तलाक़ को घटित होने से रोकने के लिए अनेक शरई प्रतिबंध

प्रश्न 142223

मैं एक मुसलमान हूँ और मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हर चीज़ के पीछे अल्लाह की कोई हिकमत (बुद्धिमत्ता) होती है। और भले ही वह हमारे लिए अस्पष्ट क्यों न हो, लेकिन अल्लाह तआला हमसे बेहतर जानता है कि हमारे लिए क्या लाभकारी है। मैं जानता हूँ कि शादी के अनुबंध को नियंत्रित करने वाले सख्त नियमों के पीछे की हिकमत यह है कि बुराइयों और खराबियों से बचा जा सके, ताकि ऐसा न हो कि कोई स्त्री व्यभिचार करे और फिर यह कह दे कि मैं तो शादीशुदा हूँ। लेकिन, तलाक़ की प्रक्रिया को इतना आसान क्यों बनाया गया है? चुनाँचे केवल एक शब्द से शादी समाप्त हो जाती है, न गवाहों की ज़रूरत है, न लोगों को सूचना देने की ज़रूरत। फिर तलाक़ को तीन तलाक़ों तक सीमित किया गया है। क्या यह सब परिवार की इकाई को तोड़ने को आसान नहीं बनाता? इसके अलावा, क्या तलाक़ में गवाहों की गैर-मौजूदगी से बिगाड़ और खराबियाँ नहीं पैदा होती हैं? क्योंकि जिस स्त्री को उसके पति ने तलाक़ दे दी और किसी को गवाह नहीं बनाया, तो वह विरासत का दावा कर सकती है, या वह व्यभिचार से गर्भवती होकर उस बच्चे को अपने तलाक देने वाले पति की ओर मंसूब कर सकती है।

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

इस्लाम ने शादी को इसलिए वैध ठहराया और उसका आदेश दिया है, क्योंकि उससे अनेक हित और भलाइयाँ जुड़ी होती हैं। जबकि तलाक़ में इस्लाम ने सख़्ती की है। ऐसा बिलकुल नहीं है, जैसा कि प्रश्नकर्ता कह रहा है कि इस्लाम ने उसमें आसानी की है। बल्कि इस्लाम ने तलाक़ के लिए कुछ ऐसे नियम और प्रतिबंध निर्धारित किए हैं, जो पुरुष के लिए तलाक़ देना सीमित करते हैं और उसके घटित होने को कम करते हैं। इस्लाम ने पति को तलाक़ का यूँ खुला अधिकार नहीं दिया कि वह जब चाहे, जैसे चाहे तलाक़ दे दे।

अगर मुसलमान इन शरई नियमों का पालन करें, तो तलाक़ बहुत कम हो जाएगा और केवल वही तलाक़ होगा जिसकी वास्तव में पति को ज़रूरत होगी।
हालाँकि, कटु सच्चाई यह है कि अधिकांश लोग इन नियमों की परवाह नहीं करते और अल्लाह की सीमाओं को लांघते हैं। इसी कारण तलाक़ का चलन बढ़ गया है और कुछ लोग यह समझने लगे हैं कि इस्लाम ने तलाक़ को आसान कर दिया है।

अल्लाह तआला ने तलाक़ को कम करने के लिए जो नियम निर्धारित किए हैं, उनमें से कुछ ये हैं :

  1. तलाक़ का मूल हुक्म यह है कि वह निषिद्ध है, या तो हराम होने के तोर पर या मकरूह (नापसंदीदा) होने के तौर पर।

शैखुल-इस्लाम इब्न तैमिय्या रहिमहुल्लाह कहते हैं :

“तलाक़ के बारे में मूल सिद्धांत निषेध (मनाही) है। केवल आवश्यकता के अनुसार ही उसे वैध किया गया है। जैसा कि सहीह हदीस में जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के माध्यम से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ”इबलीस समुद्र पर अपना सिंहासन लगाता है और अपने चेले भेजता है। तो उनमें से जो सबसे बड़ा फ़ितना फैलाने वाला होता है, वह उसके सबसे क़रीब होता है… एक शैतान उसके पास आता है और कहता है : “मैं उसके साथ तब तक लगा रहा जब तक उसने ऐसा और ऐसा नहीं किया।” फिर एक अन्य शैतान उसके पास आकर कहता है : “मैंने उसे तब तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने उसके और उसकी पत्नी के बीच जुदाई न करा दी।” तो इबलीस उसे अपने क़रीब कर लेता है और कहता है : तू ही है, तू ही है। (यानी वास्तव में तूने काम किया है।) और उसे गले लगा लेता है।” अल्लाह तआला ने जादू की निंदा करते हुए फरमाया :

فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ

“फिर वे उन दोनों से वह चीज़ सीखते, जिसके द्वारा वे आदमी और उसकी पत्नी के बीच जुदाई डाल देते।” (सूरतुल-बक़रा : 102) उद्धरण समाप्त हुआ।

“मजमूउल-फ़तावा” (33/81)

तथा उन्होंने यह भी फरमाया :

“अगर तलाक़ की आवश्यकता न होती, तो प्रमाण उसके हराम होने की अपेक्षा करते, जैसा कि आसार और उसूल से पता चतलता है, लेकिन अल्लाह ने अपने बंदों पर दया करते हुए उसे वैध किया; क्योंकि उन्हें कभी-कभी इसकी आवश्यकता होती है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

“मजमूउल-फ़तावा” (32/89)

  1. तलाक़ का अधिकार पति को दिया गया, पत्नी को नहीं

अल्लाह तआला ने तलाक़ का हक़ पति के हाथ में दिया है, पत्नी के हाथ में नहीं। अगर तलाक़ औरतों के हाथ में होता, तो आप आज के मुक़ाबले में कई गुना ज़्यादा तलाक़ के मामले देखते ; क्योंकि औरतें आसानी से भावनाओं में बह जाती हैं और फ़ैसले लेने में जल्दबाज़ी करती हैं।

इब्नुल-हुमाम अल-हनफ़ी रहिमहुल्लाह ने उल्लेख किया है कि तलाक़ के नियमों की एक ख़ूबी यह है कि यह मर्दों के हाथ में है, औरतों के नहीं। इसका कारण यह है कि मर्द खुद पर काबू रखने और अपने कामों के परिणामों को समझने में अधिक सक्षम होते हैं।

देखें : "फ़त्हुल-क़दीर" (3/463)।

  1. मासिक धर्म की हालत में या जिस पाकी में सहवास हुआ हो, तलाक़ देना जायज़ नहीं

पति के लिए अपनी पत्नी को माहवारी के दौरान या उस पाकी के दौरान तलाक देना जायज़ नहीं है जिसमें उसने उसके साथ संबंध बनाए हों। इस प्रकार के तलाक़ के घटित होने या न होने में फुक़हा का मतभेद है।

अतः जो व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है और वह मासिक धर्म की स्थिति में है या ऐसी पाकी की स्थिति में जिसके दौरान उसने उसके साथ संबंध बनाए हैं, तो उसे तब तक इंतज़ार करना होगा जब तक वह पाक न हो जाए और फिर उस पाकी में उसके साथ संबंध बनाने से पहले उसे तलाक़ दे। यह प्रतीक्षा अवधि कभी-कभी लगभग एक महीने तक पहुँच सकती है और अक्सर ऐसा होता है कि इस इंतज़ार के दौरान पति का इरादा बदल जाता है और वह कारण समाप्त हो जाता है जिसके चलते उसने तलाक देना चाहा था।

  1. तलाक़ के बाद स्त्री को घर से न निकालना

तलाक़ होने के बाद औरत को उसके घर से नहीं निकालना चाहिए, और उसका (ख़ुद) घर छोड़कर निकलना भी जायज़ नहीं है। इस बारे में अल्लाह तआला फरमाता है :

يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَأَحْصُوا الْعِدَّةَ وَاتَّقُوا اللَّهَ رَبَّكُمْ لا تُخْرِجُوهُنَّ مِنْ بُيُوتِهِنَّ وَلا يَخْرُجْنَ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ وَمَنْ يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُ لا تَدْرِي لَعَلَّ اللَّهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذَلِكَ أَمْراً

“ऐ नबी! जब तुम अपनी पत्नियों को तलाक़ दो, तो उन्हें उनकी 'इद्दत' के समय तलाक़ दो, और 'इद्दत' की गिनती करो। तथा अल्लाह से डरो, जो तुम्हारा पालनहार है। तुम उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे स्वयं निकलें, परंतु यह कि वे कोई खुली बुराई कर जाएँ। तथा ये अल्लाह की सीमाएँ हैं और जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करेगा, तो निश्चय उसने अपने ऊपर अत्याचार किया। तुम नहीं जानते, शायद अल्लाह उसके बाद कोई नई बात पैदा कर दे।” (सूरत अत-तलाक़ : 1)

इस हुक्म की हिकमत यह है कि पति-पत्नी को आपस में समस्या सुलझाने का अवसर मिले, और पति अपनी पत्नी को वापस लौटा ले, बिना किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के, क्योंकि कई बार ऐसे हस्तक्षेप सुधार के बजाय बिगाड़ का कारण बन जाते हैं।

यदि तलाक़ होते ही महिला अपने घर से निकल जाए, तो इसका परिणाम — जैसा कि व्यवहार में होता है — यह सामने आता है कि झगड़ा और बढ़ जाता है तथा पति उसे वापस न लौटाने (रुजू न करने) पर अड़ जाता है।

इसी आयत में, अल्लाह तआला ने इस हुक्म की हिकमत को स्पष्ट करते हुए फ़रमाया :  لا تَدْرِي لَعَلَّ اللَّهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذَلِكَ أَمْراً “तुम नहीं जानते, शायद अल्लाह उसके बाद कोई नई बात पैदा कर दे।” (सूरत अत-तलाक़ : 1) इसका मतलब है हालात का बदल जाना और पति का अपनी पत्नी को वापस लौटाना।

  1. शरीअत ने पति के तलाक़ देने की संख्या तीन निर्धारित की है।

इसकी हिकमत स्पष्ट है। ताकि यदि पुरुष को तलाक़ देने पर पछतावा हो, तो उसे अपनी पत्नी को लौटाने का अवसर मिल सके, शायद दोनों में से जिसने गलती की हो वह अपनी गलती सुधार ले। फिर पति को एक और अवसर दिया गया। लेकिन यदि वह तीसरी बार तलाक़ दे दे, तो यह आम तौर पर इस बात का संकेत होता है कि अब उनके बीच संबंध सही नहीं हो सकते, इसलिए फिर अलग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

ताहिर बिन आशूर रहिमहुल्लाह कहते हैं :

इस महान विधान (नियम) की हिकमत यह है कि : पतियों को अपनी पत्नियों के अधिकारों को हल्के में लेने और उन्हें अपने घरों में खिलौना बनाने से रोका जाए। इसलिए पति के लिए पहले तलाक़ को एक चूक (गलती), दूसरे को एक अनुभव, और तीसरे को अंतिम अलगाव (जुदाई) बनाया गया। जैसा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मूसा और ख़ज़िर की हदीस में फ़रमाया : “पहली बार सवाल करना मूसा से भूलवश हुआ, दूसरी बार शर्त के कारण, और तीसरी बार जानबूझकर हुआ। इसीलिए ख़ज़िर ने तीसरी बार में कहा :  هَذَا فِرَاقُ بَيْنِي وَبَيْنك “यह मेरे और तुम्हारे बीच जुदाई है।” ((सूरतुल-कह्फ़ : 78)
इसे इमाम बुख़ारी (हदीस संख्या : 2578) और इमाम अहमद (35/56) ने रिवायत किया है, और विद्वानों ने इसे सहीह कहा है।

“अत-तह़रीर वत-तनवीर” (2/415)

इसी प्रकार, हनफ़ी फ़क़ीह इब्नुल हुमाम रहिमहुल्लाह ने तलाक़ की संख्या तीन रखने की हिकमत बताते हुए कहा :

“क्योंकि इंसानी नफ़्स (मन) झूठा होता है। कभी वह पत्नी की ज़रूरत न होने या उसे छोड़ने की आश्यकता का दिखावा करता है और उसे उकसाता है। यदि तलाक़ हो जाता है, तो पछतावा होता है, दिल तंग हो जाता है और सब्र टूट जाता है। इसलिए अल्लाह ने इसे तीन बार रखा, ताकि पहली बार आदमी अपने नफ़्स को परखे। यदि तलाक़ वास्तविक ज़रूरत पर आधारित हो, तो वह इद्दत पूरी होने तक कायम रहता है। नहीं तो, वह रुजू करके स्थिति को सुधार सकता है। फिर यदि नफ़्स दोबारा पहले जैसी हालत में लौट आए और उस पर हावी हो जाए यहाँ तक कि वह फिर तलाक़ दे दे, तो वह फिर देखता है कि उसके साथ क्या होता है। तीसरी तलाक़ वह तभी देता है जब वह अपने नफ़्स को पूरी तरह आज़मा चुका होता है और उसकी हालत को समझ चुका होता है। तीन के बाद सारे बहाने खत्म हो जाते हैं।” उद्धरण समाप्त हुआ।

देखें : “शर्ह फ़त्हुल क़दीर” (3/465–466)

  1. पत्नी को समझाने और नसीहत करने की वैधता, सोने के स्थान में उससे अलग रहने की वैधता, और हल्की मार (ऐसी मार जो नुकसानदेह न हो) की अनुमति — यदि पत्नी से यह डर हो कि वह पति के प्रति अवज्ञा करेगी, उस पर घमंड दिखाएगी या उसे नीचा समझेगी। जैसा कि अल्लाह तआला के इस कथन में है :  وَاللاَّتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلاَ تَبْغُواْ عَلَيْهِنَّ سَبِيلاً إِنَّ اللّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيراً   “फिर तुम्हें जिन औरतों की अवज्ञा का डर हो, उन्हें समझाओ और सोने के स्थानों में उनसे अलग रहो तथा उन्हें मारो। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानें, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूँढो। निःसंदेह अल्लाह सर्वोच्च, सबसे बड़ा है।” (सूरत अन-निसा : 34)

अतः पति को ऐसा नहीं करना चाहिए कि पत्नी के साथ ज़रा-सी समस्या पैदा होते ही तलाक़ की ओर बढ़ जाए। तलाक़ से पहले सुधार के कई प्रयास किए जाने चाहिए।

  1. पति-पत्नी के बीच उन समस्याओं के समाधान के लिए मध्यस्थता (हकम तय करने) की वैधता, जिन्हें वे स्वयं हल नहीं कर सकते। इस विषय में अल्लाह तआला फ़रमाता हैं :  وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُواْ حَكَمًا مِّنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِّنْ أَهْلِهَا إِن يُرِيدَا إِصْلاَحًا يُوَفِّقِ اللّهُ بَيْنَهُمَا إِنَّ اللّهَ كَانَ عَلِيمًا خَبِيرًا   “और यदि तुम्हें दोनों के बीच अलगाव का डर हो, तो एक मध्यस्थ पति के घराने से तथा एक मध्यस्थ पत्नी के घराने से नियुक्त करो, यदि दोनों (मध्यस्थ) सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह दोनों (पति-पत्नी) के बीच मेल का रास्ता निकाल देगा। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला और हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है।” (सूरतुन-निसा : 35)

अतः जब समस्या का समाधान संभव न हो, तब भी पति को तुरंत तलाक़ का सहारा नहीं लेना चाहिए, बल्कि इन दोनों मध्यस्थों के माध्यम से एक और प्रयास किया जाना चाहिए।

इससे यह स्पष्ट हो गया कि इस्लाम ने तलाक़ को न तो आसान बनाया है और न ही उसे हल्के में लिया है, बल्कि उसमें सख़्ती की है और पुरुष पर पाबंदियाँ लगाई हैं; ताकि तलाक़ कम से कम हो। और यह सब इसलिए है क्योंकि तलाक़ अल्लाह तआला के यहाँ नापसंदीदा है, प्रिय नहीं।

शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह से पूछा गया :

इस्लाम ने तलाक़ को पति-पत्नी के बीच अलगाव का अंतिम समाधान बनाया है और तलाक़ का सहारा लेने से पहले कई प्रारंभिक हल (उपाय) बताए हैं। तो ऐ सम्मानित शैख़, क्या आप हमें उन उपायों के बारे में बता सकते हैं जिन्हें इस्लाम ने तलाक़ से पहले वैवाहिक विवाद सुलझाने के लिए निर्धारित किया है?

तो उन्होंने उत्तर दिया :

“अल्लाह ने पति-पत्नी के बीच सुधार को वैध ठहराया है और उन साधनों को अपनाने का आदेश दिया है जो परिवार को जोड़े रखें और तलाक़ की आशंका को दूर करें। इनमें शामिल हैं : नसीहत करना, बिस्तर अलग करना, और यदि नसीहत व बिस्तर अलग करने से लाभ न हो, तो हल्की मार मारना। जैसा कि अल्लाह तआला के इस कथन में है :

وَاللاَّتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَاهْجُرُوهُنَّ فِي الْمَضَاجِعِ وَاضْرِبُوهُنَّ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلاَ تَبْغُواْ عَلَيْهِنَّ سَبِيلاً إِنَّ اللّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيراً

“फिर तुम्हें जिन औरतों की अवज्ञा का डर हो, उन्हें समझाओ और सोने के स्थानों में उनसे अलग रहो तथा उन्हें मारो। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानें, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूँढो। निःसंदेह अल्लाह सर्वोच्च, सबसे बड़ा है।” (सूरत अन-निसा : 34)

इसी प्रकार, जब पति-पत्नी के बीच गंभीर मतभेद हो जाएँ, तो उनके परिवारों से दो मध्यस्थ नियुक्त करना भी सुधार के लिए वैध है। जैसा कि अल्लाह तआला के इस कथन में है : :

وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَابْعَثُواْ حَكَمًا مِّنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِّنْ أَهْلِهَا إِن يُرِيدَا إِصْلاَحًا يُوَفِّقِ اللّهُ بَيْنَهُمَا إِنَّ اللّهَ كَانَ عَلِيمًا خَبِيرًا

“और यदि तुम्हें दोनों के बीच अलगाव का डर हो, तो एक मध्यस्थ पति के घराने से तथा एक मध्यस्थ पत्नी के घराने से नियुक्त करो, यदि दोनों (मध्यस्थ) सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह दोनों (पति-पत्नी) के बीच मेल का रास्ता निकाल देगा। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला और हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है।” (सूरत अन-निसा : 35)

यदि ये उपाय लाभकारी सिद्ध न हों और सुलह संभव न हो, और मतभेद बना रहे : तो पति के लिए तलाक़ को वैध किया गया है — यदि गलती उसकी हो। तथा पत्नी के लिए माल देकर अलगाव (ख़ुला’) को वैध किया गया है अगर पति उसके बिना तलाक़ न दे — यदि गलती उसकी ओर से हो या पति के प्रति उसके दिल में घृणा हो। जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है :

الطَّلاَقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ وَلاَ يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُواْ مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلاَّ أَن يَخَافَا أَلاَّ يُقِيمَا حُدُودَ اللّهِ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلاَّ يُقِيمَا حُدُودَ اللّهِ فَلاَ جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ تِلْكَ حُدُودُ اللّهِ فَلاَ تَعْتَدُوهَا وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللّهِ فَأُوْلَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ

“यह तलाक़ दो बार है। फिर या तो अच्छे तरीक़े से रख लेना है, या नेकी के साथ छोड़ देना है। और तुम्हारे लिए ह़लाल (वैध) नहीं कि उसमें से जो तुमने उन्हें दिया है, कुछ भी लो, सिवाय इसके कि उन दोनों को इस बात का डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओं को क़ायम न रख सकेंगे। फिर यदि तुम्हें भय हो कि वे दोनों (पति-पत्नी) अल्लाह की सीमाओं को क़ायम न रख सकेंगे, तो उन दोनों पर उसमें कोई दोष (पाप) नहीं जो पत्नी अपनी जान छुड़ाने के बदले में दे दे। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं, अतः इनसे आगे मत बढ़ो और जो अल्लाह की सीमाओं से आगे बढ़ेगा, तो यही लोग अत्याचारी हैं। (सूरतुल-बक़रा : 229)

तथा इसलिए कि सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग होना झगड़े, विवाद और निकाह के उद्देश्यों के नष्ट होने से बेहतर है। इसी कारण अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

وَإِن يَتَفَرَّقَا يُغْنِ اللّهُ كُلاًّ مِّن سَعَتِهِ وَكَانَ اللّهُ وَاسِعًا حَكِيمًا

“और यदि दोनों अलग हो जाएँ, तो अल्लाह अपने व्यापक अनुग्रह से हर-एक को (दूसरे से) बेनियाज़ कर देगा और अल्लाह व्यापक अनुग्रह वाला, पूर्ण हिकमत वाला है।” (सूरतुन-निसा : 130)

तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि आपने साबित बिन क़ैस अल-अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु को आदेश दिया — जब उनकी पत्नी उनसे प्रेम न होने के कारण उनके साथ रह न सकी और उसने वह बाग़ लौटाने की सहमति दी जो मह्र में मिला था — कि वह उस बाग़ को स्वीकार कर लें और उसे एक तलाक़ दे दें। तो उन्होंने ऐसा ही किया।” इसे इमाम बुख़ारी ने सहीह बुख़ारी में रिवायत किया है।

“फ़तावा उलमा-इल-बलदिल-हराम” (पृष्ठ : 494–495)

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक जानने वाला है।

संदर्भ

तलाक

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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