मंगलवार 22 शव्वाल 1440 - 25 जून 2019
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पाँचों नमाज़ों में ऊँचे स्वर और गुप्त स्वर में क़ुरआन पढ़ने के प्रमाण

प्रश्न

क़ुरआन और सुन्नत से इस बात का सबूत क्या है कि ज़ुहर और अस्र की नमाज़ सिर्री है (अर्थात जिसमें खामोशी से क़िराअत की जाएगी), जबकि फज्र, मग़रिब और इशा की नमाज़ जह्री है (अर्थात जिसमें ज़ोर से क़िराअत की जाएगी)ॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इस उच्च महत्वाकांक्षा पर हम आपको धन्यवाद देते हैं तथा इस आयु में क़ुरआन और सुन्नत के प्रमाणों को जानने में आपकी रुचि को देखकर हमें खुशी है, हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि आप के द्वारा लोगों को लाभ पहुँचाए।

अल्लाह सर्वशक्तिमान ने हमें पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करने और आपके आदर्शों का पालन करने का आदेश दिया है। अल्लाह तआला ने फरमाया :

 لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيراً

الأحزاب : 21 .

''वास्तव में तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक अच्छा आदर्श है, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखे और अल्लाह को अधिक से अधिक याद करे।'' (सूरतुल अह़ज़ाबः 21).

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ''तुम उसी तरह नमाज़ पढ़ो जिस तरह तुमने मुझे नमाज़ पढ़ते देखा है।'' और वस्तुस्थिति यह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फज़्र की नमाज़ में तथा मग़रिब और इशा की नमाज़ों की पहली दो रकअतों में ज़ोर से क़िराअत करते थे, और उनके अलावा में गुप्त आवाज़ से क़िराअत करते थे।

ज़ोर से क़िराअत करने को दर्शाने वाले प्रमाणों में से कुछ निम्नलिखित हैं :

- बुखारी (हदीस संख्याः 735) तथा मुस्लिम (हदीस संख्याः 463) ने जुबैर बिन मुत्इम रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा:  मैंने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सुना कि आप ने मग़रिब की नमाज़ में सूरतुत्-तूर पढ़ी।''

- तथा बुखारी (हदीस संख्याः 733) तथा मुस्लिम (हदीस संख्याः 464) ने बरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहाः मैं ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इशा की नमाज़ में ''वत्तीन वज़्ज़ैतून'' पढ़ते हुए सुना। तथा मैं ने आप से अच्छी आवाज़ वाला किसी को नहीं सुना।

- तथा बुखारी (हदीस संख्याः 739) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 449) ने इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से जिन्नों के उपस्थित होने और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से क़ुरआन सुनने के बारे में रिवायत किया है जिसमें ये शब्द वर्णित हुए हैं किः ''वह अपने सहाबा को फज़्र की नमाज़ पढ़ा रहे थे, तो जब उन्हों ने क़ुरआन सुना तो उसे कान लगाकर सुनने लगे।''

इन हदीसों से पता चलता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इतने ज़ोर से पढ़ते थे कि उपस्थित होने वाले लोग उसे सुनते थे।

 ज़ुहर और अस्र की नमाज़ में गुप्त रूप से क़िराअत करने को निम्न हदीस दर्शाती है :

- बुखारी (हदीस संख्याः 713) ने खब्बाब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उनसे एक प्रश्न करने वाले ने प्रश्न किया: क्या अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ज़ुहर और अस्र में क़िराअत करते थे (अर्थात कुछ पढ़ते थे)ॽ उन्हों ने कहा : हाँ। हमने कहा : आप लोग इस बात को कैसे जानते थेॽ उन्हों ने कहा : "अपकी दाढ़ी के हिलने से।"

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है जह्री नमाज़ों में ज़ोर से क़िराअत करना, तथा सिर्री नमाज़ों में गुप्त रूप से क़िराअत करना, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत है, और मुसलमानों ने इन प्रावधानों पर सर्वसम्मति के साथ सहमति व्यक्त की है।

तथा बुखारी (हदीस संख्याः 738) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 396) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : "हर नमाज़ में आप क़िराअत करते थे, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो हमें सुनाया है हमने तुम्हें सुना दिया, और आप ने जो हमसे गुप्त रखा उसे हमने तुमसे गुप्त रखा।''

नववी रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"फज्र, मग़रिब और ईशा की दो रक्अतों में और जुमा (शुक्रवार) की नमाज में ज़ोर से क़िराअत करना, तथा ज़ुहर, अस्र, मग़रिब की तीसरी रकअत और इशा की तीसरी व चौथी रकअत में गुप्त रूप से क़िराअत करना सुन्नत है। यह सब मुसलमानों की आम सहमति के साथ है, साथ ही साथ सही हदीसें इसका समर्थन करती हैं।” "अल-मजमू शर्हुल मुहज़्ज़ब” (3/389) से अंत हुआ।

 इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने फरमायाः

"ज़ुहर और अस्र में क़िराअत को गुप्त रूप से करेगा, तथा मग़रिब और इशा की पहली दोनों रकअतों में और सुबह (फज्र) की पूरी नमाज़ में क़िराअत ज़ोर से करेगा ...; इसका मूल आधार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कृत्य है। यह बात बाद में आनेवाले लोगों के अपने पूर्वजों से स्थानांतरित करने से साबित हो चुकी है। यदि उसने क़िराअत को गुप्त रखने की जगह में ज़ोर से क़िराअत कर दी, अथवा ज़ोर से क़िराअत करने के स्थान में क़िराअत को गुप्त रखा, तो उसने सुन्नत को छोड़ दिया, और उसकी नमाज़ सही है।”

“अल-मुग़नी” (2/270) से समाप्त हुआ।

अधिक जानकारी के लिए प्रश्न संख्या : (13340) का उत्तर, प्रश्न संख्या : (65877) का उत्तर और प्रश्न संख्या : (67672) का उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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