बुधवार 13 रबीउलअव्वल 1440 - 21 नवंबर 2018
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रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा में निरंतरता अनिवार्य नहीं है

प्रश्न

मैं ने बीमारी की वजह से रमज़ान के पाँच दिनों के रोज़े नहीं रखे। तो क्या मेरे लिए अनिवार्य है कि मैं उन्हें लगातार रखूँ, या संभव है कि मैं प्रत्येक सप्ताह एक दिन रोज़ा रखूँॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा औऱ गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इमामों की इस बात पर सर्व सहमति है कि रमज़ान के छूटे हुए रोज़ों के विषय में अनिवार्य यह है कि वह उतने दिनों की संख्या में रोज़ा रखे जितने दिनों का रोज़ा उसने तोड़ दिया था। क्योंकि अल्लाह तआला का कथन हैः

وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَر   [البقرة : 185]

“और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे।” (सूरतुल बक़राः 185)

और इन दिनों के लिए लगातार होना शर्त नहीं है। आपको अधिकार है कि आप उन्हें लगातार रखें, तथा आपको यह भी अधिकार है कि आप उन्हें अलग-अलग रखें, चाहे आप हर हफ्ते एक दिन रोज़ा रखें, या हर महीने एक दिन रखें या जैसा आपके लिए सुलभ हो। इसका प्रमाण (सबूत) पिछली आयत है। क्योंकि उसमें रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा के लिए निरंतरता की शर्त नहीं लगाई गई है। उसमें केवल इस बात को अनिवार्य किया गया है कि वह उन दिनों की संख्या में हो जिनके रोज़े उसने नहीं रखे थे।

देखिएः ''अल-मजमूअ'' (6/167), अल-मुग़्नी (4/408).

इफ्ता की स्थायी समिति से प्रश्न किया गया कि क्या रमजान की क़जा के रोज़े विविध दिनों में रखना अनुमेय (जायज़) हैॽ

तो उसने उत्तर दिया : हाँ, उसके लिए अपने ऊपर अनिवार्य रोज़े विविध दिनों में क़ज़ा करना जायज़ है, क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान हैः

وَمَنْ كَانَ مَرِيضاً أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَر   [البقرة : 185]

“और जो बीमार हो या यात्रा पर हो तो वह दूसरे दिनों में उसकी गिन्ती पूरी करे।” (सूरतुल बक़राः 185)

यहाँ अल्लाह सर्वशक्तिमान ने क़ज़ा में निरंतरता की शर्त नहीं लगाई है। सामप्त हुआ।

फतावा स्थायी समिति (10/346)।

तथा शैख इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह के फतावा (15/352) में है कि : ‘‘यदि उसने दो दिन या तीन दिन या उससे अधिक रोज़ा तोड़ दिया, तो उसके ऊपर क़ज़ा करना अनिवार्य है और उसके लिए निरंतर और लगातार क़ज़ा करना आवश्यक नहीं है। यदि उसने निरंतर क़ज़ा किया तो यह बेहतर है, लेकिन अगर उसने निरंतर क़ज़ा नहीं किया तो उसपर कोई आपत्ति नहीं है।’’ समाप्त हुआ।

और अल्लाह ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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