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उसने भूलकर जनाबत की अवस्था में नमाज़ पढ़ी, फिर उसे एक अवधि के बाद याद आया

13-09-2019

प्रश्न 302878

मेरे चाचा की मृत्यु हो गई, और मुझे उनकी मृत्यु के बारे में पता चला। इसलिए मैं जल्दी से दुर्घटना के दृश्य को देखने के लिए रवाना हो गया और मैंने लगभग 90 किलोमीटर की दूरी तय की, जबकि मैं जनाबत की अवस्था में था। मैं उस स्थान पर पहुँच गया, और मेरे लिए पानी ढूँढना दुर्लभ हो गया, इसलिए मैंने तयम्मुम किया और उसे स्नान दिया। फिर हम दफनाने के लिए गाँव लौट आए। मैं मस्जिद पहुँचा और उस समय मौसम बेहद ठंडा था। चुनाँचे मैं भूल गया कि मैंने तयम्मुम किया था और मैं अंदर चला गया और वुज़ू किया, फिर मैंने फज्र की नमाज़ पढ़ी। उसके बाद हमने जनाज़ा (अंतिम संस्कार) की नमाज़ पढ़ी और फिर हम दफनाने के लिए गए। मैं उसकी कब्र में उतरा और उसे लहद में रखा। गंभीर थकान की वजह से मैंने किसी चीज़ पर ध्यान नहीं दिया। उसके एक साल बाद, मुझे याद आया कि क्या हुआ था। तो  क्या मेरी नमाज़ सही हैॽ और क्या मुझ पर कोई पाप हैॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह तआला के लिए योग्य है।.

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

ऐसे व्यक्ति के लिए तयम्मुम करना धर्मसंगत है जिसे पानी नहीं मिल रहा है, या जिसे पानी मिल सकता है, लेकिन किसी बीमारी के कारण, या बीमार हो जाने के डर से उसके लिए उसका उपयोग करना दुर्लभ है, जैसा कि प्रश्न संख्याः (11973) के उत्तर में इसका उल्लेख किया जा चुका है।

इसके आधार पर, यदि आपने पानी उपलब्ध न होने के कारण तयम्मुम किया था, तो आपका तयम्म सही (मान्य) था। लेकिन इसकी वैधता अस्थायी है जो उज़्र के समापन के साथ प्रतिबंधित है, और आपके गाँव में प्रवेश करने से उज़्र समाप्त हो गया; क्योंकि पानी उपलब्ध था और उसको गरम करना संभव था। इसलिए आपकी सुबह की नमाज़ बिना तहारत के हुई है क्योंकि आप ने जनाबत की अवस्था में नमाज़ पढ़ी है, अतः आपके लिए नमाज़ को दोहराना ज़रूरी है, आप पर कोई पाप नहीं है क्योंकि आप ने जानबूझकर जनाबत की अवस्था में नमाज़ नहीं पढ़ी है। अल्लाह तआला का फरमान हैः

 وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ فِيمَا أَخْطَأْتُمْ بِهِ وَلَكِنْ مَا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْ 

الأحزاب:5 

“तुम से भूल चूक में जो कुछ हो जाए उसमें तुम्हारे ऊपर कोई पाप नहीं, किन्तु पाप वह है जिसका तुम हृदय से इरादा करो।” (सूरतुल अहज़ाब : 5)

नववी रहिमहुल्लाह ने कहा :

"मुसलमानों की इस बात पर सर्व सहमति है कि हदस वाले (बिना वुज़ू वाले) व्यक्ति पर नमाज़ हराम है, तथा वे इस बात पर भी एकमत हैं कि उसकी नमाज़ सही नहीं है, चाहे वह अपने हदस (नापाकी) को जानता हो, या उससे अज्ञान हो या भूल गया हो। लेकिन यदि उसने अज्ञानता में या भूलकर नमाज़ पढ़ी है तो उसके ऊपर पाप नहीं है।''

''अल-मजमूअ (2/67)'' से समाप्त हुआ।

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने कहा :

''जो व्यक्ति हदस से पवित्रता हासिल करना भूल गया और भूलकर नमाज़ पढ़ ली : तो उसपर पवित्रता के साथ नमाज़ को दोहराना अनिवार्य है, इसमें कोई विवाद नहीं है।'' ''मजमू अल-फतावा (22/99)'' से समाप्त हुआ।

शैख़ अब्दुल-अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह से पूछा गया :

''क्या जिस व्यक्ति ने यह समझते हुए कि वह वुज़ू की अवस्था में है, नमाज़ पढ़ ली, फिर उसे पता चला कि उसने वुज़ू के बिना नमाज़ पढ़ी है, तो क्या उसकी नमाज़ सही है या उसके लिए नमाज़ दोहराना ज़रूरी है?

तो उन्होंने जवाब दिया : जिस आदमी ने यह समझते – या सोचते - हुए नमाज़ पढ़ी कि वह वुज़ु की अवस्था में है, फिर उसे पता चला कि वह वुज़ू की अवस्था में नहीं है, तो वह नमाज़ को दोहराएगा। क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान  है: अल्लाह तआला तहारत (पवित्रता) के बिना नमाज़ स्वीकार नहीं करता है।'' तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः ''अल्लाह तुम में से किसी की नमाज़ को स्वीकार नहीं करेगा अगर उसने हदस किया (यानी उसका वुज़ू टूट गया) है यहाँ तक कि वह वुज़ू कर ले।''

इस पर सभी मुलमानों की सर्वसहमति है कि यदि मनुष्य नमाज़ पढ़े फिर उसके लिए स्पष्ट हो कि वह वुज़ू की अवस्था में नहीं है, तो वह वुज़ू करेगा और नमाज़ को दोहराएगा।''

''फतावा नूरुन अलद दर्ब (7/229)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा उनसे यह भी पूछा गया :

“मुझे याद आता है कि मैंने एक बार बिना वुज़ू के नमाज़ पढ़ी थी, क्या मुझे वह नमाज़ दोहरानी चाहिए?

तो उन्होंने जवाब दिया : हाँ, मुसलमानों की सर्व सहमति के अनुसार इसे दोहराना ज़रूरी है, क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "अल्लाह बिना तहारत (वुज़ू) के नमाज़ को स्वीकार नहीं करता है।” इसे मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है। तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः ''तुम में से किसी की नमाज़ स्वीकार नहीं की जाएगी अगर उसने हदस किया (यानी उसका वुज़ू टूट गया) है यहाँ तक कि वह वुज़ू कर ले।'' (इसके सही होने पर बुखारी व मुस्लिम सहमत हैं).

“फतावा नूरुन अलद-दर्ब (7/230-231)” से उद्धरण समाप्त हुआ।

तथा आपको गुनाहगार नहीं समझा जाएगा, क्योंकि भूल-चूक के कारण मनुष्य को क्षम्य समझा जाता है।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

नमाज़ की शर्तें
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