सर्व प्रथम :
जो व्यक्ति इस्लाम की शाश्वत शरीयत को जानता है, वह इस्लाम के दिए गए आदेशों और निषेधों के प्रति उलझन का शिकार नहीं होता। क्योंकि इस्लामी शिक्षाओं का ज्ञान उसे इस बात से रोकता है कि वह हैरान होकर केवल “हिकमत” (बुद्धिमत्ता) और “इलल” (कारण) खोजता फिरता रहे। ऐसे संदेह और सवाल हमें प्रायः उन्हीं से देखने को मिलते हैं जो इस महान धर्म से अनभिज्ञ होते हैं।
यदि कोई व्यक्ति किसी मानव चिकित्सक पर पूर्ण भरोसा करता हो और वह चिकित्सक स्वास्थ्य को बनाए रखने और बीमारियों के रोकथाम से जुड़े कार्यक्रम बताए, तो आप देखेंगे कि वह व्यक्ति पूरे विश्वास के साथ उसकी बात मान लेता है और उसके आदेशों का पालन करता है, इस यकीन के साथ कि चिकित्सक अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर ही बोल रहा है। वह यह सोचते-समझते नहीं ठहरता कि यहाँ ऐसा क्यों कहा और वहाँ ऐसा क्यों रोका।
और अल्लाह के लिए तो सर्वोच्च उदाहरण है। हमारे रब पर हमारा भरोसा उस व्यक्ति के उस चिकित्सक पर भरोसे से तुलना योग्य ही नहीं है। और ऐसा कैसे हो सकता है, जबकि अल्लाह और मनुष्य के बीच; स्रष्टा और उसकी रची हुई सृष्टि के बीच तुलना का कोई आधार ही नहीं है?
इसी बात की पुष्टि इमाम इब्नुल-क़ैयिम (रहिमहुल्लाह) के उस कथन से होती है जो उन्होंने पवित्रता की विधि-व्यवस्था की हिकमतों पर अपनी चर्चा के अंत में कहा :
यदि “हिप्पोक्रेटिस” (मशहूर ग्रीक साइंटिस्ट ‘‘बुक़रात’’) और उसके जैसे लोग ऐसी बातें कहते, तो उनके अनुयायी उन्हें पूर्ण विनय से स्वीकार करते, उन्हें अत्यधिक महत्त्व देते, और जितनी हिकमतें व लाभ बता सकते, सब बता डालते।” (शिफा-उल-अलील, पृष्ठ : 230)
दूसरा :
जहाँ तक पवित्रता को विधिसम्मत ठहराने की हिकमतों का प्रश्न है : तो वे बहुत-सी हैं। यहाँ पवित्रता से आशय है : गंदगी और नापाकी को दूर करना, वुज़ू करना और ग़ुस्ल करना। इनमें से कुछ हिकमतें ये हैं :
- पवित्रता मानव की फ़ितरत के अनुरूप है।
अल्लाह ने मनुष्य को जिस स्वाभाविक प्रकृति पर पैदा किया है, पवित्रता उसके अनुकूल है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम “फ़ितरत का धर्म” है। वह “सुन्नने-फ़ितरत” (स्वाभाविक आचरणों) पर ज़ोर देता है ताकि उन कामों में से जिन्हें किया जाता है उनको करने और जिन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है उनसे बचने पर ज़ोर दिया जा सके। चुनाँचे चेहरे को धोना, नाक-मुँह साफ़ करना, हाथ धोना, ग़ुस्ल करना, इस्तिंजा करना, इन सब के लिए किसी अलग शरीअत की आवश्यकता नहीं है। बल्कि सही फ़ितरत वाला इंसान स्वयं ही इन अंगों को साफ़ रखता है और उन्हें गंदगी व नापाकी से दूर रखता है।
- इस्लाम सफ़ाई और सौंदर्य का धर्म है।
वह चाहता है कि उसके अनुयायी लोगों के बीच उत्कृष्ट हों—अपने शरीर को साफ़ रखें, बाल सँवारें, सबसे पवित्र कपड़े पहनें और सुगंधित हों। ऐसे लोग निश्चय ही लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं, जिससे इस महान धर्म की दावत (आह्वान) सफल होती है। जिस तरह लोग साफ़-सुथरे शरीर और कपड़ों वालों की ओर आकर्षित होते हैं, उसी प्रकार वे गंदे-मैले कपड़े और शरीर से घृणा करते हैं—और ऐसी अस्वच्छता का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।
- आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों ने सिद्ध किया है कि सफ़ाई और पवित्रता बहुत-से रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है, और गंदगी बहुत-सी बीमारियों का कारण बनती है। तो फिर यह कैसे संभव है कि यह महान धर्म अपने विधानों में रोगों की रोकथाम और उनके फैलाव को रोकने वाले उपाय शामिल न करे?
- मुसलमान की अपने रब से मुलाक़ातें होती हैं।
जो व्यक्ति किसी बड़े अधिकारी, राजा या महान व्यक्ति के सामने खड़ा होता है, वह—जैसा कि देखा जाता है—अपने शरीर और कपड़ों की सफ़ाई तथा सुगंध का विशेष ध्यान रखता है। मनुष्यों के सामने ऐसा करना इस्लाम में निषिद्ध नहीं, बल्कि यही हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीका था—आप प्रतिनिधिमंडलों के लिए सुसज्जित होते थे। और इससे भी बढ़कर, सबसे अधिक जिसके लिए साज-सज्जा और पवित्रता होनी चाहिए, वह अल्लाह तआला है। इसलिए हमें यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब हम अल्लाह के सामने ऐसा करें; क्योंकि लोग अपने जैसे मख़लूक़ (मनुष्य) के सामने भी इस पर इतना ध्यान देते हैं — तो फिर सोचिए, अल्लाह के सामने स्थिति कैसी होनी चाहिए! अतः अल्लाह इस बात का सबसे अधिक हक़दार है कि लोग उसके लिए सुसज्जित हों, जैसा कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने कहा। (देखें : सहीह इब्न ख़ुज़ैमा, हदीस संख्या : 766)
- शरीअत के नियमों पर विचार करने वाला व्यक्ति पवित्रता के तरीकों का अंतर समझ लेता है। वह समझता है कि जनाबत (बड़ी नापाकी) में ग़ुस्ल क्यों है, पेशाब में क्यों नहीं; और वुज़ू व ग़ुस्ल में क्या अंतर है।
इब्नुल-क़ैयिम (रहिमहुल्लाह) कहते हैं :
“शरीअत ने वीर्य (मनी) निकलने पर ग़ुस्ल अनिवार्य किया, पेशाब पर नहीं—यह शरीअत की महान सुंदरताओं में से है, जिसमें दया, हिकमत और हित निहित हैं। वीर्य पूरे शरीर से निकलता है; इसलिए अल्लाह ने उसे “सुलाला” कहा—क्योंकि वह पूरे शरीर से प्रवाहित होता है। जबकि पेशाब केवल भोजन-पेय का अपशिष्ट है जो पेट और मूत्राशय में बनता है। इसलिए वीर्य के निकलने से शरीर पर प्रभाव, पेशाब की तुलना में अधिक होता है।
इसके अतिरिक्त, वीर्य निकलने के बाद ग़ुस्ल शरीर, हृदय और आत्मा—सबके लिए अत्यंत लाभकारी है। ग़ुस्ल उस क्षति की पूर्ति करता है जो वीर्य निकलने से होती है—यह अनुभव से जाना जाता है।
जनाबत भारीपन और सुस्ती लाती है, और ग़ुस्ल से फुर्ती व स्फूर्ति आती है। इसी कारण अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु ने ग़ुस्ल के बाद कहा : “मानो मुझसे एक बोझ उतर गया।”
संक्षेप में, यह बात सही इंद्रियों और स्वस्थ फ़ितरत वाला हर व्यक्ति समझता है कि जनाबत का ग़ुस्ल शरीर और हृदय की आवश्यक भलाई से जुड़ा है। जनाबत से हृदय और आत्मा पवित्र आत्माओं से दूर हो जाते हैं; ग़ुस्ल से यह दूरी समाप्त हो जाती है। इसी कारण नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जनाबत की अवस्था में सोने वाले को वुज़ू करने का आदेश दिया।
श्रेष्ठ चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि सहवास के बाद ग़ुस्ल शरीर की शक्ति लौटाता है और जो कमी होती है उसकी पूर्ति करता है—और इसका छोड़ देना हानिकारक है।
और यदि पेशाब पर भी ग़ुस्ल अनिवार्य किया जाता, तो यह उम्मत के लिए अत्यधिक कठिनाई बन जाती—जिसे अल्लाह की हिकमत, दया और कृपा स्वीकार नहीं करती।
(एलामुल-मुवक़्क़िईन, 2/77-78; तथा देखें : त़ाहिर बिन आ़शूर की "अत-तहरीर वत्-तन्वीर" 5/65)
- इस्लाम में बाह्य और आंतरिक का संबंध है।
जो व्यक्ति अपने शरीर और कपड़ों को गंदगी से साफ़ रखता है, उसे अपने भीतर और आत्मा को बुरे आचरण से और अधिक शुद्ध रखना चाहिए। जो व्यक्ति अपने शरीर और वस्त्र को सुंदर बनाता है, तो यह उसकी आंतरिक सुंदरता का संकेत है। इस्लाम केवल बाहरी सुंदरता पर ज़ोर नहीं देता और आंतरिक सुंदरता की उपेक्षा करता है— बल्कि दोनों ही आवश्यक हैं। यदि किसी के पास बाहरी साज-सज्जा के साधन न हों तो वह कुछ हद तक क्षम्य है, पर भीतर की सफ़ाई छोड़ने में वह क्षम्य नहीं। दोनों प्रकार की पवित्रता अल्लाह की प्रेम‑प्राप्ति का कारण हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है : إِنَّ الله يُحِبُّ التوابين وَيُحِبُّ المتطهرين “निःसंदेह, अल्लाह उन लोगों से प्रेम करता है जो बहुत तौबा करने वाले हैं और उनसे भी प्रेम करता है जो बहुत पाक-साफ़ रहने वाले हैं।" (सूरत अल-बक़रा : 222) - अंत में हम इमाम इब्नुल-क़ैयिम (रहिमहुल्लाह) का एक समग्र कथन प्रस्तुत करते हैं, वह कहते हैं :
शरीअत के अध्यायों, साधनों और उद्देश्यों पर विचार करो—तुम पाओगे कि वे लक्षित हिकमतों और श्रेष्ठ उद्देश्यों से भरे हुए हैं; यदि ये न होते तो लोग पशुओं जैसे, बल्कि उनसे भी बदतर होते। पवित्रता में हृदय और शरीर के लिए कितनी ही हिकमतें और लाभ निहित हैं — यह न केवल हृदय के लिए सुख का कारण है, बल्कि शरीर के लिए लाभदायक, मन के लिए ताजगी देने वाला और अंगों को सक्रिय करने वाला भी है। यह शरीर से उन भारों को हल्का करता है जिन्हें प्रकृति ने अनिवार्य बना दिया है, और आत्मा से उन मलिनताओं को दूर करता है जो अनुचित कर्मों के कारण उस पर चढ़ जाती हैं। इस प्रकार, यह हृदय, आत्मा और शरीर—सबकी सफ़ाई है।
इसी तरह जनाबत (शारीरिक अपवित्रता) के बाद किया जाने वाला स्नान शरीर के लिए कोमलता और स्फूर्ति पुनः उत्पन्न करता है। जिस प्रकार जनाबत की अवस्था में शरीर से ऊर्जा और स्फूर्ति समाप्त हो जाती है, वैसे ही यह स्नान उसी संतुलन और ताजगी को लौटाने का कार्य करता है — और यह उन सबसे लाभप्रद आचरणों में से एक है जो मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
विचार करो कि वुज़ू उन्हीं अंगों पर अनिवार्य किया गया है जो कर्म और क्रियाओं के प्रमुख साधन हैं। इसलिए, इसे सबसे पहले चेहरे पर अनिवार्य किया गया — जिसमें श्रवण (कान), दर्शन (आँखें), वाणी (मुख), गंध (नाक) और स्वाद (जीभ) के इंद्रिय‑द्वार समाहित हैं। यही पाँचों द्वार पाप और अवज्ञा के प्रवेश‑द्वार भी हैं; मानव के अधिकांश अपराध इन्हीं मार्गों से भीतर प्रवेश करते हैं। फिर वुज़ू हाथों पर अनिवार्य किया गया — जो कार्य के दो अंग, दो पंख समान हैं; इन्हीं से मनुष्य पकड़ता भी है और लेता-देता भी है, इन्हीं से वह अच्छा या बुरा व्यवहार करता है। फिर पैरों पर वुज़ू का आदेश दिया गया — जिनसे मनुष्य चलता है और अपने प्रयत्नों में आगे बढ़ता है।
जब सिर को धोना कठिनाई और कष्ट का कारण बन सकता था, तो शरीअत ने उस पर पानी डालने के स्थान पर मसह को पर्याप्त ठहराया। यह भी अल्लाह की दया है कि इस माध्यम से सिर और उसके अंगों से पापों का निष्कासन होता है — यहाँ तक कि वे बालों और त्वचा से पानी की हर बूँद के साथ निकल जाते हैं। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में प्रमाणित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जब कोई मुसलमान या मोमिन बंदा वुज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जिनकी ओर उसने अपनी आँखों से देखा था। फिर जब वह अपने हाथों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके हाथ के वे सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उनके हाथो के पकड़ने से हुए थे। फिर जब वह अपने पैरों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके पैरों से वे सारे गुनाह निकल जाते हैं, जिनकी ओर उसके पाँव चलकर गए थे। इस तरह वह पापों से पवित्र होकर निकलता है।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। और सहीह मुस्लिम में उसमान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो अच्छी तरह वुज़ू करता है, उसके जिस्म से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं।"
यह वुज़ू की महान हिकमतों और उसके फ़ायदों में से एक है।
जो लोग वुज़ू की हिकमत को नकारते हैं, वे कहते हैं : वुज़ू केवल एक धार्मिक आदेश है, एक कठिन और कष्टपूर्ण कर्तव्य है; इसमें किसी प्रकार का लाभ, हित या तर्कपूर्ण उद्देश्य निहित नहीं!—यह केवल बोझ है। लेकिन अगर वुज़ू की सारी हिकमतें (कारण और उद्देश्य) न भी समझे जाएँ, तब भी यही बहुत बड़ी बात है कि यह मुसलमानों की पहचान है। क़ियामत के दिन उनके चेहरे और अंग वुज़ू के कारण उजले और चमकदार होंगे — और यह सम्मान किसी और समुदाय को नहीं मिलेगा। अगर वुज़ू में केवल यही लाभ होता कि एक व्यक्ति अपने हाथों को पानी से और अपने दिल को तौबा से शुद्ध करता है — ताकि वह अपने रब के सम्मुख उपस्थित होने, उससे संवाद और प्रार्थना करने के लिए तैयार हो — शरीर, वस्त्र और हृदय, तीनों की पवित्रावस्था में — तो बताओ! इससे बढ़कर कौन‑सी हिकमत, कौन‑सी दया और कौन‑सा लाभ हो सकता है?
चूँकि वासना पूरे शरीर में प्रवाहित होती है, यहाँ तक कि हर बाल के नीचे भी वासना का प्रभाव पाया जाता है, इसलिए जनाबत का ग़ुस्ल भी पूरे शरीर पर अनिवार्य किया गया, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “निश्चय ही प्रत्येक बाल के नीचे जनाबत (अपवित्रता) होती है।" [अस-सुनन के लेखकों ने इसे रिवायत किया है, हालांकि हदीस की प्रामाणिकता में कुछ कमी पाई जाती है।] इसलिए यह आदेश दिया गया कि पानी को हर बाल की जड़ तक पहुँचाया जाए, ताकि वासना की गर्मी ठंडी हो जाए, मन शांत हो जाए और वह अल्लाह के स्मरण, उसके कलाम की तिलावत और उसके सामने खड़े होने के योग्य बन जाए।” (शिफ़ा-उल-अलील, पृ. 229-230)
तथापि जो व्यक्ति शरीअत के नियमों पर विचार करता है, उस पर उनकी हिकमतें स्पष्ट हो जाती हैं; और जिसकी अंतर्दृष्टि पर परदा डाल दिया गया हो, वह न देखने से लाभ उठाता है, न सुनने से। यह भी जान लेना चाहिए कि पवित्रता अच्छे आचरणों में से है जिसपर इस्लाम से पहले की शरीअतों में भी मतभेद नहीं रहा। कोई भी रसूल अपनी क़ौम के पास ऐसा संदेश नहीं लाता जिसमें - सबसे पहले - दिल को मूर्तिपूजा की मैल से शुद्ध करने का आह्वान न हो, फिर अच्छे कथनों, कर्मों, आचरणों, कपड़ों और शरीर की सफ़ाई, ग़ुस्ल, पवित्रता और गंदगी-नापाकी दूर करने की शिक्षा न हो — ये बातें सभी दिव्य शरीअतों में समान रही हैं। जो व्यक्ति इस बात में विवाद करता है, वह केवल असत्य के सहारे विवाद करता है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।