तहलील विवाह (हलाला) क्या है?

प्रश्न: 222367

‘तहलील’ विवाह (हलाला) का क्या मतलब है?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

सर्व प्रथम :

यदि पति ने अपनी पत्नी को दो बार तलाक़ दी है, तो उसे अपनी पत्नी को वापस लौटाने का विकल्प (अवसर) दिया गया है। इसे “तलाक़े-रजई” (वापसी योग्य तलाक़) कहा जाता है। अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया :

الطَّلاقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ

البقرة/ 229

“यह तलाक़ दो बार है। फिर या तो अच्छे तरीक़े से रख लेना है, या नेकी के साथ छोड़ देना है।” [सूरत अल-बक़रा 2:229]

फिर यदि वह उसे तीसरी बार तलाक़ दे देता है, तो वह महिला उस पर हराम (नाजायज़) हो जाती है। अब वह उससे नए विवाह अनुबंध और नए महर के साथ दोबारा शादी नहीं कर सकता, जब तक कि वह (महिला) किसी अन्य पुरुष से सही निकाह न कर ले, ऐसा निकाह जो सच्ची इच्छा से किया गया हो। फिर वह (दूसरा पती) उसके साथ वास्तविक दांपत्य संबंध बनाए, फिर वह अपनी इच्छा से उसे तलाक़ दे दे, या उसकी मृत्यु हो जाए। अल्लाह तआला फरमाता है :

فَإِنْ طَلَّقَهَا فَلا تَحِلُّ لَهُ مِنْ بَعْدُ حَتَّى تَنْكِحَ زَوْجاً غَيْرَهُ فَإِنْ طَلَّقَهَا فَلا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يَتَرَاجَعَا إِنْ ظَنَّا أَنْ يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ

البقرة/ 230

‘‘फिर यदि वह उसे (तीसरी) तलाक़ दे दे, तो उसके बाद वह उसके लिए ह़लाल (वैध) नहीं होगी, यहाँ तक कि उसके अलावा किसी अन्य पति से विवाह करे। फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो (पहले) दोनों पर कोई पाप नहीं कि दोनों आपस में रुजू' (दोबारा मिलाप) कर लें, यदि वे दोनों समझें कि अल्लाह की सीमाओं को क़ायम रखेंगे। और ये अल्लाह की सीमाएँ हैं, वह उन्हें उन लोगों के लिए खोलकर बयान करता है, जो ज्ञान रखते हैं।” (सूरत अल-बक़रा 2:230)

आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि : “रिफ़ाअह अल-क़ुरज़ी रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक औरत से निकाह किया, फिर उसे तीसरी बार तलाक दे दी। तो वह औरत दूसरे आदमी से विवाह कर बैठी। फिर वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में आई। और उसने बताया कि वह (दूसरा पति) उसके पास नहीं आता (अर्थात: वह उसके साथ दांपत्य संबंध स्थापित नहीं करता, और पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने समझ लिया कि वह रिफ़ाअह के पास वापस जाना चाहती है।) तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “नहीं — जब तक तुम उसकी मिठास न चख लो और वह तुम्हारी मिठास न चख ले।” (यह वास्तविक दांपत्य संबंध का संकेत है) इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5011) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1433) ने रिवायत किया है।

दूसरा :

तलाक़ देने वाले व्यक्ति या महिला के लिए अल्लाह की शरीअत को दरकिनार करके एक-दूसरे के पास लौटने के लिए छल का सहारा लेना जायज़ नहीं है, जिसे "तहलील विवाह" (या हलाला) कहा जाता है। यह एक अनुबंध है जिसके कई रूप होते हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं :

  1. तलाक देने वाला पति, या (तलाक़शुदा) पत्नी या उसका अभिभावक एक मानव “सांड” किराए पर लेता है और उसपर शर्त रखता है कि वह उसकी तलाक़शुदा पत्नी से विवाह करे, उसके पास प्रवेश करे (उसके साथ एकांत में हो), और फिर उसे तलाक दे दे, इसके साथ ही वह उसे एक निश्चित राशि देता है।
  2. कोई पुरुष बिना किसी पूर्व सहमति के उस तलाकशुदा महिला से विवाह करता है, इस इरादे से कि वह उसे पहले पति के लिए जायज़ बना दे, और फिर उसे तलाक दे देता है।

‘‘तहलील” का विवाह (या दूसरे शब्दों में “हलाला”) एक निषिद्ध (हराम) और अमान्य अनुबंध है, और इसे करने वाला शाप (ला’नत) का पात्र है।

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस व्यक्ति पर शाप दिया जो किसी औरत को (उसके पूर्व पति के लिए) हलाल बनाता है और उस व्यक्ति पर भी जिसके लिए वह हलाल बनाई गई है।" इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 1120) ने रिवायत करके सहीह कहा है, तथा इसे नसई (हदीस संख्या : 3416) ने भी रिवायत किया है।

हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

"इसे इब्ने अल-क़त्तान और इब्ने दक़ीक़ अल-ईद ने बुख़ारी की शर्तों के अनुसार सहीह ठहराया है।"

"अत-तल्ख़ीस अल-हबीर" (3/372) से उद्धरण समाप्त हुआ।

इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह ने कहा : "आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का उन दोनों पर ला’नत भेजना : या तो सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से उन पर श्राप घटित होने की सूचना है, या उन पर श्राप की प्रार्थना (बद्दुआ) है। यह इसके निषिद्ध होने को दर्शाता है और इस बात को कि यह बड़े पापों में से है।" "ज़ादुल-मआ'द फ़ि हद्ये ख़ैरिल-इबाद" (5/672) से उद्धरण समाप्त हुआ।

उक़बह बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : "क्या मैं तुम्हें उधार लिए गए सांड के बारे में न बताऊँ?" उन्होंने कहा : "क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल।" आपने फ़रमाया : "वह हलाला करने वाला (अर्थात् : तलाकशुदा औरत से शादी करके उसे उसके पूर्व पति के लिए हलाल करने वाला) व्यक्ति है। अल्लाह उस पर लानत करे जो तलाकशुदा औरत से शादी करके उसे उसके पूर्व पति के लिए हलाल बनाता है और उस व्यक्ति पर जिसके लिए उसे हलाल किया गया है।" इसे इब्ने माजा (हदीस संख्या : 1936) ने रिवायत किया है, और अल्बानी ने "सहीह इब्ने माजा" में इसे हसन कहा है।

इन हदीसों से पता चलता है कि तहलील विवाह (हलाला) निषिद्ध (हराम) है, और वह बड़े गुनाहों में से है, तथा उसकी अमान्यता का भी पता चलता है।

‘‘अल-मौसूआ अल-फ़िक़्हिय्या” (10/256, 257) में कहा गया है :

"अधिकांश विद्वानों —मालिकिय्या, शाफेइय्या, हनाबिला और हनफिय्या में से अबू यूसुफ़— ने उपर्युक्त दोनों हदीसों के आधार पर इस विवाह को अमान्य घोषित किया है। इसके अलावा, तलाकशुदा महिला को उसके पूर्व पति के लिए जायज़ बनाने की शर्त वाला विवाह अनिवार्य रूप से एक अस्थायी विवाह है, और विवाह में एक समय सीमा निर्धारित करने से यह अमान्य हो जाता है। अब चूँकि यह विवाह अमान्य है, इसलिए इसका उपयोग तलाकशुदा महिला को उसके पूर्व पति के लिए वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। इसकी पुष्टि उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के कथन से होती है : “अल्लाह की क़सम! अगर मेरे पास कोई हलाला करने वाला और हलाला कराने वाला लाया जाए, तो मैं उन दोनों को पत्थरों से मार डालूँगा।'" उद्धरण समाप्त।

शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह ने कहा :

"यह सबसे घिनौने झूठ और सबसे बड़ी भ्रष्टता में से एक है। और अर्थ की दृष्टि से वह व्यभिचारी (ज़िना करने वाला) है ; क्योंकि उसने (उस महिला से) शादी इस लिए नहीं की, कि वह उसकी पत्नी बने, उसे पवित्रता प्रदान करे, उसके पास रहे, उसकी रक्षा करे, और उससे संतान की आशा हो — नहीं, बल्कि वह तो एक किराए का सांड बनकर आया है, सिर्फ इसलिए कि वह एक बार संबंध बनाए और उसे उसके पहले पति के लिए हलाल कर दे, फिर उसे तलाक़ देकर हट जाए। यही ‘मुहल्लिल’ (हलाला करने वाला व्यक्ति) है और उसका निकाह अमान्य (अवैध) है, और शरीअत के अनुसार नहीं है। जब उसने इस इरादे और इस उद्देश्य से उससे निकाह किया है, तो यह एक भ्रष्ट और फासिद निकाह है। इससे वह महिला न तो उसके लिए हलाल होती है और न ही अपने पहले पति के लिए हलाल होती है; क्योंकि यह कोई वास्तविक विवाह नहीं है। जबकि अल्लाह ने फरमाया है :  حَتَّى تَنْكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ   “यहाँ तक कि वह किसी दूसरे पति से विवाह करे।” (अल-बक़रा : 230) । और यह व्यक्ति तो एक किराए का सांड है, एक शरई पति (धर्मपति) नहीं है। इसलिए वह उसे पहले पति के लिए हलाल नहीं कर सकता।” "फतावा शैख इब्न बाज़” (20/277–278) से उद्धरण समाप्त हुआ।

तहलील-विवाह (हलाला) के निषिद्ध (हराम) और अमान्य होने में इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, कि तहलील की शर्त विवाह के अनुबंध में स्पष्ट रूप से उल्लेख की गई हो, या उस पर पहले से सहमति हो चुकी हो लेकिन अनुबंध में उसका उल्लेख न किया गया हो, या दूसरे पति ने बिना किसी के शर्त लगाए या सहमति के (खुद से) ऐसा करने का इरादा किया हो। क्योंकि यह सब का सब तहलील विवाह (हलाला) है और निषिद्ध व हराम है।

इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह ने कहा :

"मदीना के लोगों, हदीस के विद्वानों और उनके धर्मशास्त्रियों के निकट, मौखिक रूप से या मौन सहमति और इरादे से शर्त लगाने में कोई अंतर नहीं है। क्योंकि उनके यहाँ अनुबंधों में इरादों का एतिबार होता है, और कार्यों का आधार नियतों (इरादों) पर होता है। वह शर्त जिस पर दोनों पक्षों ने आपस में सहमति कर ली हो ; उनके नज़दीक वह उच्चारित (कही हुई) शर्त के समान है। शब्द अपने आप में मक़सूद नहीं होते, बल्कि अर्थ बताने के लिए होते हैं। जब अर्थ और उद्देश्य स्पष्ट हो जाएँ, तो शब्दों का एतिबार नहीं होता; क्योंकि वे तो केवल साधन हैं, और उनके उद्देश्य प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए उनके अहकाम उन्हीं पर आधारित होते हैं।" "ज़ादुल-मआद फ़ी हद्ये ख़ैरिल-इबाद" (5/110) से उद्धरण समाप्त हुआ।

इफ्ता की स्थायी समिति के विद्वानों ने कहा :

"यदि कोई पुरुष किसी स्त्री से तहल़ील (यानी उसे पहले पति के लिए हलाल करने) की शर्त पर विवाह करता है, या वह ऐसा करने का इरादा रखता है, या वे दोनों इसके बारे में आपस में समझौता कर लेते हैं, तो अनुबंध अमान्य है, और विवाह सही नहीं है।"

"फ़तावा अल-लजना अद-दाइमा" (18/439) से उद्धरण समाप्त हुआ।

बैहकी ने "अस-सुनन अल-कुबरा" (7/208) में नाफे’ के हवाले से रिवायत किया है, कि उन्होंने कहा : "एक आदमी इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के पास आया और उनसे एक ऐसे आदमी के बारे में पूछा जिसने अपनी पत्नी को तीन बार तलाक़ दे दिया, और फिर उसके एक भाई ने बिना किसी पूर्व सहमति के उससे शादी कर ली ताकि वह उसे अपने भाई के लिए हलाल बना दे। क्या वह पहले पति के लिए हलाल हो जाएगी? उन्होंने कहा : नहीं, सिवाय सच्ची इच्छा से की गई शादी के। हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में इसे व्यभिचार (ज़िना) मानते थे।”

शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह ने कहा :

"अगर दूसरा पति यह इरादा रखता है कि जब वह उसे पहले पति के लिए हलाल कर देगा तो वह उसे तलाक़ दे देगा, तो वह स्त्री पहले पति के लिए हलाल नहीं होगी, और यह निकाह अमान्य है।

इसका प्रमाण यह है कि उसने ‘हलाला’ (उस महिला को पहले पति के लिए हलाल बनाने) की नीयत की है, इसलिए वह उस ‘ला’नत’ (शाप) में शामिल हो जाता है। पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : "निश्चय ही सारे काम नीयतों पर निर्भर हैं, और हर व्यक्ति को वही मिलेगा जिसकी उसने नीयत की।” "अश-शर्ह अल-मुम्ते' अला ज़ाद अल-मुस्तक़ने" (12/176, 177) से उद्धरण समाप्त हुआ।

शैख़ुल-इस्लाम इब्न तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने इन सभी रूपों को एक ही संदर्भ में एकत्र किया है, और उन सबको “निकाहे-तहलील” (हलाला) की श्रेणी में रखा है, जो कि हराम और अमान्य है।

आप रहिमहुल्लाह ने कहा :

"मुहल्लिल (हलाला करने वाले) का निकाह हराम और अमान्य है, और इससे महिला हलाल नहीं होती। इसका स्वरूप इस प्रकार है : यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक़ दे देता है, तो वह उसके लिए हराम हो जाती है जब तक कि वह किसी दूसरे पति से शादी न कर ले, जैसा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान ने अपनी किताब (क़ुरआन) में उल्लेख किया है, और जैसा कि उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से सिद्ध है, और जिस पर पूरी उम्मत की सर्वसम्मति (इज्माʿ) है। फिर यदि कोई पुरुष उससे इस नीयत से निकाह करे कि वह उसे तलाक़ दे देगा ताकि वह पहले पति के लिए हलाल हो जाए : तो यह निकाह हराम और अमान्य है, चाहे बाद में वह उसे अपने पास रखने का इरादा करे या उससे अलग हो जाए, और चाहे यह शर्त निकाह के समय स्पष्ट रूप से रखी गई हो, या निकाह से पहले तय की गई हो, या शब्दों में शर्त न रखी गई हो... या इनमें से कुछ भी नहीं हुआ हो, बल्कि पुरुष केवल अपने मन में यह इरादा रखे कि वह उससे निकाह करेगा और फिर उसे तलाक़ दे देगा ताकि वह तीन तलाक़ देने वाले पहले पति के लिए हलाल हो जाए, चाहे इस इरादे की जानकारी न स्त्री को हो और न उसके वली (अभिभावक) को, और चाहे तीन बार तलाक़ देने वाले पति को इसका ज्ञान हो या न हो। जैसे कि मुहल्लिल (हलाला करने वाला) यह सोचे कि वह यह काम तलाक़ देने वाले आदमी और उसकी पत्नी के साथ भलाई और उपकार के रूप में कर रहा है, ताकि स्त्री को उसके पहले पति के पास वापस लौटा दे, यह देखकर कि तलाक़ ने उस पति-पत्नी, उनके बच्चों और परिवार को नुकसान पहुँचाया है, इत्यादि। बल्कि तीन तलाक़ देने वाले पति के लिए यह जायज़ नहीं कि वह उससे निकाह करे, जब तक कि वह स्त्री किसी ऐसे पुरुष से निकाह न करे जो स्वयं के लिए, सच्ची इच्छा से निकाह करे, न कि छल-कपट और चालबाज़ी वाला निकाह, और वह पति उससे दांपत्य संबंध स्थापित करे, यहाँ तक कि वह उसकी मिठास चखे और वह उसकी मिठास चखे, फिर उसके बाद यदि उनके बीच मृत्यु, तलाक़ या निकाह के निरस्त होने के कारण अलगाव हो जाए, तब पहले पति के लिए उससे निकाह करना जायज़ होगा।... यही बात क़ुरआन और सुन्नत से सिद्ध है, और यही रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा से प्रमाणित है, और नेक तरीक़े से उनका अनुसरण करने वाले ताबेईन से,

और इस्लाम के अधिकांश फ़ुक़हा से।... और यही इमाम मालिक बिन अनस और उनके सभी साथियों का मत है, तथा औज़ाई, लैस बिन सा’द, सुफ़यान स़ौरी का मत है।

यही हदीस के फ़ुक़हा में से इमाम अहमद बिन हंबल का मत है, जिनमें : इसहाक़ बिन राहवैह, अबू उबैद अल-क़ासिम बिन सल्लाम, सुलैमान बिन दाऊद अल-हाशिमी, अबू ख़ैसमा ज़ुहैर बिन हर्ब, अबू बक्र बिन अबी शैबा, अबू इसहाक़ अल-जौज़जानी और अन्य, और यही इमाम शाफ़ेई का भी एक कथन है।” यह उद्धरण “इक़ामतुद्दलील अला इब्ताल अत-तहलील” (पृष्ठ 6–8) से समाप्त हुआ।

तथा उन्होंने इसके हराम होने के बारे में धर्म के इमामों के बहुत-से कथन उद्धृत किए हैं।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

संदर्भ

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर