रविवार 10 रबीउलअव्वल 1440 - 18 नवंबर 2018
Hindi

तवाफ़ की शर्तें और वाजिबात

प्रश्न

तवाफ़ की शर्तें और वाजिबात क्या हैं?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

विद्वानों ने काबा के चारों ओर तवाफ़ करने के सही होने के लिए कई शर्तों का उल्लेख किया है और वे यह हैं :

1. (इस्लाम) : अर्थात मुसलमान होना, इस शर्त पर विद्वानों की आम सहमति है। अतः काफ़िर (नास्तिक) का तवाफ़ सही (मान्य) नहीं है। क्योंकि तवाफ़ एक इबादत है, और काफ़िर की इबादत न तो सही (मान्य) होती है और न स्वीकार की जाती है।

2. (बुद्धि); यह हनफिय्या और हनाबिला का मत है, जबकि मालिकिय्या और शाफ़ेइय्या ने इसकी शर्त नहीं लगाई है, उन्होंने इसको अविवेक बच्चे के तवाफ़ के सही होने पर क़ियास किया है अगर उसका अभिभावक (सरपरस्त) उसकी ओर से तवाफ़ की नीयत करता है।

3. (नीयत); इस शर्त पर विद्वानों की सर्वसहमति है, क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः ‘‘कार्यों का आधार नीयतों (इरादों) पर है, और प्रत्येक व्यक्ति के लिए वही कुछ है जिसकी उसने नीयत की है।’’ इसे बुखारी (हदीस संख्याः 1) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 1907) ने रिवायत किय़ा है।

4. (गुप्तांग को ढांपना): यदि वह नग्न अवस्था में तवाफ़ करे तो उसका तवाफ़ सही (मान्य) नहीं होगा, क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात का आदेश दिया था कि हज्ज में यह घोषणा कर दिया जाए किः (इस साल [अर्थात वर्ष 9 हिज्री] के बाद कोई मुशरिक (अनेकेश्वरवादी) हज्ज न करे, और कोई नग्न (निर्वस्त्र व्यक्ति) अल्लाह के घर – काबा - का तवाफ़ न करे।) इसे बुखारी (हदीस संख्याः 369) और मुस्लिम (हदीस संख्याः 1347) ने रिवायत किया है।

शैख इब्ने उसैमीन कहते हैं : "यदि उसने नग्न अवस्था में तवाफ़ किया है तो उसका तवाफ़ सही नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसा तवाफ़ है जिससे मना किया गया है। और जब उससे मना किया गया है, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन हैः (जिसने कोई ऐसा कार्य किया जिस पर हमारा आदेश नहीं है तो वह अस्वीकृत है।)" "अश्शर्हुल मुम्ते" (7/257) से संपन्न हुआ।

5. (अशुद्धता से पवित्र होना) : इस शर्त पर विस्तार से चर्चा प्रश्न संख्याः (34695) के जवाब में बीत चुका है।

6. (विद्वानों की बहुमत के निकट अशुद्धता से शरीर और पोशाक की शुद्धता) : इस मुद्दे में जो कुछ मतभेद है उसका उल्लेख प्रश्न संख्याः (136742) के जवाब में बीत चुका है।

7. (पूर्ण रूप से सात चक्कर लगाए), यदि सात चक्करों में से एक कदम भी कम हो गया तो उसका तवाफ़ परिपूर्ण नहीं होगा।

इमाम नववी कहते हैं : "तवाफ़ की शर्त यह है कि वह सात चक्कर हो, हर बार हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) से हज्रे-अस्वद (काले पत्थर) तक हो, यदि सात चक्करों में से एक क़दम भी कम हो गया तो उसके तवाफ़ की गणना नहीं होगी, चाहे वह मक्का में बाक़ी रहे या वहाँ से वापस लौट कर अपने घर चला आए, और उसमें से कुछ भी दम देने से या उसके अलावा किसी और चीज़ से पूरा नहीं होगा।’’ ‘‘अल-मजमूअ’’ (8/21) से समाप्त हुआ।

8. (काबा को अपने बाएं रखे) : क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने काबा को अपनी बाईं तरफ करके तवाफ़ किया, और आपका फरमान है : (तुम अपने हज्ज के अनुष्ठान मुझसे सीख लो।) इसे मुस्लिम (हदीस संख्याः 1297) ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की दहीस से रिवायत किया है।

9. (तवाफ़ पूरे घर का होना चाहिए), चुनाँचे वह दूरी कम करने के लिए हतीम के अंदर से तवाफ़ न करे, और जिसने ऐसा किया है उसका तवाफ़ सही नहीं है।

प्रश्न संख्याः (46597) का जवाब देखें।

10. (चलने की क्षमता है तो चलकर तवाफ़ करें): ज्यादातर विद्वानों का यही मत है, शाफेइय्या का मत इसके विपरीत है।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया:

"मेरे लिए जो बात स्पष्ट होती है वह यह है कि तवाफ़ में सवारी करने की अनुमति नहीं है, चाहे वह ऊँट पर हो या कंधों पर या व्हील चेयर में, जब तक कि कोई आवश्यकता न हो, आवश्यकता : जैसे मनुष्य का बीमार होना, उसका वयोवृद्ध होना और असहनीय सख्त भीड़-भाड़ होना, क्योंकि कुछ लोग भीड़ को सहन कर लेते हैं और कुछ लोग उसे सहन नहीं कर सकते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण यह है कि यदि वह किसी उज़्र की वजह से है तो कोई आपत्ति की बात नहीं है। और यदि वह किसी उज़्र की वजह से नहीं है तो यह जायज़ नहीं है।’’

"सही बुखारी से किताबुल-हज्ज की शर्ह’’ (11/83) (मक्तबा शामिला की नंबरिंग के अनुसार) समाप्त हुआ।

11. (चक्करों के बीच निरंतरता): इसके बारे में विस्तार से वर्णन प्रश्न संख्या: (219227) के उत्तर में बीत चुका है।

12. (तवाफ़ मस्जिदे हराम के अंदर होना चाहिए): क्योंकि मुसलमान पर अनिवार्य यह है कि वह अल्लाह के घर काबा का तवाफ़ करे, यदि उसने मस्जिद के बाहर तवाफ़ किया तो उसने मस्जिद का तवाफ़ किया काबा का तवाफ़ नहीं किया।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह ने फरमाया:

"विद्वानों ने कहा है किः तवाफ़ के सही होने के लिए शर्त है कि वह मस्जिदे हराम के अंदर हो, और यह कि अगर उसने मस्जिद के बाहर तवाफ़ किया है तो उसके लिए काफ़ी नहीं है; यदि - उदाहरण के लिए - आदमी मस्जिदे हराम के चारों ओर बाहर से तवाफ़ करना चाहे तो यह काफ़ी नहीं होगा। क्योंकि उस समय वह मस्जिद का तवाफ़ करनेवाला होगा, काबा का तवाफ़ करनेवाला नहीं होगा। परंतु जो लोग मस्जिद ही में तवाफ़ करते हैं, चाहे वह ऊपर हो या नीचे, तो इन लोगों के लिए तवाफ़ पर्याप्त है। इस आधार पर मस्आ या उसके ऊपर तवाफ़ करने से सावधान रहना चाहिए; क्योंकि मस्आ मस्जिद का भाग नहीं है।‘’’

‘‘तफ़्सीर सूरतुल फातिहा’’ (2/49) से संपन्न हुआ।

13- (तवाफ़ का आरंभ हज्रे अस्वद से करे) यदि उसने काबा के द्वार से शुरू किया है तो उसका तवाफ अपूर्ण है, मान्य नहीं है।

शैख इब्ने उसैमीन फरमाते हैं : "कुछ लोग काबा के द्वार के पास से तवाफ़ शुरू करते हैं, हज्रे अस्वद से नहीं करते हैं, और जो व्यक्ति काबा के द्वार के पास से शुरू करता है और इसी आधार पर अपने तवाफ़ को पूरा करता है, तो वह तवाफ को पूरा करनेवाला नहीं समझा जाएगा, क्योंकि अल्लाह तआला का कथन हैः

( وليطوفوا بالبيت العتيق ) [سورة الحج :29].

‘‘और वे अल्लाह के प्राचीन घर का तवाफ़ करें।’’ (सूरतुल हज्जः 29)

तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्रे अस्वद से शुरू किया, और लोगों से फरमायाः

‘‘तुम मुझसे अपने हज्ज के अनुष्ठान सीख लो।’’ अगर उसने दरवाज़े के पास से शुरू किया है, या हज्रे अस्वद के बराबर हुए बिना शुरू किया है चाहे थोड़ा ही सही, तो उसका यह चक्कर बातिल और शून्य हो जाएगा, क्योंकि उसने पूरा नहीं किया है। उसके ऊपर अनिवार्य है कि वह उसके बदले एक चक्कर और लगाए, यदि उसे निकट ही याद आ जाता है। अन्यथा वह शुरू से तवाफ़ को लौटाएगा।’’ "मजमूउल फतावा’’ (22/404)। से समाप्त हुआ।

ये तवाफ़ की शर्तें हैं जिनके बिना वह सही नहीं हो सकता।

रही बता तवाफ़ के वाजिबात की तो कुछ विद्वान तवाफ़ के बाद दो रकअत नमाज़ के वाजिब होने की ओर गए हैं, जबकि सही बात यह है कि वह एक मुस्तहब सुन्नत है, और यह इमाम शाफेई और अहमद का मत है।

शैख़ इब्ने बाज़ रहिमहुल्लाह ने तवाफ़ की दो रकअतों के बारे में फरमायाः "वह मक़ामे इब्राहीम के पीछे ही अनिवार्य नहीं है, दो रक्अतें हरम में किसी भी जगह पर्याप्त हैं, और जो आदमी उसे भूल गया है उसके लिए कोई आपत्ति की बात नहीं है, क्योंकि वह सुन्नत है, वाजिब नहीं है।

‘‘मजमूओ फतावा शैख इब्ने बाज़’’ (17/228) से समाप्त हुआ।

विद्वानों ने इसके आलावा जिन अन्य वाजिबात का उल्लेख किया है, तो वे कुछ उपर्युक्त शर्तें हैं, परंतु कुछ विद्वान उन्हें शर्त के बजाय वाजिबात क़रार देते हैं।

तथा ‘‘मजल्लतुल बुहूस अल-इस्लामिय्या’’ (इस्लामी रिसर्च पत्रिका) अंक (53) में डॉ. अब्दुल्लाह ज़ाहिम का "शुरूतुत्-तवाफ़" के शीर्षक से एक शोधकार्य देखिए तथा उसी पत्रिका संख्या (58) में उन्हीं का एक अन्य शोधकार्य ‘‘वाजिबातुत्-तवाफ़’’ के शीर्षक से देखिए।

स्रोत: साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

प्रतिक्रिया भेजें