़ियामत के दिन लोग व्याकुल होंगे और एक-दूसरे से भागेंगे। फिर वे आदम (अलैहिस्सलाम) के पास आएंगे और कहेंगे : "आप हमारे लिए अपने रब के पास सिफ़ारिश करें।" तो वह कहेंगे : "मैं इसके योग्य नहीं हूँ, लेकिन तुम इबराहीम (अलैहिस्सलाम) के पास जाओ, क्योंकि वे रहमान के ख़लील (घनिष्ठ मित्र) हैं।" फिर वे इबराहीम (अलैहिस्सलाम) के पास जाएंगे, तो वह कहेंगे : "मैं इसके योग्य नहीं हूँ, लेकिन तुम मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाओ, क्योंकि वह कल़ीमुल्लाह (अल्लाह से बात करने वाले) हैं।" फिर वे मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाएंगे, तो वह कहेंगे : "मैं इसके योग्य नहीं हूँ, लेकिन तुम ईसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाओ, क्योंकि वह अल्लाह की रूह और उसका कलिमा हैं।" फिर वे ईसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाएंगे, तो वह कहेंगे : "मैं इसके योग्य नहीं हूँ, लेकिन तुम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास जाओ।" फिर वे मेरे पास आएंगे, तो मैं कहूँगा : "मैं ही इसके योग्य हूँ।" फिर मैं अपने रब से अनुमति माँगूंगा, तो मुझे अनुमति दी जाएगी। अल्लाह अपनी प्रशंसा तथा स्तुति की ऐसी-ऐसी बातें मेरे दिल मे डाल देगा, जो मुझे इस समय याद नहीं। मैं अल्लाह की प्रशंसा व स्तुति करूँगा। फिर अल्लाह फरमाएगा : "ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ। तुम जो कहोगे सुना जाएगा, तुम माँगो तुम्हें दिया जाएगा तथा सिफ़ारिश करो तुम्हारी सिफ़ारिश स्वीकार की जाएगी।" मैं कहूंगा : "ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत, मेरी उम्मत!" तो अल्लाह कहेगा : "जाओ और जिस व्यक्ति के दिल में जौ के दाने के बराबर भी ईमान हो, उसे निकाल लाओ।" मैं जाऊंगा और ऐसा करूंगा। फिर मैं लौटकर अल्लाह की वही प्रशंसा करूंगा और सजदा करूंगा। फिर अल्लाह कहेगा : "ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ, जो कहोगे सुना जाएगा, जो मांगोगे दिया जाएगा और जिसकी सिफ़ारिश करोगे वह स्वीकार की जाएगी।" मैं कहूंगा : "ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत, मेरी उम्मत!" फिर अल्लाह कहेगा : "जाओ और जिस व्यक्ति के दिल में कण या राई के दाने के बराबर भी ईमान हो, उसे निकाल लाओ।" मैं जाऊंगा और ऐसा करूंगा। फिर मैं लौटकर अल्लाह की वही प्रशंसा करूंगा और सजदा करूंगा। फिर अल्लाह कहेगा : "ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ, जो कहोगे सुना जाएगा, जो मांगोगे दिया जाएगा और जिसकी सिफ़ारिश करोगे वह स्वीकार की जाएगी।" मैं कहूंगा : "ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत, मेरी उम्मत!" फिर अल्लाह कहेगा : "जाओ और जिस व्यक्ति के दिल में ज़रा-सा भी ईमान हो, उसे जहन्नम से निकाल लो।" मैं जाऊंगा और ऐसा ही करूंगा।

(रावी कहते हैं कि) इसके बाद जब हम अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) के पास से निकले, तो मैंने अपने कुछ साथियों से कहा: "अगर हम हसन बसरी के पास जाएँ, जो अबू खलीफा के घर में छिपे हुए हैं, और उन्हें वह बात बताएँ जो अनस बिन मालिक ने हमें सुनाई है?" अतः हम उनके पास पहुँचे, उन्हें सलाम किया, और उन्होंने हमें अंदर आने की अनुमति दे दी। हमने उनसे कहा: "ऐ अबू सईद! हम आपके भाई अनस बिन मालिक के पास से आए हैं, और हमने सिफ़ारिश (शफ़ाअत) के बारे में वैसी कोई बात नहीं सुनी जैसी उन्होंने हमें बताई।" तो उन्होंने कहा : "बयान करो!" फिर हमने उन्हें (अनस बिन मालिक की) हदीस सुनाई। जब हम इस हिस्से तक पहुँचे, तो उन्होंने फिर कहा: "बयान करो!" हमने कहा : "उन्होंने हमें इससे अधिक कुछ नहीं बताया।" तो उन्होंने कहा : "उन्होंने यह हदीस मुझे बीस साल पहले सुनाई थी, जब वह पूरी तरह स्वस्थ और मज़बूत याददाश्त वाले थे। अब मैं नहीं जानता कि वह इसे भूल गए या उन्होंने इसलिए नहीं बताया कि कहीं तुम इस पर ही निर्भर न हो जाओ।" हमने कहा : "ऐ अबू सईद! तो आप हमें बताइए।" वह हँस पड़े और कहा : "इंसान जल्दबाज़ पैदा किया गया है।" मैंने इस बात का उल्लेख सिर्फ इसीलिए किया है कि मैं तुमसे वह हदीस बयान करना चाहता हूँ। उन्होंने मुझसे वह हदीस उसी तरह बयान की जिस तरह तुमसे बयान की। फिर आगे उन्होंने बयान किया : "फिर मैं चौथी बार वापस लौटूँगा और अल्लाह की उन्हीं प्रशंसा के शब्दों के साथ उसकी स्तुति करूँगा, फिर उसके सामने सजदे में गिर जाऊँगा। तब कहा जाएगा : “ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ, कहो—तुम्हारी बात सुनी जाएगी, माँगो—तुम्हें दिया जाएगा, और शफ़ाअत करो—तुम्हारी शफ़ाअत स्वीकार की जाएगी।” तब मैं कहूँगा : "ऐ मेरे रब! मुझे उन लोगों को (जहन्नम से) निकालने की अनुमति दे दे, जिन्होंने (दिल से) "ला इलाहा इल्लल्लाह" (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं) कहा था। तो अल्लाह फरमाएगा : "मेरी इज़्ज़त, मेरे जलाल, मेरी बड़ाई और मेरी महानता की क़सम! मैं उन लोगों को जहन्नम से ज़रूर निकालूँगा, जिन्होंने "ला इलाहा इल्लल्लाह" कहा होगा।" [इस हदीस को बुखा़री (हदीस संख्या : 7510) ने रिवायत किया है।]

तथा अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया गया है कि अल्लाह के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क़ियामत के दिन मैं लोगों का सरदार रहूँगा। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों होगा? अल्लाह तआला अगले तथा पिछले सब लोगों को एक बड़े तथा समतल मैदान में जमा करेगा, जहाँ आवाज़ देने वाले की आवाज़ सब को पहुँच सकेगी और देखने वाला सब को देख सकेगा और सूरज बहुत नज़दीक होगा। लोगों को असहनीय दुःख तथा कष्ट का सामना होगा। अतः, लोग आपस में कहेंगे : क्या तुम नहीं देखते कि कैसी तकलीफ़ में पड़ चुके हो? तुम किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश क्यों नहीं करते, जो तुम्हारे रब के सामने तुम्हारी सिफ़ारिश कर सके? फिर आपस में एक-दूसरे से कहेंगे कि आदम (अलैहिस्सलाम) के पास चलो। अतः, वे आदम (अलैहिस्सलाम) के पास आएँगे।.....

आगे उन्होंने पूरी हदीस बयान किया और आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - का यह कथन उल्लेख किया कि:

"अतः मैं चल पड़ूँगा और अर्श के नीचे जाकर अपने रब के सामने सजदे में गिर जाऊँगा। फिर अल्लाह अपनी प्रशंसा तथा स्तुति की ऐसी-ऐसी बातें मेरे दिल मे डाल देगा, जो मुझसे पहले किसी के दिल में नहीं डाली गई होंगी। चुनाँचे मैं उसी के अनुसार अल्लाह की प्रशंसा व स्तुति करूँगा। फिर कहा जाएगा : “ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ, कहो—तुम्हारी बात सुनी जाएगी, माँगो—तुम्हें दिया जाएगा, और शफ़ाअत करो—तुम्हारी शफ़ाअत स्वीकार की जाएगी।” अतः मैं सिर उठाऊँगा और कहूँगा : ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत पर रहम फ़रमा। ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत पर दया करे। ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत पर रहम फ़रमा। चुनाँचे कहा जाएगा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत के उन लोगों को, जिनका हिसाब नहीं होगा, जन्नत के दाएँ दरवाज़े से दाख़िल करो। जबकि वे अन्य लोगों के साथ, दूसरे दरवाज़ों से भी जन्नत में प्रवेश कर सकते हैं।” फिर आपने फरमाया : “क़सम है उस ज़ात की जिसके हाथ में मेरी जान है! जन्नत के दरवाज़ों के दो पटों के बीच की दूरी मक्का और हिमयर या मक्का और बुसरा के बीच की दूरी के बराबर है।” [इसे बुखारी (हदीस संख्या : 4712) ने रिवायत किया है।]

तो यह सबसे बड़ी सिफ़ारिश (शफ़ाअते-उज़्मा) है, जो मैदाने-महशर में होगी और यह सिफ़ारिश फ़ैसला शुरू करवाने के लिए होगी। क़ियामत के दिन शफ़ाअत (सिफ़ारिश) दो तरह की होगी :

  1. स्वीकार्य या प्रमाणित सिफ़ारिश : यह वह सिफ़ारिश है जो शरीय़त के नुसूस (क़ुरआन और सुन्नत) से प्रमाणित है। इसका विस्तृत विवरण आगे आएगा।
  2. अस्वीकृत या निषिद्ध सिफ़ारिश : यह वह सिफ़ारिश है जिसे क़ुरआन और सुन्नत के नुसूस में नमाकर दिया गया है। इसका भी विवरण आगे आएगा।

स्वीकार की गई शफ़ाअत के कई प्रकार हैं :

  1. सबसे बड़ी शफ़ाअत (शफ़ाअते-उज़्मा): यह वही "मक़ामे-महमूद" है, जिसकी तमन्ना तमाम पिछले और अगले लोग करेंगे और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अनुरोध करेंगे कि आप अल्लाह के पास उनके लिए सिफ़ारिश करें ताकि महशर के दिन की भयानक परिस्थितियों से उन्हें निजात मिले। इस शफ़ाअत का पहले ही वर्णन किया जा चुका है।
  2. बड़े गुनाह करने वाले एकेश्वरवादियों के लिए शफ़ाअत, जो जहन्नम में डाल दिए गए होंगे, ताकि उन्हें निकाला जाए। अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मेरी शफ़ाअत मेरी उम्मत के उन लोगों के लिए होगी जिन्होंने बड़े गुनाह किए हैं।" (सहीह सुनन तिर्मिज़ी : 1983)
  3. रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शफ़ाअत उन लोगों के लिए जिनकी नेकियाँ और बुराइयाँ बराबर होंगी कि वे जन्नत में प्रवेश कर सकें। इसी तरह, उन लोगों के लिए भी सिफ़ारिश होगी जिन्हें जहन्नम में प्रवेश करने का हुक्म दिया गया होगा, कि वे उसमें प्रवेश न करें।
  4. कुछ लोगों को बिना हिसाब के जन्नत में दाख़िल कराने की शफ़ाअत।
  5. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अपने चाचा अबू तालिब के लिए शफ़ाअत: ताकि जहन्नम की सज़ा में उनके लिए कुछ कमी कर दी जाए। यह शफ़ाअत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए ख़ास है और यह केवल उनके चाचा अबू तालिब के लिए होगी।
  6. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ईमान वालों को जन्नत में प्रवेश की अनुमति दिलाने की शफ़ाअत।

गुनाहगारों और नाफ़रमानों के हित में शफ़ाअत सिर्फ़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ खास नहीं है, बल्कि अन्य नबियों, शहीदों, विद्वानों, नेक लोगों और फ़रिश्तों को भी शफ़ाअत की अनुमति दी जाएगी। यहाँ तक कि इंसान का नेक अमल भी उसके लिए शफ़ाअत कर सकता है। लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शफ़ाअत का सबसे बड़ा हिस्सा प्राप्त होगा।

शफ़ाअत से संबंधित हदीसों में से एक हदीस यहाँ आपके लिए प्रस्तुत की जा रही है, जो यह दर्शाती है कि नबियों और अन्य लोगों को भी शफ़ाअत का अधिकार मिलेगा।

अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हम क़ियामत के दिन अपने रब को देखेंगे? … और फिर उन्होंने पूरी हदीस का उल्लेख किया, यहाँ तक कि उन्होंने इस हिस्से का वर्णन किया कि कैसे ईमान वाले पुल-सिरात को पार करेंगे और फिर अपने उन भाइयों के लिए सिफारिश करेंगे जो जहन्नम में प्रवेश कर चुके होंगे। (वे कहेंगे : “ऐ हमारे रब! ये हमारे भाई थे, हमारे साथ नमाज़ पढ़ते थे, हमारे साथ रोज़े रखते थे और हमारे साथ (नेक) अमल करते थे।” तब अल्लाह तआला फ़रमाएगा : “जाओ, और जिसके दिल में एक दीनार के बराबर भी ईमान पाओ, उसे (जहन्नम से) निकाल लो।”  अल्लाह उनके चेहरों को जहन्नम की आग पर हराम कर देगा। वे उनके पास आएँगे, तो कोई अपने क़दमों तक आग में फँसा होगा और कोई आधी पिंडली तक। जिन्हें वे पहचान पाएँगे, उन्हें निकाल लेंगे। फिर लौटकर जाएँगे, तो अल्लाह कहेगा : फिर जाओ और जिसके दिल में आधे दीनार के बराबर भी ईमान पाओ, उसे निकाल लो। वे जाएँगे और जिन्हें पहाचन सकेंगे, उन्हें निकाल लाएँगे। फिर लौटकर जाएँगे, तो अल्लाह कहेगा : जाओ और जिसके दिल में कण भर भी ईमान हो, उसे भी निकाल लाओ। वे जाएँगे और जिन्हें पहाचन सकेंगे, उन्हें निकाल लाएँगे।) अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं : यदि तुम्हें मेरी बात सच्ची न लगे, तो यह आयत पढ़ो :  إِنَّ اللَّهَ لا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا “अल्लाह एक कण बराबर भी किसी पर अत्याचार नहीं करता, यदि (किसी ने) कोई नेकी (की) हो, तो उसे कई गुना बढ़ा देता है।” चुनाँचे नबीगण, फरिश्ते और मोमिन बंदे सिफ़ारिश करेंगे। फिर सर्वशक्तिमान अल्लाह कहेगा : अब मेरी सिफ़ारिश शेष रह गई है। चुनाँचे जहन्नम से एक मुट्ठी उठाएगा और ऐसे लोगों को निकालेगा, जो जल चुके होंगे। फिर उन्हें जन्नत के सामने वाली नहर में डाला जाएगा, जिसे जीवन-जल कहा जाता है। वे उसके दोनों किनारों पर इस प्रकार उग उठेंगे, जैसे सैलाब के झाग में पौधे उग आते हैं। तुमने किसी चट्टान के किनारे और पेड़ के किनारे पौधों को उगते देखा होगा। उनका जो भाग सूर्य की ओर होता है, वह हरा होता है और जो साए की ओर होता है, वह सफ़ेद होता है। चुनाँचे वे ऐसे निकलेंगे, जैसे मोती हों। फिर उनकी गर्दनों पर मुहरें लगा दी जाएँगी और वे जन्नत में प्रवेश करेंगे। उन्हें देखकर जन्नत वाले कहेंग : ये दयावान अल्लाह के द्वारा मुक्त किए हुए लोग हैं। अल्लाह ने इन्हें इनके द्वारा किए गए किसी कार्य और इनके द्वारा आगे भेजी गई किसी भलाई के बिना ही जन्नत में दाख़िल किया है। उनसे कहा जाएगा : तुम्हारे लिए वह है, जो तुम देख रहे हो और उसके साथ उसके समान और भी।" [इसे बुखारी (हदीस संख्या : 7440) ने रिवायत किया है।]

क़ियामत के दिन शफ़ाअत तभी होगी जब तीन शर्तें पूरी हों, जैसा कि कु़रआने करीम की निम्नलिखित आयतों से पता चलता है :

  1.  وَكَمْ مِنْ مَلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئاً إِلَّا مِنْ بَعْدِ أَنْ يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَرْضَى "और आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते हैं कि उनकी सिफ़ारिश कुछ लाभ नहीं देगी, परंतु इसके पश्चात कि अल्लाह अनुमति दे जिसके लिए चाहे तथा (जिसे) पसंद करे।" [सूरत अन-नज्म : 26]
  2.  يَوْمَئِذٍ لا تَنْفَعُ الشَّفَاعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَنُ وَرَضِيَ لَهُ قَوْلاً "उस दिन सिफ़ारिश लाभ नहीं देगी, परंतु जिसके लिए रहमान अनुज्ञा दे और जिसके लिए वह बात करना पसंद करे।" [सूरत ता-हा : 109]
  3.  يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلا يَشْفَعُونَ إِلا لِمَنِ ارْتَضَى وَهُمْ مِنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ "वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनके पीछे है। और वे सिफ़ारिश नहीं करते, परंतु उसी के लिए जिसे वह पसंद करे। तथा वे उसी के भय से डरने वाले हैं।" [सूरत अल-अंबिया : 28]
  4.  مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلا بِإِذْنِهِ "कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश करे?" [सूरत अल-बक़रह : 255]

वे तीनों शर्तों ये हैं :

  1. अल्लाह सुब्हानहु व तआला की शफ़ाअत करने वाले को शफ़ाअत करने की अनुमति हो।
  2. शफ़ाअत करने वाले से अल्लाह राज़ी हो ।
  3. जिसके लिए शफ़ाअत की जा रही है, उससे भी अल्लाह राज़ी हो।

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से वर्णित है कि क़ियामत के दिन कुछ लोगों की शफ़ाअत स्वीकार नहीं की जाएगी, उनमें वे लोग शामिल हैं जो अत्यधिक ला’नत (शाप) भेजते हैं। जैसा कि अबू दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सुना है कि आपने फरमायाः “जो लोग बहुत अधिक लानत भेजते हैं, वे क़ियामत के दिन न गवाह बनेंगे और न शफ़ाअत करने वाले।” [इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2598) ने रिवायत किया है।]

जहाँ तक अस्वीकृत और अमान्य शफ़ाअत की बात है, तो यह वह शफ़ाअत है जिसमें स्वीकार्य शफ़ाअत की शर्त यानी अल्लाह की अनुमति अथवा उसकी प्रसन्नता न पाई जाए। जैसे कि वह शफ़ाअत जिसकी मूर्तिपूजक (मुश्रिकीन) अपने उपास्यों और देवताओं के बारे में आस्था रखते हैं। क्योंकि वे केवल इस आस्था के कारण उनकी पूजा करते हैं कि वे अल्लाह के पास उनकी सिफारिश करेंगे और यह कि वे उनके तथा अल्लाह के बीच माध्यम हैं। अल्लाह तआला फरमाता है :

أَلا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَى إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ إِنَّ اللَّهَ لا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ

"सुन लो! ख़ालिस (विशुद्ध) धर्म केवल अल्लाह ही के लिए है। तथा जिन लोगों ने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं (वे कहते हैं कि) हम उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से क़रीब कर दें। निश्चय अल्लाह उनके बीच उसके बारे में निर्णय करेगा, जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निःसंदेह अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं करता, जो झूठा, बड़ा नाशुक्रा हो।" (सूरत अज़-ज़ुमर : 3)

अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि इस प्रकार की शफ़ाअत व्यर्थ है, इसकी कोई वास्तविकता नहीं है, और न ही इसका कोई लाभ और फायदा होगा। अल्लाह तआला फ़रमाता है :  فَمَا تَنْفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِعِينَ  "तो उन्हें सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश लाभ नहीं देगी।" (सूरत अल-मुद्दस्सिर : 48) तथा फरमाया :

وَاتَّقُوا يَوْماً لا تَجْزِي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْئاً وَلا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَاعَةٌ وَلا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلا هُمْ يُنْصَرُونَ

"तथा उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ काम न आएगा, और न उससे कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश) स्वीकार की जाएगी, और न उससे कोई फ़िदया (दंड राशि) लिया जाएगा और न उनकी मदद की जाएगी।" (सूरत अल-बक़रह : 48) तथा अल्लाह तआला फरमाता है :

وَاتَّقُوا يَوْماً لا تَجْزِي نَفْسٌ عَنْ نَفْسٍ شَيْئاً وَلا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلا تَنْفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلا هُمْ يُنْصَرُونَ

"तथा उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ काम न आएगा, और न उससे कोई फ़िदया (दंड राशि) स्वीकार किया जाएगा और न उसे कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश) लाभ देगी, और न उनकी मदद की जाएगी।" (सूरत अल-बक़रह : 123) और फरमाया :

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنْفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاكُمْ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَأْتِيَ يَوْمٌ لا بَيْعٌ فِيهِ وَلا خُلَّةٌ وَلا شَفَاعَةٌ وَالْكَافِرُونَ هُمُ الظَّالِمُونَ

"ऐ ईमान वालो! उसमें से ख़र्च करो, जो हमने तुम्हें दिया है, इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई दोस्ती और न कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश)। तथा काफ़िर लोग ही अत्याचारी हैं।" (सूरत अल-बक़रह : 254)

इसीलिए अल्लाह तआला अपने ख़लील (प्रिय मित्र) इबराहीम (अलैहिस्सलाम) की अपने मूर्तिपूजक पिता आज़र के लिए की जाने वाली सिफारिश को स्वीकार नहीं करेगा। जैसा कि अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “इबराहीम (अलैहिस्सलाम) क़ियामत के दिन अपने पिता आज़र से मिलेंगे, जबकि आज़र के चेहरे पर कालिमा छाई होगी और उनका चेहरा धूल ग्रस्त होगा। इबराहीम (अलैहिस्सलाम) उससे कहेंगे : "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मेरी अवज्ञा मत करो?" उनके पिता कहेंगे : "आज मैं आपकी अवज्ञा नहीं करूंगा।"

फिर इबराहीम (अलैहिस्सलाम) कहेंगे : "ऐ मेरे रब! तूने मुझसे वादा किया था कि जिस दिन लोग पुनः जीवित किए जाएंगे, उस दिन तू मुझे रुसवा नहीं करेगा, तथा मेरे लिए इससे बढ़कर रुसवाई और क्या होगी कि मेरा पिता (तेरी रहमत से) दूर अति दूर कर दिया जाए?" तो अल्लाह तआला फ़रमाएगा : "मैंने काफिरों पर जन्नत को हराम कर दिया है।" फिर (इबराहीम अलैहिस्सलाम से) कहा जाएगा : "ऐ इबराहीम! देखो, तुम्हारे पैरों के नीचे क्या है?" जब वे देखेंगे, तो वहाँ कीचड़ में लथपथ एक गंदा जानवर (धाभ) होगा, जिसे उसके पैरों से पकड़कर जहन्नम में फेंक दिया जाएगा।)

[इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 3350) ने रिवायत किया है।]

संदर्भ

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर