शुक्रवार 6 शव्वाल 1441 - 29 मई 2020
हिन्दी

चीनी, चाय और डिब्बाबंद सामान से ज़कातुल-फ़ित्र निकालना

प्रश्न

क्या चीनी, चाय और डिब्बाबंद सामानों से ज़कातुल-फ़ित्र निकालना जायज़ हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :

ज़कातुल-फ़ित्र केवल उन्हीं खाद्य पदार्थों से निकालना जायज़ है जो लोगों के लिए प्रधान भोजन (पोषक तत्व) समझे जाते हैं।

इसका प्रमाण वह हदीस है जिसे बुखारी (हदीस संख्या : 1510) ने अबू सईद अल-ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : “हम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग (जीवनकाल) में ईदुल-फ़ित्र के दिन, एक साअ खाना (खाद्य पदार्थ) निकालते थे। उस समय हमारा खाना (सामान्य आहार) जौ, किशमिश, पनीर और खजूर हुआ करता था।”

अतः सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम उस चीज़ से एक साअ (ज़कातुल-फ़ित्र के रूप में) निकालते थे जिसे वे प्रधान भोजन (पोषक तत्व) के तौर पर खाते थे।

परंतु जो भी खाद्य पदार्थ लोगों का प्रधान भोजन नहीं माना जाता है, उससे ज़कातुल-फ़ित्र निकलना जायज़ नहीं है।

“प्रधान भोजन” से अभिप्राय : वे खाद्य पदार्थ हैं, जिन्हें लोग अपने पोषण के मूल स्रोत के रूप में खाते हैं।

“अल-मौसूअतुल फ़िक़्हिय्यह” (6/44) में आया है : “प्रधान भोजन (यानी पोषक खाद्य पदार्थ) : जैसे कि गेहूं और चावल, तथा अन्य चीज़ें जिन्हें आहार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है : वे हैं जो ऐसा भोजन होने के रूप में उपयुक्त हों जिनके द्वारा शरीर को स्थायी रूप से पोषण प्राप्त होता है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

यह बात सर्वज्ञात है कि चीनी और चाय - लोगों को उनकी आवश्यकता होने के बावजूद – उन चीजों में से नहीं हैं, जिन्हें लोग प्रधान भोजन (पोषण प्रदान करने वाले खाद्य) के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके आधार पर, उन दोनों से ज़कातुल-फ़ित्र निकालना जायाज़ नहीं है।

दूसरा :

यदि डिब्बाबंद सामान ऐसे खाद्य पदार्थों के हैं, जिन्हें लोग प्रधान भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें ज़कातुल-फ़ित्र के रूप में देने में कोई आपत्ति की बात नहीं है, जैसे कि लूबिया, चना, मकई, मटर और फलियों (बीन्स) आदि के डिब्बे।

लेकिन यह ध्यान में रहना चाहिए कि ये डिब्बाबंद सामान अन्य चीजों पर भी आधारित होते हैं, जो इन खाद्य पदार्थों में शामिल की जाती हैं। इसलिए माप या वज़न का आकलन करते समय इस पर ध्यान देना आवश्यक है।

इब्ने क़ुदामह रहिमहुल्लाह कहते हैं :

“यदि उससे मिश्रित होने वाली चीज़, माप का एक हिस्सा ग्रहण करती है और वह इतनी अधिक (मात्रा में) है कि उसे उसमें एक दोष माना जाता है, तो उसे (ज़कातुल-फ़ित्र के रूप में) निकालना पर्याप्त नहीं है। लेकिन अगर वह अधिक (मात्रा में) नहीं है, तो उसे (ज़कातुल-फ़ित्र के रूप में) निकालना जायज़ है, यदि वह एक साअ पर इतनी मात्रा की वृद्धि कर दे कि वह उसमें अलग से मिश्रित की गई चीज़ की मात्रा में बढ़ जाए, यहाँ तक कि (ज़कातुल फ़ित्र के रूप में) निकाली गई चीज़ (यानी मूल खाद्य) पूरे एक साअ हो जाए।”

इब्ने कुदामह की “अल-मुग़्नी” (4/294) से उद्धरण समाप्त हुआ।

अल-मरदावी रहिमहुल्लाह का कहना है : “भले ही जिस चीज़ में अतिरिक्त मिश्रित चीज़ की मात्रा अधिक है, उसे ज़कातुल फ़ित्र के रूप में निकालना पर्याप्त नहीं है, लेकिन अगर यह कहा जाए कि यदि उसमें (भी) अतिरिक्त घटक की मात्रा के अनुकूल वृद्धि कर दी जाए, तो उसे भी ज़कातुल फ़ित्र के रूप में निकालना पर्याप्त होगा, तो यह एक ठोस राय होगी।”

“अल-इंसाफ” (3/130) से उद्धरण समाप्त हुआ।

अल-मरदावी रहिमहुल्लाह ने जो यह बात कही है, वही सही दृष्टिकोण है। क्योंकि उद्देश्य यही है कि खाद्य सामग्री का एक साअ निकाला जाए। इसलिए यदि कोई व्यक्ति डिब्बाबंद लूबिया निकालता है और अकेले लूबिया के दाने ही एक साअ की मात्रा को पहुँच जाते हैं, तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है। क्योंकि उसने उतना काम कर दिया जो उसपर अनिवार्य था, जो कि एक साअ की मात्रा में खाद्य पदार्थ का निकालना है। इसके अलावा, यह बात भी है कि लूबिया के साथ मिश्रित ये चीजें, उसको खराब होने से बचाने और उसके स्वाद को अच्छा करने के लिए, मिलाई जाती हैं। इसलिए इनकी वृद्धि उसमें दोष नहीं माना जाता है।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

प्रतिक्रिया भेजें