इंटरनेट से सामान खरीदना और डिलीवरी के समय क़ीमत का भुगतान करना — जायज़ और नाजायज़ रूपों का विवरण

प्रश्न 273116

मेरा प्रश्न इंटरनेट के माध्यम से खरीदारी के बारे में है। यदि भुगतान डिलीवरी के समय किया जाए, या डिलीवरी से पहले बैंक ट्रांसफर द्वारा किया जाए, और सामान का वर्णन केवल विवरण या तस्वीर (छवि) के माध्यम से किया गया हो, या निम्न वस्तुओं में उसका विवरण न दिया गया हो, तो उसके संबंध में क्या हुक्म है? 1. ऐसा सामान जो सोना या चाँदी, या सोना चढ़ाया हुआ (गोल्ड-प्लेटेड) न हो। 2. सोना या चाँदी, या सोना चढ़ाया हुआ सामान, चाहे सोना चढ़ाई हुई चाँदी हो, या सोना चढ़ाया हुआ कोई अन्य धातु हो। 3. अंगूठियाँ, कंगन, घड़ियाँ और सामान्य आभूषण, यदि वे सोने या चाँदी से बने हों, या उनपर सोने का पानी चढ़ाया हुआ हो। 4. सोने के रंग के आभूषण और बर्तन जिन पर सोना न चढ़ाया हुआ हो। 5. इत्र (परफ्यूम) या ऐसी वस्तुएँ जिनका पूरा परिचय केवल विवरण या तस्वीर से नहीं हो सकता। हमें आशा है कि आप ऊपर बताई गई वस्तुओं के बारे में विस्तृत उत्तर देंगे, और अगर कोई व्यक्ति अज्ञानतावश या भूलवश अपने लिए या उपहार देने के लिए इनमें से कोई ऐसी चीज़ खरीद ली है जो जायज़ नहीं है, तो उसे क्या करना चाहिएॽ

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

सबसे पहले : 

जो वस्तुएँ नक़द मुद्रा से खरीदी जाती हैं, वे दो प्रकार की हैं :

1- जिसमें विनिमय की जाने वाली दोनों चीज़ों (क़ीमत और सामान) का मौजूद होना और दोनों का वास्तविक रूप से या हुक्मी (क़ानूनी) तौर पर विनिमय (आदान-प्रदान) होना अनुबंध की बैठक ही के दौरान आवश्यक (शर्त) है। इसमें सोना, चाँदी और मुद्राएँ (करेंसी) शामिल हैं।

वास्तविक क़ब्ज़ा (विनिमय) इस तरह प्राप्त होता है कि आप नक़द पैसे का भुगतान करें और उसी बैठक में सोना या मुद्रा प्राप्त कर लें।

हुक्मी क़ब्ज़ा (या क़ानूनी तौर पर क़ब्ज़ा) इस तरह प्राप्त होता है कि प्रमाणित चेक दिया जाए, या तुरंत खाते में राशि जमा कर दी जाए, साथ ही सोना उसी बैठक में प्राप्त कर लिया जाए।

इस आदान-प्रदान (विनिमय) की शर्त लगाने का मूल आधार वह हदीस है जिसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1587) ने उबादा बिन अस-सामित रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “सोने के बदले सोना, चाँदी के बदले चाँदी, गेहूँ के बदले गेहूँ, जौ के बदले जौ, खजूर के बदले खजूर और नमक के बदले नमक समान-समान, बराबर-बराबर और हाथों-हाथ बेचा जाए। लेकिन जब ये वस्तुएँ अलग-अलग प्रकार की हों, तो इन्हें जैसे चाहो बेचो, वशर्ते कि यह लेन-देन हाथों-हाथ हो।”

मुद्राओं (करेंसी) के भी वही नियम हैं, जो सोने और चाँदी के हैं।

इसके आधार पर :

सोना या चाँदी इंटरनेट के माध्यम से इस प्रकार खरीदना जायज़ नहीं कि आप उसे प्राप्त करने से पहले क़ीमत का भुगतान कर दें, या उसे प्राप्त करने के बाद क़ीमत का भुगतान करें। बल्कि दोनों चीज़ो का आदान-प्रदान एक ही बैठक में होना अनिवार्य है।

जिसपर सोना मढ़ा हुआ है, या जो सोने से लेपित है : उसपर सोने ही का हुक्म (नियम) लागू होगा यदि लेप ऐसा है कि उसे खुरचने या उसे आग पर रखने से उसमें से कुछ सोना अलग होकर जमा हो जाता है।

लेकिन यदि वह केवल (सुनहरा) रंग है जिससे कुछ भी (सोना) जमा नहीं होता, या वह नकली सोना है : तो वह सोने और चाँदी के नियम के अंतर्गत नहीं आएगा, बल्कि वह दूसरे प्रकार की वस्तुओ में शामिल होगा, जिसका उल्लेख नीचे आ रहा है।

नववी रहिमहुल्लाह ने कहा : "अगर अंगूठी चाँदी की है और उसपर सोना चढ़ा दिया गया है, या तलवार और अन्य युद्ध उपकरण या किसी दूसरी चीज़ पर सोना चढ़ा दिया गया है : तो अगर उसे आग में जलाने से उसमें से कुछ (सोना) निकलता है, तो यह विद्वानों की सर्वसम्मति से निषिद्ध है।" “अल-मजमू’” (4/441) से उद्धरण समाप्त हुआ।

2- जिसके बेचने के लिए (विनिमय की जाने वाली) दोनों चीज़ों (क़ीमत और सामान) की उपस्थिति शर्त नहीं है, बल्कि उनमें से किसी एक का मौजूद होना पर्याप्त है। यह नियम बाक़ी वस्तुओं पर लागू होता है, जैसे इत्र, कपड़े, वाहन और ज़मीनें : अतः यह जायज़ है कि सामान (भौतिक रूप से) मौजूद हो और क़ीमत की अदायगी एक समय बाद की जाए। इसे उधार बेचना कहते हैं।

इसी तरह यह भी जायज़ है कि कीमत का पूरा भुगतान पहले कर दिया जाए और सामान की डिलीवरी बाद में हो। इसे ‘सलम’ बिक्री (अग्रिम भुगतान) कहा जाता है। इसके लिए कुछ विशिष्ट शर्तें निर्धारित हैं, जिनमें से एक यह है कि सामान ऐसा होना चाहिए जिसका स्पष्ट विवरण दिया जा सके।

उनमें से एक शर्त यह है कि अनुबंध की बैठक ही में कीमत का पूरा भुगतान कर दिया जाए; इसका मतलब यह है कि : सामान खरीदने के लिए सहमत होने के समय ही पूरी कीमत अदा कर दी जाए। क़ीमत का भुगतान करने में डिलीवरी के समय तक देरी करना जायज़ नहीं है।

हमने (ऊपर) जो उल्लेख किया है उससे यह ज्ञात हो जाता है कि दोनों मुआवज़ों (सामान और क़ीमत) को विलंबित करना जायज़ नहीं है और इसे “बैउल-काली बिल-काली” (उधार के बदले उधार की बिक्री) कहा जाता है, (और यह जायज़ नहीं है)।

अतः उपर्युक्त वस्तुओं में से किसी को भी बेचना जायज़ नहीं है; यदि उसकी डिलीवरी अनुबंध की बैठक में नहीं की जाती है, और न ही विक्रेता को उसकी क़ीमत मिलती है।

इब्ने क़ुदामा रहिमहुल्लाह ने कहा : “बेची गई वस्तु प्राप्त करने, या उसकी कीमत प्राप्त करने से पहले अनुबंध की बैठक से अलग होना जायज़ नहीं है।”

यह इमाम अश-शाफेई रहिमहुल्लाह का दृष्टिकोण है; क्योंकि यह बिक्री ज़िम्मे में ("बय अज़-ज़िम्मा") है, इसलिए दोनों मुआवज़ों (यानी सामान और क़ीमत) में से किसी एक को प्राप्त करने से पहले अलग होना जायज़ नहीं है, जैसा कि ‘सलम बिक्री’ (अग्रिम भुगतान बिक्री) के मामले में होता है।" “अल-मुग़्नी” (3/497) से उद्धरण समाप्त हुआ।

इस लेनदेन को सही करने का तरीक़ा : यह है कि पहले विशिष्ट गुणों वाली एक वस्तु को बेचने के लिए एक समझौता किया जाए, और यह केवल एक वादा हो जो किसी भी पक्ष के लिए बाध्यकारी न हो। फिर जब वह वस्तु खरीदार के पास पहुँच जाए : तो उस समय, यदि खरीदार चाहे, तो अनुबंध संपन्न कर दे और वस्तु को स्वीकार कर ले।

हमने इससे पहले इंटरनेट के माध्यम से बिक्री के बारे में, और उसमें अग्रिम भुगतान से संबंधित, तथा (बेचने से पहले) वस्तु के मालिक होने की आवश्यक शर्त और इसी तरह के अन्य मामलों के बारे में कई सवालों के जवाब दिए हैं। अतः प्रश्न संख्या : (217314), (243151), (259320) और (169750) के उत्तर देखें।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

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