गुरुवार 18 सफ़र 1441 - 17 अक्टूबर 2019
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क्या क़ैदी (बंदी) के लिए नमाज़ को क़स्र करना और एकत्रित करना जायज़ हैॽ

प्रश्न

मेरा एक बेटा है जो विश्वविद्यालय का छात्र है, वह उन लोगों में से एक है जिन्हें (पांच साल के लिए) जेल में बंद कर दिया गया है क्योंकि उसने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। वह (हमारे निवास स्थान से) एक सौ किलोमीटर दूर जेल में बंद है। प्रश्न यह है कि : क्या उनके लिए नमाज़ को क़स्र करना और एकत्रित करके पढ़ना जायज़ है जबकि वे जेल में इस स्थिति में हैं, विशेषकर जब उन्हें जुमा की नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं है, चुनाँचे उन्होंने दस महीने से जुमा की नमाज़ नहीं पढ़ी है।

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

यदि क़ैदी को एक ऐसे स्थान पर क़ैद किया गया है जो उसके निवास के देश (स्थान) से बाहर है और वह उससे इतना दूर है जितनी दूरी पर नमाज़ क़स्र करने की अनुमति हैः तो वह मुसाफिर के हुक्म में हैः

अगर उसे पता नहीं है कि वह जेल से बाहर कब निकले गाः तो वह अपनी नमाज़ों को क़स्र कर सकता है और आवश्यकता होने पर दो नमाज़ों को एकत्रित करके पढ़ सकता है, यहाँ तक कि वह जेल से बाहर निकल जाए या उसे पता चल जाए कि वह जेल में चार दिन से अधिक रहेगा।

अगर उसे पता चल जाए है कि वह जेल में चार दिन से अधिक समय तक रहेगा, जैसे कि वह व्यक्ति जिसे इससे अधिक अवधि के लिए कारावास की सजा सुनाई गई हो, तो वह फ़ुक़हा की बहुमत के अनुसार, यात्रा की रुख़्सतों (रियायतों) को नहीं अपनाएगा।

उस यात्रा की मात्रा जिसमें यात्रा की रियायतों को अपनाना धर्मसंगत है, फ़ुक़हा की बहुमत के निकटः लगभग अस्सी किलोमीटर की दूरी है। अतः जो भी इस दूरी या इससे अधिक दूरी की यात्रा करने के लिए बाहर निकलता है, तो वह यात्रा की रियायतों का लाभ उठा सकता है, जैसे कि तीन दिन और रात तक मोज़े पर मसह करना, नमाज़ों को एकत्रित और क़स्र (कम) करना और रमज़ान के महीने में रोज़ा तोड़ना।

वह यात्री जो किसी शहर में ठहरता है लेकिन उसे नहीं पता कि उसका काम कब संपन्न होगा और उसने अपने ठहरने के लिए कोई निश्चित अवधि निर्धारित नहीं की है, तो वह यात्रा की रियायतों का लाभ उठाएगा, भले ही वहाँ रहने की अवधि लंबी हो जाए।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने “अल-मुगनी” (2/215) में फरमाया :

“जिस आदमी ने इक्कीस से अधिक नमाज़ों की अवधि (यानी चार दिनों से अधिक) के लिए ठहरने का फैसला नहीं किया है, तो उसके लिए नमाज़ क़स्र करना जायज़ है, भले ही वह कई सालों तक ठहरा रहे, उदाहरण के तौर पर वह किसी काम को पूरा करने के लिए ठहरता है जिसके सफल होने कि वह आशा रखता है, या वह किसी दुश्मन के खिलाफ जिहाद के लिए ठहरता है, या उसे कोई शासक, या बीमारी रोक लेती है, और चाहे उसका प्रबल गुमान यह हो कि वह उद्देश्य एक छोटी अवधि के भीतर पूरा हो जाएगा या एक लंबी अवधि में, जबकि उसके उस अवधि में समाप्त होने की संभावना है जो यात्रा के हुक्म को बाधित नहीं करती है।

इब्नुल-मुंज़िर ने कहा : विद्वानों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की है कि यात्री जब तक निवास करने का संकल्प नहीं कर लेता है वह नमाज़ को क़स्र कर सकता है, भले ही उस पर कई साल बीत जाएं।” उद्धरण का अंत हुआ।

तथा प्रश्न संख्याः (105844) का उत्तर भी देखें।

दूसरा :

जेल के क़ैदियों के लिए जुमा (शुक्रवार) की नमाज़ अनिवार्य नहीं है जबकि वे अपने वार्ड में हों। अगर वे जेल की मस्जिद में यह नमाज़ अदा करने में सक्षम हैं, तो यह उनके लिए अनिवार्य है।

उन में से प्रत्येक वार्ड के लोग अपने-अपने वार्ड में पांचों समय की नमाज़ें जमाअत के साथ पढ़ेंगे, अगर वे जेल की मस्जिद में नमाज़ अदा करने में सक्षम नहीं हैं।

शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“वरिष्ठ विद्वानों की परिषद ने यह फतवा जारी किया है कि वे इस विचार से सहमत नहीं हैं कि जुमा और जमाअत की नमाज़ में कैदियों को एक ही इमाम का पालन करने के लिए कहा जाए जब कि वे अपने जेल वार्डों के अंदर हों, और वे लाउडस्पीकर के माध्यम से उस (इमाम) का अनुकरण करें, इसलिए कि जुमा की नमाज़ उनके लिए अनिवार्य नहीं है, क्योंकि वे नमाज़ के लिए नहीं जा सकते, तथा कुछ अन्य कारणों से।

तथा जो व्यक्ति जुमा की नमाज़ के लिए जेल की मस्जिद में उपस्थित होने में सक्षम है, यदि उसमें कोई मस्जिद है जिसमें जुमा की नमाज़ आयोजित की जाती हैः तो वह इस नमाज़ को जमाअत (मंडली) के साथ अदा करे, अन्यथा उससे जुमा की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी और वह इसके बजाय ज़ुहर की नमाज़ पढ़ेगा।

तथा प्रत्येक समूह पांचों नमाज़ें अपने वार्ड के अंदर जमाअत के साथ पढ़ेगा, यदि उन्हें मस्जिद में या एक ही स्थान पर इकट्ठा करना संभव नहीं है।”

“मजमूओ फतावा इब्ने बाज़ (12/155-156)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

स्थायी समिति के विद्वानों ने कहा:

“यदि जुमा की नमाज़ जेल के अंदर या अन्य स्थानों पर आयोजित की जाती है, और वह - अर्थात क़ैदी – इसे अदा करने में सक्षम है, तो उसके लिए ऐसा करना अनिवार्य है। लेकिन यदि वह जुमा की नमाज़ अदा करने में सक्षम नहीं है, तो वह इसके बजाय ज़ुहर की नमाज़ पढ़ेगा।”

“स्थायी समिति के फतावा (8/184)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

अतः अगर इन लोगों को उनके खिलाफ पारित होने वाली सज़ाओं (दंड) के कारण क़ैद किया गया है, चुनांचे वे अपनी उस जेल में स्थिर (स्थायी) हो गए हैं जिसमें वे अपनी इन सज़ाओं को काट रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में उन पर वही हुक्म (नियम) लागू होगा जो किसी जगह पर निवासी व्यक्ति का हुक्म है, वे नमाज़ को क़स्र या एकत्रित करने, या रमज़ान के महीने में रोज़ा तोड़ने की रियायतों से लाभान्वित नहीं होंगे, और जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ेंगे, हर समूह अपने वार्ड के अंदर नमाज़ पढ़ेगा, तथा उनके ऊपर जुमा की नमाज़ अनिवार्य नहीं है सिवाय इसके कि जेल प्रशासन उन्हें मस्जिद में नमाज़ अदा करने की अनुमति प्रदान करदे, तो ऐसी स्थिति में अनिवार्य होगी।

लेकिन अगर वे ऐसी परिस्थिति में हैं जहाँ वे नहीं जानते कि वे कल कहाँ होंगे, और जेल प्रशासन आम तौर पर उन्हें एक शहर से दूसरे शहर में स्थानांतरित करता रहता है : तो ऐसे लोग यात्रा की रियायतों से लाभ उठा सकते हैं, और इनके लिए नमाज़ को क़स्र करना और दो नमाज़ों को एकसाथ करके पढ़ना जायज़ है।

हम अल्लाह से प्रश्न करते हैं कि उन लोगों को रिहाई प्रदान करे जिन्हें अन्यायपूर्ण तरीक़े से कैद किया गया है, और उन मुसलमानों के संकट को दूर करे जो कठिनाई का सामना कर रहे हैं।

अधिक जानकारी के लिए, प्रश्न संख्याः (81421) का उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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