शुक्रवार 9 रबीउस्सानी 1441 - 6 दिसंबर 2019
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बुतपरस्ती से अभिप्राय क्या हैॽ

प्रश्न

बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) की शब्दावली से अभिप्राय क्या हैॽ क्या सुन्नते नबवी या क़ुरआन में उसका वर्णन हुआ हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

बुतपरस्ती से अभिप्राय : मूर्तियों की पूजा करना और उनसे लगाव रखना है। यह शब्द उन स्थलीय (लौकिक) धर्मों को इंगित करता है, जो मूर्तियों की पूजा करते हैं, जैसे कि अरब, भारत, जापान इत्यादि के अनेकेश्वरवादी, जबकि अह्ले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों का मामला इसके विपरीत है।

कुरआन और सुन्नत : में मूर्तियों की पूजा करने से निषेध किया गया है, और अकेले अल्लाह की पूजा करने का आदेश दिया गया है।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

 فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْأَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ

الحج/30 

“तो तुम मूर्तियों की गन्दगी से बचो और झूठी बात से (भी) बचो।” (सूरतुल हज्जः 30)

तथा सर्वशक्तिमान (अल्लाह) ने फरमाया :

 وَالرُّجْزَ فَاهْجُرْ

المدثر/5  

“और अर-रुज्ज़ (मूर्तियों) से दूर रहो!” (सूरतुल मुद्दस्सिरः 5).

अबू सलमह ने कहा : “अर-रुज्ज़” से अभिप्राय मूर्तियाँ हैं। इसे बुखारी ने अपनी सहीह में किताबुत-तफसीर, अल्लाह के कथनः ‘वर्रुज्ज़ा फह्जुर’ के अध्याय के अंतर्गत, मुअल्लक़न रिवायत किया है।

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

 وَإِبْرَاهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (16) إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا إِنَّ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَابْتَغُوا عِنْدَ اللَّهِ الرِّزْقَ وَاعْبُدُوهُ وَاشْكُرُوا لَهُ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ

العنكبوت/16، 17 

“और याद करो इबराहीम को जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहाः अल्लाह की उपासना करो और उससे डरते रहो। यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो। तुम तो अल्लाह को छोड़कर मात्र मूर्तियों को पूज रहे हो और झूठ घड़ रहे हो। निःसंदेह तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो वे तुम्हारे लिए रोज़ी का भी अधिकार नहीं रखते। अतः तुम अल्लाह ही के यहाँ रोज़ी तलाश करो और उसी की इबादत करो और उसके आभारी बनो। तुम्हें उसी की ओर लौटकर जाना है।” (सूरतुल अनकबूतः 16 -17).

तथा उसने फरमाया :

 وَقَالَ إِنَّمَا اتَّخَذْتُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا مَوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُمْ بِبَعْضٍ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُمْ بَعْضًا وَمَأْوَاكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ نَاصِرِينَ

العنكبوت/26

“और उसने कहा कि तुमने अल्लाह को छोड़कर जिन मूर्तियों को (पूज्य) बना रखा है वह केवल सांसारिक जीवन में तुम्हारी पारस्परिक दोस्ती के कारण है। फिर क़ियामत के दिन तुममें से (हर) एक, दूसरे (की दोस्ती) का इनकार करेगा और तुममें से (हर) एक, दूसरे पर लानत (धिक्कार) करेगा। और तुम्हारा ठिकाना आग होगा और कोई तुम्हारा सहायक न होगा।” (सूरतुल अनकबूतः 26).

तथा बुखारी (हदीस संख्या : 7) ने अबू सुफयान के साथ हिरक़्ल की कहानी के विषय में रिवायत किया है कि हिरक़्ल ने कहाः “और मैंने तुमसे पूछा कि वह तुमसे किस चीज़ के लिए कहते हैं, तो तुमने कहा कि वह तुम्हें हुक्म देते हैं कि तुम अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी न ठहराओ, और वह तुम्हें मूर्तियों की पूजा से रोकते हैं। तथा वह तुम्हें नमाज़ पढ़ने, सच्च बोलने और सतीत्व की रक्षा करने का हुक्म देते हैं। अतः यदि ये बातें जो तुम कह रहे हो, सच्च हैं तो निकट ही वह इस स्थान का मालिक हो जाएगा जहाँ मेरे ये दोनों पाँव हैं।”

अबू दाऊद (हदीस संख्या : 4252) और तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2219) ने सौबान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा: अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया : "अल्लाह ने मेरे लिए ज़मीन को समेट दिया, तो मैंने उसके पूर्व और पश्चिम को देखा। और निःसंदेह मेरी उम्मत का राज्य वहाँ तक पहुँच कर रहेगा जहाँ तक मेरे लिए ज़मीन समेटी गई। तथा मुझे लाल और सफेद दो खज़ाने दिए गए .... तथा क़यामत उस समय तक नहीं आएगी जब तक कि मेरी उम्मत के कुछ क़बीले (गोत्र) मुश्रिकों से मिल न जाएँ, और यहाँ तक कि मेरी उम्मत के कुछ क़बीले (गोत्र) मूर्तियों की पूजा न करने लगें।'' इस हदीस को अलबानी ने सहीह अबू दाऊद में सहीह कहा है।

इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में यह अध्याय क़ायम किया हैः ''अध्यायः समय का बदलना यहाँ तक कि मूर्तियों की पूजा होने लगेगी'', फिर उन्हों ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस को उल्लेख किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “क़यामत क़ायम नहीं होगी यहाँ तक कि दौस के गोत्र की महिलाओं के नितंब ज़ुल-खलसा पर हिलने लगें।'' ज़ुल-खलसा दौस गोत्र की मूर्ति थी, जिसकी वे इस्लाम के पूर्व अज्ञानता के काल में पूजा करते थे। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 7116)  ने रिवायत किया है।

सारांश यह किः बुतपरस्ती अर्थात मूर्तियों की पूजाः अरब प्रायद्वीप में व्यापक रूप से प्रचलित थी। जो कि आजकल कुछ देशों, जैसे भारत, जापान और अफ्रीका के कुछ देशों में प्रचलित है।।

और हदीस में है कि वह अंतिम समय में क़यामत क़ायम होने से पहले, अरब प्रायद्वीप में वापस आ जाएगी।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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