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क्या ज़कात के पैसे गरीबों को नकद रूप में देने के बजाय उससे उनके लिए सामान खरीदना जाइज़ है ॽ

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प्रकाशन की तिथि : 03-03-2012

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प्रश्न

मेरे ऊपर मेरे माल में ज़कात अनिवार्य है, तो क्या मेरे लिए जाइज़ है कि मैं गरीबों को पैसे देने के बजाय, उन्हें ज़कात के माल से खाने या कपड़े खरीद कर दे दूँ ॽ क्योंकि यदि मैं उन्हें पैसे देता हूँ तो हो सकता है कि वे उसे गैर लाभ की चीज़ों में खर्च कर दें, या उसे पाप में खर्च करें ॽ
हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।
मूल सिद्धांत यह है कि ज़कात को उसी माल से निकाला जाय जिसमें ज़कात अनिवार्य है, और गरीबों को उसी तरह दे दिया जाय।

उत्तर का पाठ

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह से प्रश्न किया गया :

एक आदमी पर ज़कात अनिवार्य है, क्या उसके लिए जाइज़ है कि वह उसे अपने ज़रूरतमंद रिश्तेदारों को दे दे या उस से उनके लिए कपड़े या अनाज खरीद कर दे दे ॽ

तो उन्हों ने उत्तर दिया कि :

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, ज़कात को उसके हक़दार लोगों को देना जाइज़ है, यद्यपि वे उसके उन रिश्तेदारों में से ही क्यों न हों जो उसके परिवार में से नहीं हैं, किंतु उन्हें अपने धन से देगा, और वे जो कुछ चाहते हैं उसे खरीदने के लिए किसी को अनुमति प्रदान कर देंगे।” “मजमूउल फतावा” (25/88).

तथा इफ्ता की स्थायी समिति से ज़कात के माल से धार्मिक पुस्तकें खरीदने और उन्हें वितरित करने के बारे में प्रश्न किया गया ॽ

तो उसने उत्तर दिया : “ज़कात के माल से पुस्तकें खरीदना और उसे उपहार में देना जाइज़ नहीं है, बल्कि उसे उसके उन हक़दारों को उसी तरह (नक़द रूप में) दे दिया जायेगा जिनका अल्लाह तआला ने अपनी किताब में उल्लेख किया है, चुनांचे फरमाया :

إنما الصدقات للفقراء والمساكين والعاملين عليها والمؤلفة قلوبهم وفي الرقاب والغارمين و في سبيل الله وابن السبيل فريضة من الله والله عليم حكيم [التوبة : 60]

ख़ैरात (ज़कात) तो बस गरीबों का हक़ है और मिसकीनों का और उस (ज़कात) के कर्मचारियों का और जिनके दिल परचाये जा रहे हों और गुलाम के आज़ाद करने में और क़र्ज़दारों के लिए और अल्लाह की राह (जिहाद) में और मुसाफिरों के लिए, ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अललाह तआला बड़ा जानकार हिकमत वाला है।” (सूरतुत्तौबा : 60)

और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला है तथा अल्लाह तआला हमारे पैगंबर मुहम्मद, आपकी संतान और साथियों पर दया और शांति अवतरित करे। “फतावा स्थायी समिति” (10/47).

और यदि जो व्यक्ति ज़कात का अधिकृत है, वह पाप करने वाला है, और उसके बारे में इस बात की आशंका है कि वह ज़कात के माल का कुछ हिस्सा पाप और अवज्ञा में खर्च कर सकता है, तो हम ज़कात उस व्यक्ति को भुगतान करेंगे जो उस पर खर्च करे, या हम उस से यह कहेंगे कि वह हमें जिस चीज़ की उसे ज़रूरत है उसके खरीदने के लिए वकील बना दे।

शैख मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया :

“जो व्यक्ति घूम्रपान करने में ग्रस्त है यदि वह गरीब है, तो संभव है कि हम ज़कात उसकी बीवी को दे दें और वह स्वयं ज़रूरी चीज़ों को खरीद कर घर की पूर्ति कर ले, और ऐसा भी संभव है कि हम उस से कहें कि: हमारे पास ज़कात है, तो क्या तुम यह चाहते हो कि तुम्हारी ज़रूरत की अमुक और अमुक चीज़ खरीद दें ॽ और हम उस से यह मांग करें कि वह हमें उन चीज़ों को खरीदने के लिए वकील बना दे। इस से मकसद हासिल हो जायेगा और निषेध खत्म हो जायेगा - और वह पाप पर उसकी मदद करना है - क्योंकि जिस व्यक्ति ने किसी को पैसे दिए जिस से वह घूम्रपान खरीद कर पीता है तो उस व्यक्ति ने गुनाह पर उसकी सहायता की, और उस निषेध में दाखिल हो गया जिस से अल्लाह तआला ने अपने इस कथन में मना किया है : “तथा गुनाह और आक्रामकता (अत्याचार) में एक दूसरे की मदद न करो।” (सूरतुल माइदाः 2)

“मजमूओ फतावा इब्न उसैमीन” (17/प्रश्न संख्या : 262).

तथा उनसे यह भी प्रश्न किया गया कि : क्या ज़कात को उपभोग किए जाने वाले सामान और कपड़ों के रूप में निकालना जाइज़ है यदि उसे ज्ञात हो जाए कि कुछ गरीब परिवारों के लिए इन चीज़ों को खरीदना ही सबसे अधिक उपयोगी है ; क्योंकि उसे इस बात की आशंका है कि अगर उन्हें पैसे (नकद) ही दे दिए गए तो वे उसे ऐसी चीज़ों में खर्च कर देंगे जिसमें कोई लाभ नहीं है ॽ

तो उन्हों ने उत्तर दिया:

“यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेागों को इसकी आवश्यकता पड़ती है यदि इस घर वाले गरीब हैं, यदि हम उन्हें पैसे भुगतान कर दें तो वे उसे विलासता और ऐसी चीज़ें खरीदने में बर्बाद कर देंगे जो उपयोगी नहीं हैं, इसलिए यदि हम उनके लिए ज़रूरी चीज़ें खरीद कर उन्हें दे दें, तो क्या यह जाइज़ है ॽ विद्वानों के निकट यह बात सर्वज्ञात है कि ऐसा करना जाइज़ नहीं है, अर्थात आदमी के लिए यह वैध नहीं है कि वह पैसे देने के बजाय अपनी ज़कात के माल से सामान खरीद कर दे, उनका कहना है : क्योंकि पैसे गरीब के लिए अधिक लाभदायक हैं, इसलिए कि पैसों से वह जो चाहे कर सकता है, जबकि सामान का मामला इसके विपरीत है। क्योंकि हो सकता है कि उसे उनकी ज़रूरत न हो और ऐसी स्थिति में वह उसे कम भाव में बेच देगा। किंतु यहाँ एक तरीक़ा (उपाय) है कि यदि आप को डर है कि इस घर वालों को अगर आप ज़कात दे देंगे तो वे उसे गैर ज़रूरी चीज़ों में खर्च कर डालेंगे, तो आप घर के मालिक से चाहे वह बाप हो, या माँ या भाई या चाचा हो, उस से कहें कि : मेरे पास ज़कात है, तो आप लोगों को किन चीज़ों की ज़रूरत है ताकि मैं उन्हें तुम्हारे लिए खरीद कर भेजवा दूँ ॽ यदि वह यह रास्ता अपनाता है तो यह जाइज़ है और ज़कात अपने उचित स्थान पर पहुँच जायेगी।” “मजमूओ फतावा इब्ने उसैमीन” (18/प्रश्न संख्या : 643).

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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