नज़्र (मन्नत) के प्रकार और उनके अहकाम का सारांश

प्रश्न 2587

इस्लामी शरीअत में नज़्र (मन्नत) का क्या हुक्म है?

उत्तर का सारांश

  • नज़्र (मन्नत) यह है कि कोई मुकल्लफ़ (शरई नियमों की बाध्यता के योग्य व्यक्ति) अपने ऊपर किसी ऐसे काम को अनिवार्य कर ले जो पहले उस पर अनिवार्य नहीं था, चाहे वह तुरंत लागू हो या किसी शर्त के साथ जुड़ा हो।
  • शरीअत-सम्मत नज़्र को पूरा करना वाजिब (अनिवार्य) है, जिसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह कथन है :  ثم ليقضوا تفثهم وليوفوا نذورهم    “फिर वे अपना मैल-कुचैल दूर करें तथा अपनी मन्नतें पूरी करें।” (सूरतुल्-ह़ज्ज : 29)।
  • नज़्र के कई प्रकार हैं : 1- वह नज़्र जिसे पूरा करना वाजिब है और वह आज्ञाकारिता की नज़्र है। 2- वह नज़्र जिसे पूरा करना जायज़ नहीं है, बल्कि उसमें क़सम का कफ़्फ़ारा देना होता है और वह अवज्ञा की नज़्र है। हर वह नज़्र जो किसी नस (शरीअत के स्पष्ट प्रमाण) से टकराती हो। तथा वह नज़्र जिसका क़सम के कफ़्फ़ारा के अलावा कोई हुक्म नहीं। वह नज़्र जिसमें नज़्र मानने वाले को नज़्र पूरी करने या क़सम का कफ़्फ़ारा देने का विकल्प होता है।

उत्तर का पाठ

ऐ प्रश्न करने वाली बहन! आपके सामने नज़्र (मन्नत) के विषय में एक विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें इसके प्रकार और बुनियादी नियमों का वर्णन है, जिससे इन शा अल्लाह आपको और अन्य पाठकों को लाभ पहुँचेगा।

नज़्र क्या है?

असफ़हानी रहिमहुल्लाह ‘मुफ़रदात अल्फ़ाज़ अल-क़ुरआन’ (पृष्ठ 797) में कहते :

नज़्र यह है कि आप किसी घटना के घटित होने पर अपने ऊपर वह चीज़ अनिवार्य कर लें जो अनिवार्य नहीं है। अल्लाह तआला ने फरमाया :  إني نذرت للرحمن صوما  “मैंने रहमान के लिए रोज़े की मन्नत मानी है।” (सूरत मरयम : 26)।

अतः नज़्र यह है कि मुकल्लफ़ व्यक्ति अपने ऊपर किसी ऐसे काम को अनिवार्य कर ले जो पहले उस पर अनिवार्य नहीं था, चाहे वह तुरंत लागू हो या किसी शर्त के साथ जुड़ा हो।

क़ुरआन में नज़्र का उल्लेख प्रशंसा के संदर्भ में भी आया है। अल्लाह तआला ने अपने ईमान वाले बंदों के बारे में फरमाया :  إن الأبرار يشربون من كأس كان مزاجها كافورا۝ عينا يشرب بها عباد الله يفجرونها تفجيرا۝ يوفون بالنذر ويخافون يوما كان شره مستطيرا   “निश्चय सदाचारी लोग ऐसे जाम से पिएँगे, जिसमें कपूर का मिश्रण होगा। यह एक स्रोत होगा, जिससे अल्लाह के बंदे पिएँगे। वे उसे (जहाँ चाहेंगे) बहा ले जाएँगे। जो नज़्र (मन्नत) पूरी करते हैं और उस दिन से डरते हैं जिसकी आपदा चारों ओर फैली हुई होगी।” (सूरत दह्र : 5–7)

चुनाँचे अल्लाह तआला ने उनके क़ियामत के दिन की भयावहता से डरने और मन्नतों को पूरा करने को उनकी मुक्ति और जन्नत में प्रवेश का कारण बनाया है।

नज़्र का हुक्म

शरीअत-सम्मत नज़्र को पूरा करना वाजिब है। क्योंकि अल्लाह तआला का कथन है :  ثم ليقضوا تفثهم وليوفوا نذورهم   “फिर वे अपना मैल-कुचैल दूर करें, तथा अपनी मन्नतें पूरी करें।” (सूरतुल्-ह़ज्ज : 29)।

इमाम शौकानी कहते हैं : यह आदेश अनिवार्यता के लिए है।

नज़्र और उसकी नापसंदगी के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसें

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नज़्र से मना करने और उसकी नापसंदगी को स्पष्ट करने के बारे में कई हदीसें वर्णित हैं।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “मन्नतें न माना करो। क्योंकि मन्नत तक़दीर से कोई चीज़ नहीं बदलती, बल्कि इसके द्वारा कंजूस से (कुछ) निकलवाया जाता है।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 3096) ने रिवायत किया है।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें मन्नत मानने से मना करने लगे और फरमाने लगे : “यह किसी चीज़ को नहीं लौटाती, बल्कि इसके द्वारा कंजूस से निकलवाया जाता है।” (बुख़ारी और मुस्लिम)

प्रशंसित नज़्र और निषिद्ध नज़्र में अंतर

यदि कोई कहे कि यह कैसे हो सकता है कि एक तरफ़ मन्नत पूरी करने वालों की प्रशंसा की जाए और दूसरी तरफ मन्नत मानने से मना भी कर दिया जाए, तो इसका उत्तर यह है कि : प्रशंसित नज़्र वह है जो केवल अल्लाह की आज्ञाकारिता के लिए हो, उसमें कोई शर्त न हो जिससे इंसान खुद को बाध्य कर ले ताकि अपने आपको आज्ञाकारिता पर उभारे, या आलस्य और टालमटोल से बचे या अल्लाह की किसी नेमत के शुक्र के रूप में ऐसा करे।

जहाँ तक निषिद्ध नज़्र का संबंध है तो उसके कई प्रकार हैं, जिनमें से एक लेन-देन (बदले) वाली नज़्र है, जिसमें नज़्र मानने वाला आज्ञाकारिता (नेकी के काम) को किसी चीज़ के मिलने या किसी मुसीबत के टलने पर लंबित कर देता है, इस तरह कि अगर वह चीज़ हासिल न हो या वह मुसीबत दूर न हो, तो वह उस नेकी को न करे। और यही वह प्रकार है जो निषिद्ध है।

इसकी हिकमत निम्न कारणों में निहित है :

  • नज़्र मानने वाला नेकी के कार्य को बोझ समझकर करता है, क्योंकि वह अब उस पर अनिवार्य हो चुकी होती है।
  • जब नज़्र मानने वाला अपनी मनचाही चीज़ पाने की शर्त पर नेकी करने की नज़्र मानता है, तो उसकी नज़्र एक लेन-देन जैसी हो जाती है, जो नज़्र मानने वाले की नीयत को खराब कर देती है, क्योंकि अगर उसका बीमार ठीक नहीं हुआ, तो वह उस चीज़ का दान नहीं करेगा जिसे उसने उसके ठीक होने पर लंबित किया था। यही स्थिति एक कंजूस की होती है, जो अपनी दौलत में से तुरंत मुआवज़े के बिना कुछ नहीं देता, जो अक्सर उसके दिए हुए से ज़्यादा होता है।
  • कुछ लोगों का यह जाहिलाना विश्वास होता है कि मन्नत मानने से वह उद्देश्य अवश्य पूरा हो जाता है जिसके लिए मन्नत मांगी गई थी, या यह कि अल्लाह मन्नत मानने वाले का उसकी मन्नत की वजह से वह मकसद पूरा कर देता है।
  • कुछ अज्ञानी लोगों की एक अन्य मान्यता का खंडन, जो यह है कि मन्नत तक़दीर को बदल देती है, या यह उन्हें तुरंत लाभ पहुँचाती है और उनसे नुकसान को टाल देती है। इसलिए इससे मना किया गया क्योंकि डर था कि कोई अनजान व्यक्ति ऐसा मान लेगा, और यह चेतावनी देने के लिए कि ऐसा करने से आदमी के अक़ीदा की सलामती (मज़बूती) को खतरा हो सकता है।

नज़्र के प्रकार (उन्हें पूरा करने की अनिवार्यता की दृष्टि से)

  1. वह नज़्र जिसे पूरा करना वाजिब है (आज्ञाकारिता की नज़्र) : यह हर वह नज़्र है जो अल्लाह की आज्ञाकारिता और इबादत के काममें मानी गई हो, जैसे नमाज़, रोज़ा, हज्ज, उम्रा, सदक़ा, रिश्तेदारों से अच्छा व्यवहार, एतिकाफ़, जिहाद, नेकी का हुक्म देना और बुराई से रोकना। उदाहरण के तौर पर, नज़्र मानने वाला कहे : "मैं अल्लाह के लिए नज़्र मानता हूँ कि मैं इतने दिन रोज़ा रखूँगा" या "मैं इतना दान करूँगा" या "मैं अल्लाह के लिए मन्नत मानता हूँ कि मैं इस साल हज्ज करूँगा" या "मैं अपने बीमार के ठीक होने के लिए शुक्राने के तौर पर मस्जिदे-हराम में दो रकअत नमाज़ पढ़ूँगा।” या वह नज़्र शर्त के साथ हो, यानी अल्लाह के क़रीब होने के लिए कोई नज़्र माने जिसे वह किसी ऐसी बात से जोड़ दे जो उसके लिए फ़ायदेमंद हो; और जब वह चीज़ मिल जाए तो यह इबादत अंजाम दे। जैसे वह कहे : “अगर मेरा ग़ायब वापस आ जाए” या “अगर अल्लाह मुझे मेरे दुश्मन की बुराई से बचा ले”, तो “मैं इतने रोज़े रखूँगा।” या “इतना दान दूँगा।”

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “जिसने अल्लाह की आज्ञाकारिता की मन्नत मानी, वह उसकी आज्ञा का पालन करे; और जिसने उसकी अवज्ञा की मन्नत मानी, वह उसकी अवज्ञा न करे।” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 6202) ने रिवायत किया है।

यदि किसी व्यक्ति ने ऐसी नज़्र मानी हो जिसमें अल्लाह की आज्ञाकारिता हो, फिर बाद में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाएँ जो उसे उस नज़्र को पूरा करने में असमर्थ बना दें, जैसे उसने एक महीने के रोज़े रखने, या हज्ज या उम्रा करने की नज़र मानी हो, लेकिन उसे ऐसी बीमारी लग जाए जिसके कारणवश वह रोज़ा रखने, या हज्ज करने या उम्रा करने में सक्षम न रहे; या उसने सदक़ा करने की नज़्र मानी हो, फिर वह इतना निर्धन हो जाए कि नज़्र को पूरा करना उसके लिए संभव न रहे, तो ऐसी स्थिति में वह अपनी नज़्र का कफ़्फ़ारा अदा करेगा, और वह कफ़्फ़ारा क़सम का कफ़्फ़ारा है। जैसा कि इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्होंने कहा : “जिस व्यक्ति ने ऐसी नज़्र मानी जिसे वह पूरा करने की क्षमता नहीं रखता, तो उसका कफ़्फ़ारा क़सम का कफ़्फ़ारा है।” इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है और हाफ़िज़ इब्न हजर ने बुलूग़ुल मराम में कहा : इसकी इसनाद सहीह है, और हदीस के विद्वानों ने इसे मौकूफ़ (सहाबी का कथन) मानने को प्राथमिकता दी है।

शैखुल इस्लाम इब्न तैमिय्या ने "फ़तावा" (33/49) में कहा : "यदि कोई व्यक्ति अल्लाह के लिए किसी आज्ञाकारिता (इबादत) की नज़्र माने, तो उसे उस नज़्र को पूरा करना चाहिए। लेकिन यदि वह नज़्र पूरी न करे, तो अधिकांश सलफ़ के अनुसार उसे क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करना होगा।"

  1. वह नज़्र जिसे पूरा करना जायज़ नहीं और जिसमें क़सम का कफ़्फ़ारा देना होता है :

इस प्रकार के नज़्र में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • अवज्ञा की नज़्र : यह हर वह नज़्र है जिसमें अल्लाह के प्रति अवज्ञा का कोई कार्य शामिल हो—जैसे कि कुछ कब्रों या तीर्थस्थलों पर तेल, मोमबत्तियाँ या आर्थिक योगदान चढ़ाने की मन्नत मानना। या मज़ारों और शिर्क से जुड़े स्थलों की यात्रा करने की नज़्र मानना। यह कुछ पहलुओं से बुतों के लिए नज़्र मानने के समान है।

इसी प्रकार यदि कोई किसी गुनाह को करने की नज़र माने—जैसे ज़िना करना, शराब पीना, चोरी करना, यतीम का माल खाना, किसी का हक़ मारना, या रिश्तेदारी तोड़ना (जैसे किसी खास रिश्तेदार से संबंध न रखना या उसके घर न जाना, बिना किसी उचित शरई कारण के) — तो यह ये सब ऐसी नज़्रें हैं जिन्हें किसी भी हाल में पूरा करना जायज़ नहीं है। बल्कि ऐसे व्यक्ति पर अपनी नज़्र के लिए क़सम का कफ़्फ़ारा देना अनिवार्य है।

इस प्रकार के नज़्र को पूरा न करने की दलील आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करती हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “जिसने अल्लाह की आज्ञाकारिता की नज़्र मानी, तो उसे चाहिए कि वह अल्लाह की आज्ञा का पालन करे; और जिसने अल्लाह की अवज्ञा की नज़्र मानी, तो वह उसकी अवज्ञा न करे।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

तथा इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “गुनाह में किसी मन्नत को पूरा नहीं किया जाएगा।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 3099) ने रिवायत किया है।

  • हर वह नज़्र जो किसी स्पष्ट शरई प्रमाण के विरुद्ध हो : यदि कोई मुसलमान कोई नज़्र माने और बाद में उसे यह स्पष्ट हो जाए कि उसकी नज़्र किसी ऐसे सही और स्पष्ट शरई आदेश या निषेध के विपरीत है, तो उसके लिए उस नज़्र को पूरा करने से रुक जाना अनिवार्य है, और उसे उस नज़्र का कफ़्फ़ारा देना होगा और वह क़सम का कफ़्फ़ारा है।

इसका प्रमाण वह हदीस है जिसे इमाम बुख़ारी रहिमहुल्लाह ने ज़ियाद बिन जुबैर से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : “मैं इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के साथ था। एक व्यक्ति ने उनसे पूछा और कहा : मैंने नज़्र मानी है कि जब तक जीवित रहूँ, हर मंगलवार या बुधवार रोज़ा रखूँ, और आज का दिन ईदुल-अज़हा (यौमुन-नह्र) पड़ गया है।” तो इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने कहा:
“अल्लाह ने नज़्र को पूरा करने का आदेश दिया है और हमें यौमुन-नह्र को (क़ुर्बानी के दिन) रोज़ा रखने से मना किया गया है।” उस व्यक्ति ने फिर सवाल दोहराया, तो उन्होंने वही बात दोहराई, उससे अधिक कुछ नहीं कहा। (सहीह बुख़ारी : 6212)

इसी तरह इमाम अहमद ने भी ज़ियाद बिन जुबैर से रिवायत किया है कि एक व्यक्ति ने मिना में चलते हुए इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से पूछा और कहा : “मैंने नज़्र मानी है कि हर मंगलवार या बुधवार को रोज़ा रखूँ, और आज का दिन यौमुन-नह्र (क़ुर्बानी का दिन) है, तो आपकी क्या राय है?” उन्होंने कहा : “अल्लाह तआला ने नज़्र को पूरा करने का आदेश दिया है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें मना किया है — या उन्होंने कहा : हमें मना किया गया है — कि हम यौमुन-नह्र को रोज़ा रखें।” उस व्यक्ति ने समझा कि शायद उन्होंने बात नहीं सुनी। इसलिए उसने फिर कहा : “मैंने नज़्र मानी है कि हर मंगलवार या बुधवार को रोज़ा रखूँ, और आज का दिन यौमुन-नह्र (क़ुर्बानी का दिन) है, तो आपकी क्या राय है?” उन्होंने कहा : “अल्लाह तआला ने नज़्र को पूरा करने का आदेश दिया है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें मना किया है — या उन्होंने कहा : हमें मना किया गया है — कि हम यौमुन-नह्र को रोज़ा रखें।” वर्णनकर्ता कहते हैं : इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने वही उत्तर दोहराया और उससे अधिक कुछ नहीं कहा, यहाँ तक कि वे पहाड़ के सहारे बैठ गए।

हाफ़िज़ इब्न हजर रहिमहुल्लाह ने कहा : “इस पर सर्वसम्मति (इज्मा’) हो चुकी है कि ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा के दिन रोज़ा रखना न तो नफ़्ल के रूप में जायज़ है और न ही नज़्र के रूप में।”

  • वह नज़्र जिसका क़सम के कफ़्फ़ारा के अलावा कोई हुक्म नहीं होता :

कुछ नज़्र ऐसे होते हैं जिनमें नज़्र मानने वाले पर केवल क़सम का कफ़्फ़ारा ही अनिवार्य होता है। जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं :

- मुतलक़ नज़्र (निरपेक्ष नज़्र —यानी ऐसी नज़्र जिसमें किसी विशेष काम का नाम न लिया गया हो।) : यदि कोई मुसलमान नज़्र माने लेकिन जिस चीज़ की नज़्र मानी है उसे स्पष्ट न करे, बल्कि उसका नाम लिए या उसे निर्धारित किए बिना उसे यूँ ही छोड़ दे, जैसे वह कहे : “अगर अल्लाह ने मेरी बीमारी ठीक कर दी, तो मुझ पर नज़्र है।” और किसी इबादत या कार्य का नाम न ले, तो उसपर क़सम का कफ़्फ़ारा अनिवार्य होगा। उक़्बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “नज़्र का कफ़्फ़ारा क़सम का कफ़्फ़ारा है।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है

इमाम नववी रहिमहुल्लाह ने कहा : “इमाम मालिक और बहुत से विद्वानों — बल्कि अधिकांश विद्वानों — ने इस हदीस को मुतलक़ (निरपेक्ष) नज़्र पर लागू किया है, जैसे कोई कहे : मुझ पर नज़्र है। (या मैं नज़्र मानता हूँ)’” (शर्ह मुस्लिम, नववी : 11/104)

  • वह नज़्र जिसमें नज़्र मानने वाले को पूरा करने या क़सम का कफ़्फ़ारा देने का विकल्प होता है :

कुछ नज़्र ऐसे होते हैं जिनमें नज़्र मानने वाले को यह विकल्प दिया जाता है कि वह या तो अपनी नज़्र को पूरा करे या फिर उसकी ओर से कसम का कफ़्फ़ारा अदा कर दे। इस प्रकार के नज़्र में निम्नलिखित शामिल हैं :

  1. ज़िद और गुस्से की नज़्र: यह हर वह नज़्र है जो वास्तव में क़सम के अर्थ में कही जाती है—किसी काम को करने या उससे रुकने पर उकसाने के लिए, या किसी बात की पुष्टि करने या इंकार करने के लिए—जबकि कहने वाले का वास्तविक उद्देश्य न तो नज़्र मानना होता है और न ही अल्लाह की निकटता हासिल करना। जैसे कोई आदमी ग़ुस्से में कह दे : “अगर मैंने यह काम किया तो मुझ पर हज्ज (अनिवार्य) है।” या “मुझ पर एक महीने के रोज़े हैं।” या “मुझ पर एक हज़ार दीनार सदक़ा करना अनिवार्य है।” या वह कहे : “अगर मैंने फलाँ व्यक्ति से बात की, तो मेरा यह ग़ुलाम आज़ाद है।” या “मेरी पत्नी को तलाक़ है।” और फिर वह उस काम को कर बैठे, जबकि उसका असली मक़सद सिर्फ़ इस बात पर ज़ोर देना होता है कि वह ऐसा काम कदापि नहीं करेगा। हालाँकि असल में वह न तो शर्त को पूरा करना चाहता है और न ही परिणाम को लागू करना। इस प्रकार के नज़्र में - जिसकी स्थिति झगड़ा, हठधर्मी या किसी काम को करने या न करने पर ज़ोर देना हो - व्यक्ति को विकल्प दिया जाता है कि वह या तो अपनी नज़्र पूरी करे या फिर उसकी ओर से क़सम का कफ़्फ़ारा दे, क्योंकि असल में यह क़सम के ही हुक्म में होती है।

इब्न तैमिय्या रहिमहुल्लाह ने कहा :

“यदि नज़्र को क़सम के तौर पर किसी शर्त के साथ जोड़ा जाए—जैसे कोई कहे : ‘अगर मैं तुम्हारे साथ सफ़र करूँ तो मुझ पर हज्ज होगा’, या ‘मेरा माल सदक़ा होगा’, या ‘मुझ पर ग़ुलाम आज़ाद करना होगा’—तो सहाबा और विद्वानों की बहुमत के अनुसार यह नज़्र की कसम है, न कि वास्तविक नज़्र। यदि वह व्यक्ति अपने ऊपर ली हुई ज़िम्मेदारी को पूरा न करे, तो उसके लिए क़सम का कफ़्फ़ारा पर्याप्त होगा।”

तथा उन्होंने एक दूसरी जगह फरमाया :

“हमारे नज़दीक ‘नज़रे‑लजाज व ग़ज़ब’ (ज़िद या ग़ुस्से में मानी गई नज़्र) का परिणाम मशहूर मत के अनुसार दो में से एक है : या तो कफ़्फ़ारा दिया जाए, या शर्त से जुड़े काम को किया जाए। यदि वह शर्त के साथ जुड़ी बाध्यता का पालन नहीं करता, तो कफ़्फ़ारा देना अनिवार्य हो जाता है।”

  1. नज़्रे-मुबाह (जायज़ कामों की नज़्र) : यह हर वह नज़्र है जो किसी जायज़ (मुबाह) काम से संबंधित हो—जैसे किसी विशेष कपड़े को पहनने की नज़्र मानना, या किसी खास भोजन को खाने की, या किसी निश्चित जानवर पर सवारी करने की, या किसी निर्धारित घर में प्रवेश करने की नज़्र मानना, आदि।

साबित बिन ज़ह्हाक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : सूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में एक व्यक्ति ने बुवाना नामक स्थान पर ऊँट ज़बह करने की नज़्र मानी — एक रिवायत में है कि इसलिए कि उसके यहाँ बेटा पैदा हुआ था। तो वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  के पास आया और कहा : “मैंने बुवाना में ऊँट ज़बह करने की नज़्र मानी है।”
तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क्या वहाँ जाहिलियत के ज़माने का कोई बुत था जिसकी पूजा की जाती थी?” लोगों ने कहा: “नहीं।” फिर आपने पूछा : “क्या वहाँ उनके त्योहारों में से कोई त्योहार मनाया जाता था?” उन्होंने कहा : “नहीं।”   तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तब अपनी नज़्र पूरी करो, क्योंकि अल्लाह की अवज्ञा में और उस चीज़ में जिसपर इंसान का अधिकार नहीं— नज़्र को पूरा करना जायज़ नहीं है।” इसे अबू दाऊद (हदीस : 2881) ने रिवायत किया है।

यह व्यक्ति बुवाना (यंबू के पीछे स्थित एक स्थान) में ऊँट ज़बह करने की नज़्र अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने के लिए मानी थी कि उसने उसे बेटा अता किया। इसलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे अपनी नज़्र पूरी करने और उसी स्थान पर ऊँट ज़बह करने की अनुमति दी।

हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह हमें उन्हीं कामों के करने की तौफ़ीक़ दे जिन्हें वह पसंद करता है और जिनसे वह राज़ी होता है। तथा अल्लाह हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद व सलाम अवतरित करे।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

संदर्भ

शपथ व प्रतिज्ञा और मन्नत

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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