सोमवार 19 रबीउलअव्वल 1443 - 25 अक्टूबर 2021
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कुछ सदाचारियों के शब्द : “मेरा काम अल्लाह की इबादत करना है, और रोज़ी देना अल्लाह का काम है, जैसा कि उसने वादा किया है” की प्रामाणिकता

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प्रकाशन की तिथि : 18-07-2021

दृश्य : 324

प्रश्न

निम्न कथन कितना सच है, और क्या उसमें (और उस पर) कहने में अल्लाह के साथ अशिष्टता हैॽ वह कथन इस प्रकार है : “इबराहीम बिन अदहम से कहा गया : क़ीमतें बढ़ गई हैं। तो उन्होंने कहा : अल्लाह की क़सम, अगर गेहूं के एक दाने की क़ीमत एक दीनार हो जाए, तो मुझे कोई परवाह नहीं है। मेरे ऊपर यह अनिवार्य है कि मैं उसकी उपासना करूँ, जैसा कि उसने आदेश दिया है, और उस पर यह है कि मुझे रोज़ी प्रदान करे, जैसा कि उसने वादा किया है।”

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

यदि इस कथन की निस्बत इबराहीम बिन अदहम की ओर सही है, तो इससे प्रतीत होने वाले अर्थ में कोई समस्या नहीं है।

क्योंकि मुसलमान के लिए अनिवार्य है कि उसकी सर्व प्रथम और सबसे बड़ी चिंता अल्लाह की बंदगी की प्राप्ति होनी चाहिए; आजीविका की चिंता नहीं होनी चाहिए। अल्लाह के इस फरमान का अनुसरण करते हुए :

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ، مَا أُرِيدُ مِنْهُمْ مِنْ رِزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَنْ يُطْعِمُونِ ، إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ   [الذاريات : 56 – 58].

“और मैंने जिन्न और मानव जाति को मात्र इसलिए पैदा किया है कि वे केवल मेरी ही इबादत करें। मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ। निश्चय अल्लाह ही सबको रोज़ी देनेवाला, शक्तिशाली और बलवान है।” (सुरतुज़ ज़ारियात : 56-58)

उनका कथन : “उस पर मुझे रोज़ी प्रदान करना अनिवार्य है, जैसा कि उसने वादा किया है।”

इससे अभिप्राय यह साबित करना है कि अल्लाह ही रोज़ी प्रदान करने वाला है; और उसने इस दुनिया में हर एक के लिए जीविका की ज़िम्मेदारी ली है और उस महिमावान ने इसे अपने ऊपर निर्धारित कर लिया है।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

وَمَا مِنْ دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا كُلٌّ فِي كِتَابٍ مُبِينٍ   [هود : 6].

“और धरती पर चलने-फिरने वाला जो भी प्राणी है, उसकी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है। वह उसके रहने-सहने के स्थान तथा उसकी मृत्यु के स्थान को जानता है। सब कुछ एक स्पष्ट पुस्तक में (अंकित) है।” (सूरत हूद : 6)  

 तबरी रहिमहुल्लाह ने कहा :

“ إِلَّا عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا  “अल्लाह ही पर उसकी जीविका है”, वह कहता है : उसकी जीविका जो उसे पहुँचती है, अल्लाह ही की ओर से है, उसने उसकी ज़िम्मेदारी ली है। और यह उसकी खूराक, भोजन और वह चीज़ है जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक है।”

“तफ़्सीर-तबरी” (12/324) से उद्धरण समाप्त हुआ।

शैख ताहिर बिन आशूर रहिमहुल्लाह ने कहा :

वाक्यांश (عَلَى اللَّهِ) “अल्लाह पर” को उससे पहले उल्लेख किया गया है, जिससे वह संबंधित है, और वह वाक्यांश (رِزْقُهَا) “उसकी जीविका” है, ताकि वह इस अर्थ को दर्शाए कि वह अल्लाह ही पर अवलंबित और आश्रित है, उसके अलावा किसी अन्य पर नहीं है। तथा वाक्यांश  عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا  की संरचना से यह अर्थ भी पता चलता है कि : अल्लाह ने उसकी जीविका की ज़िम्मेदारी ली है और उसकी उपेक्षा नहीं की है। क्योंकि “अला” (عَلَى) का शब्द अनिवार्यता और अधिकारिता व पात्रता को इंगित करता है। और यह बात सर्वज्ञात है कि कोई भी अल्लाह को किसी चीज़ के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसलिए जिससे अनिवार्य होने का अर्थ इंगित होता है, तो वह अल्लाह ने स्वयं को उसका प्रतिबद्ध कर लिया है अपने उन गुणों की अपेक्षा के अनुसार, जो इसकी अपेक्षा करने वाले हैं, जैसा कि उसका यह कथन उसको इंगित करता है :  وَعْدًا عَلَيْنَا  "यह हमारे ऊपर एक वादा है।” (सूरतुल अंबिया : 104) तथा यह कथन :  حَقًّا عَلَيْنَا  “हमारे ऊपर हक़ है।” (सूरतुर-रूम : 47)

“अत-तहरीर वत-तनवीर” (12 / 5-6) से उद्धरण समाप्त हुआ।

जिस तरह अल्लाह सर्वशक्तिमान ने सभी जानवरों की आजीविका की ज़िम्मेदारी ली है, उसी तरह बंदों की भी आजीविका की ज़िम्मेदारी ली है।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

وَكَأَيِّنْ مِنْ دَابَّةٍ لَا تَحْمِلُ رِزْقَهَا اللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ   [العنكبوت :60].

"और बहुत से जीव प्राणी हैं जो अपनी रोज़ी लादे नहीं फिरते, उन सब को और तुम्हें भी अल्लाह ही रोज़ी देता है, वह बड़ा सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" (सूरतुल अनकबूत : 60)

अतः अल्लाह के प्रति अपने विश्वास व भरोसे में सच्चे मुसलमान को चाहिए कि वह किसी वित्तीय संकट का सामना करने पर भयभीत न हो, जैसा कि वह़्य ने इसकी ओर मार्गदर्शन की है।

अल्लाह तआला ने फरमाया :

 وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ مِنْ إِمْلَاقٍ نَحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَإِيَّاهُمْ وَلَا تَقْرَبُوا الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ذَلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ  [الأنعام : 151].

“और निर्धनता के कारण अपनी संतान की हत्या न करो। हम ही तुम्हें भी रोज़ी देते हैं और उन्हें भी। और अश्लील बातों के निकट न जाओ, चाहे वे खुली हुई हों या छिपी हुई हों। और अनधिकार किसी जीव की हत्या न करो, जिसकी हत्या को अल्लाह ने निषिद्ध ठहराया है। ये बाते हैं, जिनका उस (अल्लाह) ने तुम्हें निर्देश दिया है, ताकि तुम बुद्धि से काम लो।” (सूरतुल अनआम : 151)  

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :

 وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍ نَحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْئًا كَبِيرًا   [الإسراء : 31].

"और ग़रीबी के डर से अपने बच्चों को क़त्ल न करो! उनको और तुमको हम ही रोज़ी देते हैं। निश्चित रूप से, उनकी हत्या एक महान पाप है।” (सूरतुल इस्रा : 31)

क्योंकि आजीविका पहले ही से नियत है और कोई भी प्राणी तब तक नहीं मरेगा जब तक कि उसे उसकी पूरी आजीविका प्राप्त नहीं हो जाती।

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमसे बयान किया, जबकि आप सादिक़ (सच्चे) व मसदूक़ (प्रमाणित) हैं, आपने फरमाया : “तुममें से किसी भी व्यक्ति की संरचना को उसकी माँ के पेट में चालीस दिन तक इकट्ठा किया जाता है, फिर वह उसमें उसी मात्रा में (यानी चालीस दिन) गोश्त का लोथड़ा रहता है, फिर वह उसके अंदर उसी मात्रा में (चालीस दिन) गोश्त की बोटी रहता है, फिर अल्लाह एक फ़रिश्ता भेजता है तो उसे चार बातों का आदेश दिया जाता है और उससे कहा जाता है : उसका कर्म, उसकी जीविका, उसकी समय सीमा (मृत्य) और उसका दुर्भाग्यशाली या सौभाग्यशाली होना लिख दो, फिर उसमें रूह़ फूँकी जाती है... ’’ इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 3208) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2643) ने रिवायत किया है।

तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “ऐ लोगो, अल्लाह से डरो और अच्छे एवं वैध ढंग से जीविका तलाश करो। क्योंकि कोई भी प्राणी तब तक नहीं मरेगा जब तक कि वह अपनी पूरी जीविका प्राप्त न कर ले, भले ही उसमें देरी हो जाए। इसलिए अल्लाह से डरो और अच्छे एवं हलाल ढंग से रोज़ी तलाश करो। जो हलाल हो, उसे ले लो और जो हराम (निषिद्ध) हो, उसे छोड़ दो।” इसे इब्ने माजह (हदीस संख्या : 2144) ने रिवायत किया है और अलबानी ने सिलसिलतुल-अहादीस अस-सहीहा” (6/209) में सहीह कहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मामला यह है कि जिसने यह बात कही है, उसने “अला” के शब्द के उपयोग के साथ क़ुरआन की अभिव्यक्ति की व्याख्या, जैसा कि अल्लाह के कथन :  عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا  “अल्लाह पर उसकी आजीविका है" में ऊपर गुज़र चुका, इस अर्थ में की है कि अल्लाह ने अपने बंदों की रोज़ी की ज़िम्मेदारी ली है और मात्र अपनी कृपा और अनुग्रह से उसे अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है।

और उनके शब्द “अला” से यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि वह अल्लाह तआला पर अनिवार्य क़रार देते हैं कि वह उसकी उपासना के बदले में उसे आजीविका प्रदान करे। क्योंकि अल्लाह की पूर्ण महानता, उसके पूर्ण प्रभुत्व और बंदों पर उसके परिपूर्ण अनुग्रह और उपकार के कारण : कोई भी उसपर किसी चीज़ का करना अनिवार्य नहीं कर सकता।

शैखुल-इस्लाम इब्ने तैमिय्यह रहिमहुल्लाह ने कहा :

“विद्वानों ने इस बात पर सर्वसहमति व्यक्त की है कि उसके सच्चे वादे के द्वारा जो चीज़ अनिवार्य होती है, वह अनिवार्य है, लेकिन वे इस विषय में विवादित हैं कि : क्या वह स्वयं अपने आप पर कोई चीज़ अनिवार्य करता हैॽ इस बारे में उनके दो मत हैं।

जिन लोगों ने इसे जायज़ क़रार दिया है, उन्होंने अल्लाह सर्वशक्तिमान के इस कथन को प्रमाण बनाया है :  كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلَى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَ  “तुम्हारे पालनहार ने अपने ऊपर दया लिख दी है।” [सूरतुल-अन्आम : 12], और सहीह हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फरमान से दलील पकड़ी है : “मैंने अपने आप पर ज़ुल्म (अन्याय व अत्याचार) को हराम कर लिया है और उसे तुम्हारे बीच निषिद्ध (हराम) कर दिया है।” इस विषय पर अन्य स्थान पर विस्तार से चर्चा की गई है।

जहाँ तक मख़लूक़ पर क़ियास करते हुए अल्लाह सर्वशक्तिमान पर किसी चीज़ को अनिवार्य करने और निषिद्ध ठहराने की बात है, तो यह क़दरिय्यह का कथन है, और यह एक नवरचित कथन है, जो प्रामाणिक ग्रंथों और स्पष्ट तर्क के विपरीत है।

अह्ले-सुन्नत इस बात पर सहमत हैं कि अल्लाह महिमावान सभी चीजों का रचयिता और स्वामी है, और यह कि उसने जो कुछ चाहा, वह हुआ और जो नहीं चाहा, वह नहीं हुआ। और यह कि बंदे उसपर कोई चीज़ अनिवार्य नहीं कर सकते। इसीलिए अह्ले सुन्नत में से जिन लोगों ने अनिवार्य होने की बात कही है, उन्होंने कहा है कि : उसने अपने आप पर लिख दिया है, और उसने अपने ऊपर हराम कर लिया है। यह नहीं कि बंदा स्वयं अल्लाह पर किसी चीज़ का अधिकार रखता है, जिस तरह कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य पर अधिकार रखता है; क्योंकि अल्लाह तआला ही बंदों पर हर भलाई के साथ उपकार करने वाला है। चुनाँचे वही उनका सृष्टिकर्ता है, और वही उनकी ओर रसूलों को भेजने वाला है तथा वही उनके लिए ईमान और सत्कर्म को आसान करने वाला है।

तथा क़दरिय्यह, मोतज़िला और उन जैसे लोगों में से जिनका भी यह भ्रम है कि वे अल्लाह पर उसी तरह हक़ रखते हैं, जिस तरह कि एक कर्मचारी (मज़दूर) उस व्यक्ति पर हक़ रखता है, जिसने उसे काम (मज़दूरी) पर रखा है; तो वह इस विषय में अनभिज्ञ है।”

“इक़तिज़ाउस-सिरातिल मुस्तक़ीम” (2 / 310-311) से उद्धरण समाप्त हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर