क़ब्र वालों को सलाम करने का तरीका

प्रश्न 34561

क़ब्रों के पास (या क़ब्रिस्तान में) जाने पर कौन-सा सलाम पढ़ा जाता है? क्या यह सलाम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा-किराम के लिए पढ़े जाने वाले सलाम से अलग है?

क्या यह बात सही है कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र पर "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह" कहें, और जब क़ब्रिस्तान में प्रवेश करें, तो "अस्सलामु अलैकुम या अहलल-क़ुबूर" कहें? या कि इसे शिर्क माना जाएगा?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

पुरुषों के लिए क़ब्रों की ज़ियारत करना मुस्तहब (अनुशंसित) है। क्योंकि बुरैदा बिन हुसैब (रज़ियल्लाहु अन्हु) की हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  ने फ़रमाया : "मैंने पहले तुम्हें क़ब्रों की ज़ियारत से रोका था, (अब) तुम उनकी ज़ियारत किया करो।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 977) ने रिवायत किया है। एक दूसरी रिवायत में है : "क्योंकि यह तुम्हें आख़िरत की याद दिलाती है।" इसे अहमद (मुस्नद, हदीस संख्या : 1240) और इब्न माजह (हदीस संख्या : 1569) ने रिवायत किया है और अलबानी ने सहीह इब्न माजह में इसे सहीह कहा है।

क़ब्रिस्तान में प्रवेश करते समय क्या कहना चाहिए?

जब कोई व्यक्ति क़ब्रिस्तान की ज़ियारत के लिए जाए, तो उसके लिए मुस्तहब यह है कि वह क़ब्र वालों को सलाम करे और उनके लिए वही दुआ करे जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा को सिखाया करते थे। आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा : "ऐ अल्लाह के रसूल! मैं क़ब्र वालों से क्या कहूँ?" तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "कहो : अस्सलामु अला अहलिद्दियारि मिनल-मूमिनीना वल-मुस्लिमीन, व यरहमुल्लाहुल-मुस्तक़्दिमीना मिन्ना वल-मुस्ता’खिरीन, व इन्ना इन शा अल्लाहु बिकुम ललाहिक़ून।" (इन बस्तियों (कब्रों) में रहने वाले मोमिनों और मुसलमानों पर सलाम हो। अल्लाह हममें से पहले गुज़रने वालों और बाद में आने वालों पर दया करे। और निःसंदेह हम भी, इन शा अल्लाह, शीघ्र ही तुमसे आ मिलने वाले हैं।" (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 974)

बुरैदा बिन हुसैब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है : “अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा को सिखाते थे कि जब वे क़ब्रिस्तान की तरफ़ निकलें, तो उनमें से कहने वाला कहे :

"अस्सलामु अलैकुम अहलद्दियारि मिनल-मूमिनीना वल-मुस्लिमीन, व इन्ना इन शा अल्लाहु ललाहिक़ून, असअलुल्लाहा लना व लकुमुल-आफ़ियह।" ("ऐ इन बस्तियों -क़बरों- में रहने वाले मोमिनो और मुसलमानो! तुम पर सलाम हो। निःसंदेह हम भी, इन शा अल्लाह, तुम से आ मिलने वाले हैं। हम अपने और तुम्हारे लिए अल्लाह से आफ़ियत (सुरक्षा एवं सुख-शांति) की दुआ करते हैं।" (सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 975)

सहाबा की कब्रों पर क्या कहा जाए?

सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की कब्रों पर भी यही दुआएँ पढ़ी जाएँगी जिनका ऊपर उल्लेख हुआ। उनके लिए कोई विशेष दुआ निर्धारित नहीं है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अबू बक्र और उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की क़ब्र की ज़ियारत:

जहाँ तक नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके दो जलीलुल-क़द्र साथी – अबू बक्र व उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा – की क़ब्रों की ज़ियारत का संबंध है, इसके बारे में सहाबा से जो तरीका प्रमाणित है, वह केवल सलाम करना है। अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहा करते थे : "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह। अस्सलामु अलैका या अबा बक्र। अस्सलामु अलैका या अबती।" फिर वह वापस लौट जाते थे।

हाफ़िज़ इब्न हजर ने इस रिवायत को सही कहा है।

कुछ विद्वानों ने उक्त सलाम के साथ यह भी कहा है : "अस्सलामु अलैका या ख़ीरतल्लाहि मिन  ख़ल्क़िहि, अस्सलामु अलैका या सैय्यिदल-मुर्सलीन ... अश्हदु अन्नक़ा क़द बल्लग़तर-रिसाला।” (ऐ अल्लाह की मख़लूक़ में सबसे श्रेष्ठ। ऐ रसूलों के सरदार... मैं गवाही देता हूँ कि आपने अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया।) देखें नववी की “अल-अज़कार” (पेज 174), और अल-मुग़नी, 5/466।

लेकिन इमाम तबरी ने कहा :

यदि कोई यह विस्तृत सलाम कहे तो कोई हर्ज़ नहीं, किंतु (सहाबा का) अनुसरण करना अधिक उत्तम है।” उद्धरण समाप्त हुआ। अर्थात् सहाबा से जो सलाम प्रमाणित है, उसी पर अमल करना अधिक उत्तम है।

शैख़ इब्न उसैमीन (रहिमहुल्लाह) हज्ज और उमरा के मनासिक में कहते हैं :

“जब व्यक्ति पहली बार मस्जिदे-नबवी में पहुँचे, तो अल्लाह जितनी तौफ़ीक़ प्रदान करे उतनी नमाज़ पढ़ने के बाद, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके दोनों साथियों (अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा पर सलाम पढ़ने के लिए जाए।

  1. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र के सामने, उसकी तरफ मुंह करके और अपनी पीठ क़िबला की तरफ करके, खड़ा हो जाए और कहे :

"अस्सलामु अलैका अय्युहन-नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।" यदि कुछ उचित शब्द और बढ़ा दे तो भी कोई हर्ज़ नहीं, जैसे कि वह कहे : "अस्सलामु अलैका या ख़लीलल्लाह, व अमीनहू अला वह्यिहि, व ख़ीरतहू मिन ख़ल्क़िहि। अश्हदु अन्नका क़द बल्लग़्तर-रिसालह, व अद्दैतल-अमानह, व नसहतल-उम्मह, व जाहद्ता फ़िल्लाहि हक़्क़ा जिहादिह।"

यदि केवल पहला सलाम कहे, तो भी यह अच्छा है। अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) जब सलाम करते, तो कहते थे : "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह। अस्सलामु अलैका या अबा बक्र। अस्सलामु अलैका या अबती।" फिर वह वापस लौट जाते थे।

  1. फिर वह अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने खड़े होने के लिए एक क़दम अपनी दाईं ओर बढ़ाए और कहे : "अस्सलामु अलैका या अबा बक्र। अस्सलामु अलैका या ख़लीफ़ता रसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़ी उम्मतिह। रज़ियल्लाहु अन्का, व जज़ाका अन् उम्मति मुहम्मदिन ख़ैरा।" (आप पर शांति हो, ऐ अबू बक्र, आप पर शांति हो, ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के उनकी उम्मत में उत्तराधिकारी, अल्लाह आपसे खुश हो और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की उम्मत की तरफ से आपको अच्छा बदला दे।)
  2. फिर एक और क़दम दाहिनी ओर बढ़ाकर उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के सामने खड़ा होकर कहे :

"अस्सलामु अलैक या उमर। अस्सलामु अलैक या अमीरल-मूमिनीन। रज़ियल्लाहु अन्का, व जज़ाका अन् उम्मति मुहम्मदिन ख़ैरा।" (आप पर शांति हो, ऐ उमर, आप पर शांति हो, ऐ अमीरुल-मूमिनीन, अल्लाह आपसे खुश हो और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की उम्मत की तरफ से आपको अच्छा बदला दे।)

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके दोनों साथियों को अति शिष्टता व शालीनता के साथ और धीमी आवाज़ में सलाम किया जाना चाहिए। क्योंकि मस्जिद में आवाज़ ऊँची करने से मना किया गया है, खासकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मस्जिद में, और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र के पास।”

“मनासिकुल हज्जि वल उम्रति वल- मशरूओ फ़िज़्ज़ियारति” (पृष्ठ : 107-108).

क्या "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह" कहना शिर्क है?

क़ब्रिस्तान की ज़ियारत के समय "अस्सलामु अलैकुम" कहना, या नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़ब्र पर जाकर "अस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह" कहना शिर्क नहीं है। क्योंकि यह मुर्दों से दुआ माँगना या उनसे सहायता माँगना नहीं है, बल्कि यह तो (स्वयं) उनके लिए सलामती की दुआ करना है कि अल्लाह उन्हें मृत्यु के बाद पेश आने वाली कठिनाइयों — क़ब्र के अज़ाब, फिर पुनर्जीवन, हिसाब-किताब और आख़िरत की भयावह अवस्थाओं — से सुरक्षित रखे।

हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में सलामती और कुशलता प्रदान करे।

और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।

देखिए : ज़ाद अल-मुस्तक़ने’ 5/473, और अशरात अस-सा’अह - डॉ. यूसुफ अल-वाबिल, पृष्ठ : 337.

संदर्भ

मृतक क्रिया और कब्र के अहकाम

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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