नौकरियों और व्यवसायों के संबंध में मूल सिद्धांत यह है कि वे जायज़ हैं, और कोई भी कार्य तब तक गुनाह नहीं माना जाता, जब तक कि उसके हराम (निषिद्ध) होने पर स्पष्ट प्रमाण न हो।
शैख़ुल-इस्लाम इब्ने तैमिय्यह रहिमहुल्लाह कहते हैं:
“बंदों के कथन और कर्म दो प्रकार के होते हैं:
(1) इबादतें (उपासना के कार्य) – जिनसे उनका धर्म दुरुस्त होता है।
(2) आदतें - जिनकी उन्हें अपने सांसारिक मामलों में आवश्यकता होती है।
शरीअत के मूल सिद्धांतों का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट होती है कि : अल्लाह ने जिन इबादतों को अनिवार्य ठहराया है या जिन्हें उसने पसंद किया है, उन्हें केवल शरीअत के द्वारा ही सिद्ध (स्थापित) किया जा सकता है...
जहाँ तक आदतों यानी आम सांसारिक मामलों का संबंध है, तो उनके बारे में मूल सिद्धांत क्षमा (निषेध का न होना) है। अतः उनमें से कोई भी चीज़ निषिद्ध नहीं है, जब तक कोई चीज़ साफ़ तौर पर हराम न कर दी जाए। अन्यथा हम अल्लाह के इस कथन के अर्थ के अंतर्गत आ जाएँगे :
قُلْ أَرَأَيْتُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ لَكُمْ مِنْ رِزْقٍ فَجَعَلْتُمْ مِنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًا
“(ऐ नबी!) कह दें : क्या तुमने देखा जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए रोज़ी उतारी है, फिर तुमने उसमें से कुछ को हराम और कुछ को हलाल ठहरा लिया?” (यूनुस : 59)
इसी कारण अल्लाह ने उन मुशरिकों (बहुईश्वरवादियों) की निंदा की जिन्होंने धर्म में वे नियम बना डाले जिनकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी थी, और उन चीज़ों को हराम घोषित कर दिया जिन्हें अल्लाह ने हराम नहीं किया था...
यह एक महान और अत्यंत लाभदायक सिद्धांत है।” (मजमूउल-फ़तावा, 29/16–18)
आपने अपने दिल में जो "ज़िल्लत" (अपमान) के एहसास को लेकर शंका जताई है, वह दरअसल एक ऐसी भावना है जो लोगों के बीच आम तौर पर होने वाले चार मामलों से भ्रमित होती है:
पहला : विनम्रता (तवाज़ो)
विनम्रता आम तौर पर मुसलमानों के लिए जायज़ है और इस्लामी शरीअत इसे प्रोत्साहित करती है। अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया :
يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَنْ يَرْتَدَّ مِنْكُمْ عَنْ دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ذَلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
المائدة /54
“ऐ ईमान वालो! तुममें से जो कोई अपने धर्म से फिर जाए, तो अल्लाह निकट ही ऐसे लोग लाएगा, जिनसे वह प्रेम करेगा और वे उससे प्रेम करेंगे। वे ईमान वालों के प्रति बहुत विनम्र तथा काफ़िरों के प्रति बहुत कठोर होंगे, अल्लाह की राह में जिहाद करेंगे और किसी निंदा करने वाले की निंदा से नहीं डरेंगे। यह अल्लाह का अनुग्रह है, वह उसे देता है जिसको चाहता है और अल्लाह विस्तार वाला, सब कुछ जानने वाला है।” (सूरतुल-मायदा : 54)
नरमी और विनम्रता का अर्थ है : दूसरों के साथ दया और सहजता से पेश आना, और किसी को नीचा समझने या घमंड करने से बचना। जैसा कि एक अन्य आयत इसकी व्याख्या करता है, अल्लाह तआला फ़रमाता है:
مُحَمَّدٌ رَسُولُ اللَّهِ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ
“मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और वे लोग जो उनके साथ हैं, काफ़िरों पर बहुत सख़्त हैं, आपस में बहुत दयालु हैं।” (सूरतुल-फत्ह : 29)
तथा अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “क्या मैं तुम्हें उस आदमी के बारे में न बताऊँ, जिसे जहन्नम पर हराम कर दिया जाएगा या कहा कि जिसपर जहन्नम हराम कर दी जाएगी? हर वह व्यक्ति जो लोगों के करीब रहने वाला, आसानी व नरमी करने वाला और सहज एवं सरल-स्वभाव है उसपर जहन्नम को हराम कर दिया जाएगा।” इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 2488) ने रिवायत किया है और कहा है कि यह हदीस “हसन ग़रीब” है, तथा अल्बानी ने इसे “सिलसिला सहीहा” (2/611) में इसके शवाहिद के आधार पर सहीह कहा है।
दूसरा : भय (डर)
कर्मचारी का अपने बॉस से यह डरना कि कहीं वह उसे नौकरी से न निकाल दे या उसके वेतन में कटौती न कर दे, तो यह लोगों से उस चीज़ में डरने के अंतर्गत आता है जिसमें अल्लाह ने सामान्यतः उन्हें सक्षम बनाया है। इस प्रकार का डर न तो हराम है और न ही गुनाह, लेकिन यह अल्लाह पर पूर्ण भरोसे (तवक्कुल) के स्तर से कम अवश्य है।
तीसरा : हया (लज्जा):
लोगों के साथ व्यवहार में हया और लज्जा का भाव, ईमान का हिस्सा है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक अंसारी व्यक्ति के पास से गुज़रे जो अपने भाई को हया के बारे में समझा रहा था। तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “उसे छोड़ दो, क्योंकि हया ईमान का हिस्सा है।”
इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 24) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 36) ने रिवायत किया है।
इमाम नववी रहिमहुल्लाह कहते हैं :
हदीस के शब्द : “अपने भाई को हया के बारे में नसीहत दे रहा था” का मतलब यह है कि वह व्यक्ति उसे हया करने से मना कर रहा था, उसके हया करने की निंदा कर रहा था और उसे अत्यधिक हया करने से रोक रहा था। इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे ऐसा करने से मना किया और फ़रमाया: 'उसे छोड़ दो, हया तो ईमान का हिस्सा है।' यानी, उसे हया करने के स्वभाव पर रहने दो और उसे हया से रोकना बंद करो।” (शर्ह सहीह मुस्लिम, 2/6)
चौथा: आज्ञापालन :
अपने बॉस की उन कामों में आज्ञा मानना, जिनपर अनुबंध हुआ है; एक आवश्यक और अनिवार्य कर्तव्य है। अल्लाह तआ़ला का फ़रमान है : (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ ) “ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! प्रतिज्ञाओं (अनुबंधों) को पूरा करो।” (सूरतुल-मायदा : 1)
जहाँ तक उन कार्यों में आज्ञापलन की बात है जो आपके और बॉस के बीच हुए अनुबंध में शामिल नहीं हैं, लेकिन वे व्यवसाय के सर्वोत्तम हित में हैं — तो यदि यह आज्ञापालन छोटे-मोटे पहलुओं में हो जिनसे कर्मचारी को कोई नुकसान न हो, तो यह अनुशंसित है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह उस व्यक्ति पर दया करे, जो बेचते समय, खरीदते समय और क़र्ज का तकाज़ा करते समय नरमी से पेश आता है।” (सहीह बुख़ारी : 2076)
हाफ़िज़ इब्ने हजर रहिमहुल्लाह कहते हैं :
“इस हदीस में लेन-देन में नरमी बरतने, अच्छे आचरण अपनाने, और झगड़े से बचने की प्रेरणा दी गई है।” (फत्हुल बारी, 4/307)
निष्कर्ष यह है कि : यदि कोई मुसलमान अपने बॉस या अन्य लोगों के साथ इस तरह व्यवहार करता है, तो वह या तो (किसी प्रकार के पाप से) सुरक्षित है, या उसे अज्र (पुण्य) प्राप्त होगा।
लेकिन शर्त यह है कि : ये अच्छे आचरण इस बात का कारण न बनें कि वह किसी हराम चीज़ पर चुप्पी साध ले, उसे स्वीकार करे, उसका समर्थन करे, या स्वयं उसे करे।
अल्लाह तआ़ला फ़रमाता है :
وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
“तथा नेकी और परहेज़गारी पर एक-दूसरे का सहयोग करो और पाप तथा अत्याचार पर एक-दूसरे की सहायता न करो। और अल्लाह से डरो। निःसंदेह अल्लाह कड़ी यातना देने वाला है।” (सूरतुल-मायदा : 2)
इसलिए यह बात हमेशा ध्यान में रहनी चाहिए कि हराम चीज़ों के मामले में विनम्रता, हया और आज्ञापालन जैसे गुणों का स्थान नहीं है।
अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी की भी आज्ञा का पालन नहीं है। आज्ञापालन केवल उन्हीं चीज़ों में है जो सही और वैध हों।”
(सहीह बुखारी : 7257; सहीह मुस्लिम : 1840)
इमाम अहमद ने इसे मुसनद (2/318) में इन शब्दों के साथ रिवायत किया है :
“अल्लाह की अवज्ञा में किसी भी इंसान का आज्ञापालन नहीं है।”
इसलिए, केवल बॉस का डर किसी भी हराम काम को करने का बहाना नहीं बन सकता। बल्कि ऐसी स्थिति में कर्तव्य यह है कि व्यक्ति अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार बुराई को रोके और उसका इनकार करे; जैसा कि पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “तुम में से जो व्यक्ति किसी बुराई को देखे, तो उसे अपने हाथ से बदल दे, यदि ऐसा न कर सके तो अपनी ज़ुबान से, और यदि यह भी न कर सके तो अपने दिल में (उसे बुरा समझे), और यह (दिल से बुरा समझना) ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जा है।” (सहीह मुस्लिम : 49)
साथ ही इंसान को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन व्यवहारों — विनम्रता, भय, लज्जा और आज्ञापालन — को खुद को अपमानित होने देने के साथ न मिलाए। क्योंकि किसी मोमिन के लिए यह शोभा नहीं देता कि वह खुद को अपमानित करे।
इब्राहीम अन्-नखई रहिमहुल्लाह कहते हैं :
“सलफ़ (पूर्वज) अपमानित होना पसंद नहीं करते थे, लेकिन जब वे सक्षम होते थे, तो माफ़ कर देते थे।" (इसे इमाम बुख़ारी ने सहीह बुख़ारी में मुअल्लक़ रूप में बयान किया है। देखें: फत्हुल बारी, 5/99)
सारांश :
यदि आप कोई वैध (हलाल) कार्य कर रहे हैं, और किसी भी गुनाह में न सहायता कर रहे हैं, न उसे उचित ठहरा रहे हैं, और न ही स्वयं को अपमानित कर रहे हैं — तो आपके काम में कोई बुराई नहीं है।
तथा आपको जो यह महसूस होता है कि आप बॉस के सामने झुकते हैं या अधीनता महसूस करते हैं, तो यह शैतान की ओर से वहम और वसवसा (भटकाने वाला विचार) हो सकता है, जो आपको उस चीज़ से रोकना चाहता है जो आपके लिए लाभकारी है।
इसका उपाय यह है कि आप अल्लाह से मदद मांगें और उन वैध कामों पर ध्यान दें जो आपके लिए लाभकारी हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ““शक्तिशाली मोमिन, कमज़ोर मोमिन की तुलना में अल्लाह के निकट अधिक प्रिय और श्रेष्ठ है, हालाँकि दोनों में भलाई है। जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसके लिए प्रयास करो, अल्लाह से सहायता माँगो और हिम्मत मत हारो।" इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2664) ने रिवायत किया है।
यदि आपकी समस्या अत्यधिक शर्मीलेपन से संबंधित है, तो हम आपको शैख़ मुहम्मद इस्माईल अल-मुक़द्दम की पुस्तक "फ़िक़्हुल-हया" पढ़ने की सलाह देते हैं।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।