इस्लामी जीवन सबसे उत्तम जीवन है और उस पर स्थिर रहने के साधन

प्रश्न 12804

इस्लामी जीवन सबसे उत्तम जीवन है जिसे कोई इनसान जी सकता है, लेकिन कभी-कभी यह बहुत कठिन लगने लगता है और मुझे ऐसा महसूस होता है कि इसे आगे जारी रखने की कोई आशा नहीं है।

उत्तर का सारांश

इस्लामी जीवन वास्तव में सबसे श्रेष्ठ जीवन है जिसे इनसान जी सकता है। लेकिन इस जीवन में धैर्य और सहनशीलता की ज़रूरत होती है। धर्म को मज़बूती से थामे रहना आसान काम नहीं है; बल्कि, यह उस व्यक्ति की स्थिति के समान है जो जलते अंगारों को पकड़े हुए हो। अल्लाह की तौफ़ीक़ के बाद इस पर जमें रहने में सहायक चीज़ इस रास्ते पर धैर्य रखना है, यहाँ तक कि बंदा अपने रब से इस हाल में मिले कि न उसने कोई कोताही की हो और न ही बदलाव किया हो। तथा आप अपने दिल में निराशा को प्रवेश न करने दें, और इस उम्मत को विजय और प्रभुत्व प्रदान करने के अल्लाह के वादे पर पूरा भरोसा रखें।

उत्तर का पाठ

क़ुरआन में इस्लामी जीवन का वर्णन

ऐ प्रश्नकर्ता भाई! - अल्लाह आपको बरकत प्रदान करे - आपने बहुत अच्छा किया जब आपने यह निर्णय किया कि इस्लामी जीवन वह सबसे उत्तम जीवन है जिसे कोई इनसान जी सकता है। क्योंकि यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है, जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं, उससे संतुष्ट होना तो बहुत दूर की बात है। अल्लाह तआला ने अपनी किताब (क़ुरआन) में कई स्थानों पर इसे स्पष्ट किया है।

अल्लाह तआला ने फ़रमाया : مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِنْ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُمْ بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ  “जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगे। और निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे।” (सूरत अन-नह्ल : 97)

तथा अल्लाह तआला ने यह भी स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान लाने और उसके स्मरण से मुँह मोड़ लेता है, वह अपने आप को तंगी और बदहाली भरे जीवन के हवाले कर देता है। जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है : وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى * قَالَ رَبِّ لِمَ حَشَرْتَنِي أَعْمَى وَقَدْ كُنْتُ بَصِيرًا* قَالَ كَذَلِكَ أَتَتْكَ آيَاتُنَا فَنَسِيتَهَا وَكَذَلِكَ الْيَوْمَ تُنْسَى* وَكَذَلِكَ نَجْزِي مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِنْ بِآيَاتِ رَبِّهِ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَى  “तथा जिसने मेरी नसीहत से मुँह फेरा, तो निःसंदेह उसके लिए तंग जीवन है और हम उसे क़ियामत के दिन अंधा करके उठाएँगे। वह कहेगा : ऐ मेरे पालनहार! तूने मुझे अंधा करके क्यों उठाया? हालाँकि, मैं तो देखने वाला था। (अल्लाह) फरमाएगा : इसी प्रकार तेरे पास हमारी आयतें आईं, तो तू उन्हें भूल गया और इसी प्रकार आज तू भुलाया जाएगा। तथा इसी प्रकार हम उस व्यक्ति को बदला देते हैं, जो हद से बढ़ जाए और अपने पालनहार की आयतों पर ईमान न लाए और निश्चय आख़िरत की यातना अधिक कठोर और अधिक स्थायी है।”  (सूरत ताहा : 124–127)

उत्तम जीवन के लिए धैर्य और सहनशीलता आवश्यक है

जब आप —ऐ प्रिय भाई— यह बात समझ गए और यह आपके दिल में बैठ गया, और आपका मन इससे संतुष्ट हो गया; फिर आपको यह भी ज्ञात हो गया कि अल्लाह तआला ने इस पूरे ब्रह्मांड को—उसकी ज़मीन, आसमान, समुद्र, नदियाँ, पहाड़, मैदान, घाटियाँ और रेगिस्तान समेत— ऐ कमज़ोर और ज़रूरतमंद प्राणी! सिर्फ़ तुम्हारे ही लिए बनाया है, जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है : هُوَ الَّذِي خَلَقَ لَكُمْ مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا  “वही है जिसने ज़मीन में जो कुछ है, सब तुम्हारे लिए पैदा किया।” (सूरतुल-बक़रह : 29)

फिर आपने यह जान लिया कि इस संसार में तुम्हारे अस्तित्व का सर्वोच्च उद्देश्य केवल अपने रब, अपने सृष्टिकर्ता और अपने पालनहार की इबादत करना है, जिसने हर चीज़ को बेहतरीन रूप में पैदा किया :  وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ  “और मैंने जिन्न और इंसान को केवल अपनी इबादत के लिए ही पैदा किया है।” (सूरतुज़-ज़ारियात: 56)

और यह भी कि अल्लाह तआला ने मृत्यु और जीवन को इसलिए पैदा किया ताकि वह अपने बंदों की परीक्षा ले और उन्हें परखे कि वे इस इबादत को कैसे अदा करते हैं और उसमें अल्लाह के अधिकारों को कैसे निभाते हैं: الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا وَهُوَ الْعَزِيزُ الْغَفُورُ  “वही है जिसने मृत्यु और जीवन को पैदा किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में से कौन कर्मों में सबसे अच्छा है। और वह प्रभुत्वशाली, अत्यंत क्षमाशील है।” (सूरतुल-मुल्क : 2)

फिर अल्लाह तआला ने अपने बंदों पर कृपा करते हुए यह वादा किया कि जो लोग इस संसार में अच्छे कर्म करने वाले हैं, उनके लिए आख़िरत में ऐसी जन्नत होगी जिसकी चौड़ाई आसमानों और ज़मीन के बराबर है—जिसमें ऐसी नेमतें होंगी जिन्हें न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना और न ही किसी इनसान के दिल में उनका ख़याल आया। इसी तरह, उसने उस ज़ालिम से, जिसने अपने रब के हक़ में लापरवाही की, यह वादा किया कि उसके लिए भड़कती हुई आग होगी, जिसमें वह न मरेगा और न ज़िंदा रहेगा, और उसमें ऐसे-ऐसे दंड और यातनाएँ होंगी, जिनका केवल सुनना ही बच्चों के बाल सफ़ेद कर दे—उन्हें देखना और सहना तो बहुत दूर की बात है। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें और आपको उससे सुरक्षित रखे.. आमीन।

जब आपने यह बात दिल की गहराई और पूर्ण विश्वास के साथ जान ली; तो आपको यह भी ज्ञात हो जाएगा कि इस महान नेमत को प्राप्त करना और इस कठिन परीक्षा में सफल होना, केवल कठिनाई और कष्ट के पुल से गुज़र कर ही संभव है जिसके लिए धैर्य, सहनशीलता और कष्ट उठाने की आवश्यकता है।

लेकिन यह कठिनाई ऐसी है जो बहुत जल्द समाप्त हो जाती है, और यह पीड़ा भी थोड़े ही समय में खत्म हो जाती है; जिसके बाद स्थायी आराम और हमेशा रहने वाली नेमत (सुख) आती है। आख़िर एक घड़ी की कठिनाई और एक पल का दर्द, अनंत समय की नेमत और हमेशा की खुशी के सामने क्या मायने रखता है? हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें और आपको अपना अनुग्रह और अपनी जन्नत प्रदान करे। आमीन।

इस्लाम की शुरुआत अजनबी के रूप में हुई थी और वह फिर वैसे ही हो जाएगा जैसे शुरू हुआ था

फिर यह भी जान लो, ऐ मेरे भाई! —अल्लाह तुम्हें अपनी हिदायत की तौफ़ीक़ दे— कि जैसे-जैसे धर्म की अजनबियत बढ़ती जाती है और सच्चाई पर अडिग रहने वाले लोग कम होते जाते हैं - जैसा कि हमारे इस ज़माने में है - वैसे-वैसे इस पर स्थिर रहना दिल पर भारी हो जाता है, और अधिकतर लोगों की राह से अलग चलना आत्मा पर कठिन हो जाता है। इसी कारण अल्लाह तआला की हिकमत और उसकी कृपा की यह अपेक्षा हुई कि हक़ पर जमकर खड़े रहने वाले सच्चे मोमिनों का बदला कई गुना बढ़ा दिया जाए; जिन्होंने अल्लाह की प्रसन्नता को हर चीज़ पर प्राथमिकता दी और उसके रास्ते में महंगी से महंगी और क़ीमती से क़ीमती चीज़ क़ुर्बान कर दी।

सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 145) में अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “इस्लाम की शुरुआत अजनबी अवस्था में हुई थी और वह फिर उसी तरह अजनबी बनकर रह जाएगा, जैसे शुरु हुआ था, तो उन अजनबी बनकर रह जाने वालों के लिए खुशख़बरी है।”

तथा सुनन तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 3058) में अबू सा’लबा अल-ख़ुशनी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “निःसंदेह तुम्हारे बाद ऐसे दिन आएँगे जिनमें सब्र करना जलते अंगारों को पकड़ने जैसा होगा। उन दिनों में अमल करने वाले को तुम्हारे जैसे अमल करने वाले पचास लोगों के सवाब के बराबर सवाब मिलेगा।” एक रिवायत में है : पूछा गया : “ऐ अल्लाह के रसूल! हममें से पचास का सवाबॽ या उनमें से?” आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “बल्कि तुम में से पचास का सवाब।” इसे अल्बानी ने “सहीह तरगीब व तरहीब” (हदीस : 3172) में सहीह कहा है।

इन महान हदीसों और इनके अलावा अन्य (हदीसों) से यह बात स्पष्ट होती है कि आख़िरी ज़माने में लोगों में बुराई और बिगाड़ वाले लोग अधिक हो जाएंगे, और भलाई, परहेज़गारी और सुधार (नेकी) वाले लोग कम रह जाएँगे। यह फ़ितनों की अधिकता, गुनाहों और आकर्षणों के फैलाव के कारण होगा, यहाँ तक कि दीन पर चलने वाला व्यक्ति लोगों के बीच अजनबी बन जाएगा, बल्कि संभव है कि वह अपने ही घरवालों और रिश्तेदारों के बीच भी अजनबी बन जाए।

ये हदीसें यह भी बताती हैं कि धर्म को मज़बूती से थामे रहना आसान काम नहीं है; बल्कि, यह जलते हुए अंगारों को पकड़ने जैसा है। अल्लाह की तौफ़ीक़ के बाद धर्म पर जमे रहने में सबसे बड़ा सहायक इस रास्ते पर धैर्य रखना है, यहाँ तक कि बंदा अपने रब से इस हाल में मिले कि उसने न तो कोताही की हो और न ही (दीन में) कोई बदलाव किया हो। इस तरह वह ऐसे रब से मिलेगा जो उससे प्रसन्न होगा, नाराज़ नहीं, जो उसे उसका बदला कई गुना बढ़ाकर देगा। जो व्यक्ति इस तथ्य को सही रूप में जान लेता है, तो जो कुछ भी वह अपने रब के पास इंतज़ार कर रहा है, उसके रास्ते में आने वाली हर कठिनाई अल्लाह की मर्ज़ी, कृपा और उदारता से, उसके लिए हल्की हो जाती है।

यह जो कुछ हमने कहा, तब है जब आप अपने लिए इस रास्ते को कठिन महसूस करते हैं, और आपको डर है कि कहीं आपका सब्र कमज़ोर न पड़ जाए और आपके क़दम स्थिरता के रास्ते से डगमगा न जाएँ।

अपने दिल में निराशा को प्रवेश न करने दो

लेकिन अगर आपको यह महसूस होता है कि आपके पास इस इस्लामी जीवन के तरीक़े को — जिसे आप जी रहे हैं — अपने आसपास के लोगों तक पहुँचाने और उन्हें उसकी ओर वापस बुलाने की कोई उम्मीद नहीं रही, जबकि यह आपकी ज़िम्मेदारी है, और ऐसा इसलिए क्योंकि आपको बहुत ज़्यादा विरोध, दुश्मनी और अपने प्रयासों को गिराने वाली शक्तियों का सामना करना पड़ रहा है— तो जान लें कि इस रास्ते में उठाया गया आपका हर क़दम एक विजय और सदक़ा है। और अच्छी बात कहना भी सदक़ा है।

आपको नहीं पता कि आपका कहा हुआ कोई शब्द कब और किसके दिल में असर कर जाए; शायद वह उसे कुछ समय के बाद फ़ायदा पहुँचाए। इसलिए उस फ़ायदे के प्रति आपकी उम्मीद कभी खत्म नहीं होनी चाहिए (जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है) :  وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَى رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ   “और उनमें से एक समूह ने कहा : ‘तुम ऐसे लोगों को क्यों नसीहत करते हो जिन्हें अल्लाह नष्ट करने वाला है या कठोर यातना देने वाला है?’ उन्होंने कहा : ‘ताकि तुम्हारे रब के सामने हमारा बहाना हो जाए, और शायद वे डर जाएँ।” (सूरतुल-आराफ़ : 164)

अपने दिल में निराशा के प्रवेश करने से सावधान रहें, क्योंकि :  لَا يَيْأَسُ مِنْ رَوْحِ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْكَافِرُونَ   “अल्लाह की रहमत से केवल काफ़िर लोग ही निराश होते हैं।” (सूरत यूसुफ़ : 87) तथा मायूसी (नाउम्मीदी) से बचो, क्योंकि वह गुमराही है :  وَمَنْ يَقْنَطُ مِنْ رَحْمَةِ رَبِّهِ إِلَّا الضَّالُّونَ  “और कौन अपने रब की रहमत से नाउम्मीद होता है सिवाय उन लोगों के जो गुमराह हैं?” (सूरतुल-हिज्र: 56)

और यह जान लो कि तुम्हारे क़दम व्यर्थ नहीं जाएँगे। जब तक तुम इस रास्ते पर हो, तो जिस बिंदु पर तुम्हारी ज़िंदगी खत्म होगी, वही तुम्हारे लिए मंज़िल बन जाएगी :  وَمَنْ يَخْرُجْ مِنْ بَيْتِهِ مُهَاجِرًا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ يُدْرِكْهُ الْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ أَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا   “और जो अपने घर से अल्लाह और उसके रसूल की ओर हिजरत करता हुआ निकलता है, फिर रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे हो जाता है। और अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयालु है।” (सूरतुन-निसा : 100)

फिर तुम्हारे बाद वालों की बारी आएगी, जो तुम्हारा झंडा उठाएँगे और इस रास्ते को आगे बढ़ाएँगे। और इस उम्मत में हमेशा ऐसे लोग मौजूद रहेंगे : “अल्लाह इस दीन में हमेशा ऐसे लोगों को पैदा करता रहेगा जिन्हें वह अपनी आज्ञाकारिता में इस्तेमाल करेगा।” इसे इब्न माजह ने रिवायत किया है और अल्बानी ने “सुनन इब्न माजह” (1/5) में इसे हसन कहा है।

अल्लाह के विजय और प्रभुत्व के वादे पर भरोसा

इस उम्मत के लिए अल्लाह के विजय और प्रभुत्व के वादे पर पूरा भरोसा रखें :  وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِنْ بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ   “और हमने ज़बूर में ज़िक्र के बाद लिख दिया कि ज़मीन के वारिस मेरे नेक बंदे होंगे।” (सूरतुल-अंबिया : 105) और (हदीस में आया है) : “यह दीन वहाँ तक अवश्य पहुँचेगा जहाँ तक रात और दिन पहुँचते हैं। अल्लाह कोई कच्चे या पक्के घर को नहीं छोड़ेगा जिसमें वह इस दीन को दाख़िल न करे, या तो सम्मानित व्यक्ति के सम्मान के साथ या अपमानित के अपमान के साथ। वह सम्मान जिससे अल्लाह इस्लाम को ऊँचा करेगा और वह अपमान जिससे अल्लाह कुफ़्र को नीचा करेगा।” इसे इमाम अहमद ने रिवायत किया है और अल्बानी ने “सिलसिला सहीहा” (हदीस संख्या : 32) में सहीह कहा है। (आप चाहें तो “निराश मत हो, विजय आने वाली है” नामक व्याख्यान भी देख सकते हैं।)

इसलिए, ऐ आदरणीय भाई! मैं तुम्हें दीन पर दृढ़ता से क़ायम रहने और उससे ज़रा भी पीछे न हटने की नसीहत करता हूँ—चाहे फ़ितने कितने ही ज़्यादा हों, आकर्षण कितने ही प्रबल हों, और रुकावटें व हतोत्साहित करने वाली चीज़ें कितनी ही अधिक क्यों न हों। और यह जान लो कि अंततः सफलता परहेज़गारों ही के लिए है।

आपको अल्लाह के धर्म पर स्थिर रहने में मदद करने वाले सभी साधनों और तरीकों को अपनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। आपको इस वेबसाइट पर धर्म पर स्थिर रहने के तरीक़ों और साधनों के बारे में एक विशेष लेख मिलेगा, मैं आपको उसे पढ़ने और उससे लाभ उठाने की सलाह देता हूँ।

धर्म पर अडिग रहने के लिए प्रेरित करने वाली आयतें

इन बातों के अंत में, मैं आपको – ऐ मेरे प्रिय भाई - अल्लाह की किताब की इन महान आयतों के साथ छोड़ना चाहता हूँ, जिन्हें अल्लाह ने अपने बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा, ताकि वे मोमिनों के दिलों के लिए शिफ़ा और उनकी बीमारियों की दवा बनें। अतः इन्हें सोच-समझकर पढ़ो, और यदि संभव हो तो किसी संक्षिप्त तफ़सीर—जैसे शैख़ अब्दुर्रहमान बिन सादी की तफ़सीर या इब्न कसीर की तफ़सीर—की ओर भी रुजू करो।

अल्लाह तआला फ़रमाता है :

أَمْ حَسِبْتُمْ أَنْ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُمْ مَثَلُ الَّذِينَ خَلَوْا مِنْ قَبْلِكُمْ مَسَّتْهُمُ الْبَأْسَاءُ وَالضَّرَّاءُ وَزُلْزِلُوا حَتَّى يَقُولَ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ مَتَى نَصْرُ اللَّهِ أَلَا إِنَّ نَصْرَ اللَّهِ قَرِيبٌ

البقرة: 214

“या तुमने समझ रखा है कि तुम जन्नत में प्रवेश कर जाओगे, हालाँकि अभी तक तुमपर उन लोगों जैसी दशा नहीं आई, जो तुमसे पूर्व थे। उन्हें तंगी और तकलीफ़ पहुँची तथा वे सख़्त हिला दिए गए, यहाँ तक कि वह रसूल और जो लोग उसके साथ ईमान लाए थे, कह उठे : अल्लाह की सहायता कब आएगी? सुन लो, निःसंदेह अल्लाह की सहायता क़रीब है।” (सूरतुल-बक़रह : 214)

तथा अल्लाह ने फ़रमाया :

الم * أَحَسِبَ النَّاسُ أَنْ يُتْرَكُوا أَنْ يَقُولُوا آمَنَّا وَهُمْ لَا يُفْتَنُونَ * وَلَقَدْ فَتَنَّا الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ فَلَيَعْلَمَنَّ اللَّهُ الَّذِينَ صَدَقُوا وَلَيَعْلَمَنَّ الْكَاذِبِينَ

العنكبوت: 1 - 3

“अलिफ़, लाम, मीम। क्या लोगों ने यह समझ लिया है कि वे केवल यह कहने पर छोड़ दिए जाएँगे कि "हम ईमान लाए" और उनकी परीक्षा न ली जाएगी? हालाँकि निःसंदेह हमने उन लोगों की परीक्षा ली जो इनसे पहले थे। अतः अल्लाह उन लोगों को अवश्य जान लेगा जिन्होंने सच कहा, तथा वह उन लोगों को (भी) अवश्य जान लेगा जो झूठे हैं।” (सूरतुल-अनकबूत : 1–3)

आगे अल्लाह ने फ़रमाया :

وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُدْخِلَنَّهُمْ فِي الصَّالِحِينَ * وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَقُولُ آمَنَّا بِاللَّهِ فَإِذَا أُوذِيَ فِي اللَّهِ جَعَلَ فِتْنَةَ النَّاسِ كَعَذَابِ اللَّهِ وَلَئِنْ جَاءَ نَصْرٌ مِنْ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمْ أَوَلَيْسَ اللَّهُ بِأَعْلَمَ بِمَا فِي صُدُورِ الْعَالَمِينَ

العنكبوت: 9، 10

“और जो लोग ईमान लाए तथा अच्छे कर्म किए, हम उन्हें अवश्य सदाचारियों में सम्मिलित और लोगों में से कुछ ऐसे हैं, जो कहते हैं : हम अल्लाह पर ईमान लाए। फिर जब अल्लाह के मामले में उसे सताया जए, तो लोगों के सताने को अल्लाह की यातना के समान समझ लेता है। और निश्चय यदि आपके पालनहार की ओर से कोई सहायता आ जाए, तो निश्चय ज़रूर कहेंगे : हम तो तुम्हारे साथ थे। और क्या अल्लाह उसे अधिक जानने वाला नहीं, जो सारे संसार के दिलों में है?” (सूरतुल-अनकबूत : 9–10)

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

 وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ فَإِنْ أَصَابَهُ خَيْرٌ اطْمَأَنَّ بِهِ وَإِنْ أَصَابَتْهُ فِتْنَةٌ انْقَلَبَ عَلَى وَجْهِهِ خَسِرَ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةَ ذَلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ

الحج: 11

“तथा लोगों में वह (भी) है, जो अल्लाह की इबादत एक किनारे पर रहकर करता है। फिर यदि उसे कोई भलाई पहुँच जाए, तो वह उससे संतुष्ट हो जाता है, और यदि उसे कोई परीक्षा आ पहुँचे, तो मुँह के बल फिर जाता है। वह दुनिया एवं आख़िरत में घाटे में पड़ गया। यही तो खुला घाटा है।” (सूरतुल-हज्ज : 11)

और अल्लाह ने फ़रमाया :

إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ الْمَلَائِكَةُ أَلَّا تَخَافُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَبْشِرُوا بِالْجَنَّةِ الَّتِي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ

فصلت: 30

“निःसंदेह जिन लोगों ने कहा : हमारा पालनहार केवल अल्लाह है, फिर उसपर मज़बूती से जमे रहे, उनपर फ़रिश्ते उतरते हैं कि भय न करो और न शोकाकुल हो तथा उस जन्नत से खुश हो जाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था।” (सूरत फ़ुस्सिलत : 30)

तथा फ़रमाया :

إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ * أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ خَالِدِينَ فِيهَا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ

الأحقاف: 13، 14

“निःसंदेह जिन लोगों ने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है। फिर ख़ूब जमे रहे, तो उन्हें न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे। ये लोग जन्नत वाले हैं, जिसमें वे हमेशा रहने वाले हैं, उसके बदले में जो वे किया करते थे।”

(सूरतुल-अहक़ाफ़ : 13–14)

इनके अलावा और भी बहुत सी आयतें हैं जो दीन पर अडिग रहने की प्रेरणा देती हैं और यह स्पष्ट करती हैं कि अल्लाह ने सच्चे मोमिनों के लिए क्या-क्या तैयार कर रखा है। अल्लाह की किताब ऐसी आयतों से भरी हुई है जो इस अर्थ को अत्यंत स्पष्ट रूप में बयान करती हैं।

इसलिए, ऐ मेरे भाई! मैं तुम्हें नसीहत करता हूँ कि क़ुरआन को सोच-समझकर और मनन के साथ पढ़ो। अगर अल्लाह चाहेगा, तो तुम उसमें सब्र करने में, और ऊब, निराशा या रास्ते को लंबा समझने से बचने में बहुत बड़ा सहायक पाओगे। क्योंकि यह दुनिया की ज़िंदगी बहुत जल्दी समाप्त हो जाने वाली और मिट जाने वाली है, फिर बंदा अपने रब के पास वही पाएगा जो उसने आगे भेजा है—अगर अच्छा किया होगा तो अच्छा मिलेगा, और अगर बुरा किया होगा तो बुरा।

 يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِنْ سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ

آل عمران: 30

“उस दिन हर व्यक्ति अपने किए हुए भले और बुरे कर्मों को सामने पाएगा, और वह चाहेगा कि काश उसके और उन कर्मों के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता। और अल्लाह तुम्हें स्वयं से डराता है, और अल्लाह अपने बंदों पर बहुत दयालु है।” (सूरत आल-इमरान : 30)

मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि वह आपका सीना भलाई के लिए खोल दे, और आपको उसपर क़ायम रखे, यहाँ तक कि आपकी उससे मुलाक़ात हो;  तथा आपसे हर बुराई और नुकसान को दूर रखे। निश्चय ही वह सब कुछ सुनने वाला, बहुत निकट है।

और अल्लाह तआला ही सबसे ऊँचा और सबसे अधिक जानने वाला है।

तथता अल्लाह अपने बंदे और नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा उनके परिवार और साथियों पर बहुत अधिक दुरूद और सलाम भेजे।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

संदर्भ

सराहनीय नैतिकता (व्यवहार)

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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