पहली बात :
मुराबहा बिक्री का स्वरूप यह है कि : आप किसी संस्थान या बैंक के साथ किसी विशिष्ट वस्तु — जैसे कार या भवन निर्माण सामग्री — खरीदने पर समझौता करते हैं, और संस्थान से यह वादा करते हैं कि जब वह उस वस्तु को खरीदकर उसका स्वामित्व प्राप्त कर लेगा, तो आप उसे संस्थान से एक निश्चित लाभ मार्जिन पर खरीद लेंगे।
मुराबहा लेन-देन में “कर्ज़” नहीं होता है। इस लेन-देन को “कर्ज़” कहना गलत है, सिवाय उस स्थिति के जब मुराबहा गलत तरीके से किया जाए। यानी संस्थान अपने लिए वस्तु न खरीदे, बल्कि अपनी भूमिका केवल ग्राहक को पैसा देने तक सीमित रखे, तो ऐसी स्थिति में यह वास्तव में एक कर्ज़ (ऋण) है। और यह एक सूद वाला हराम कर्ज़ है। क्योंकि संस्थान ग्राहक से मूल राशि के साथ-साथ अतिरिक्त रकम की वापसी की मांग करता है।
जहाँ तक वैध और सही मुराबहा की बात है, तो वह निम्नलिखित चरणों के माध्यम से पूरा होता है :
1.ग्राहक का संस्था को उस विशिष्ट वस्तु के बारे में सूचित करना जिसे वह खरीदना चाहता है।
2.संस्था का उस वस्तु को अपने लिए खरीदना।
3.संस्था का उस वस्तु को अपने कब्ज़े में लेना और उसे व्यापारी की दुकान से स्थानांतरित करना। संस्था के लिए यह जायज़ नहीं कि वह वस्तु को अपने कब्ज़े में लेने से पहले ही ग्राहक को बेच दे।
4.संस्था का वस्तु को अपने कब्ज़े और स्वामित्व में लेने के बाद ग्राहक को बेचना।
5.जब संस्था आपको वस्तु बेच दे, तो आपके लिए उसका उपयोग घर बनाने के लिए करना, या नकद पैसा प्राप्त करने के लिए उसे बाज़ार में बेचना जायज़ है। लेकिन इसके लिए दो शर्तें हैं : पहली शर्त यह है कि आप उसे किसी ऐसे पक्ष को बेचें जिसका संस्था से, या उस व्यापारी से कोई संबंध न हो जिसने मूल रूप से उसे संस्था को बेचा था। दूसरी शर्त यह है कि आपको उसे स्वयं बेचना होगा; संस्था को अपनी ओर से उसे बेचने के लिए अपना एजेंट नियुक्त करना जायज़ नहीं है।
यदि ये सभी शर्तें पूरी हों, तो मुराबहा का लेन-देन सही (शरई तौर पर वैध) है।
संस्था के लिए वस्तु को अपने कब्ज़े में लेने और उसे व्यापारी के परिसर से स्थानांतरित करने के अनिवार्य होने का प्रमाण वह हदीस है जिसे इमाम अहमद (हदीस संख्या : 15399) और नसाई (हदीस संख्या : 4613) ने रिवायत किया है कि हकीम बिन हिज़ाम रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैं व्यापार करता हूँ (विभिन्न वाणिज्यिक लेन-देन करता हूँ), तो उनमें से मेरे लिए क्या हलाल है और क्या हराम? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जब तुम कोई वस्तु खरीदो, तो उसे तब तक न बेचो जब तक उसे अपने कब्ज़े में न ले लो।” इसे अल्बानी ने “सहीहुल-जामे’” (हदीस संख्या : 342) में सहीह कहा है।
इसी तरह, दारकुतनी तथा अबू दाऊद (हदीस संख्या : 3499) ने ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वस्तुओं को उसी स्थान पर बेचने से मना किया जहाँ उन्हें खरीदा गया है, जब तक कि व्यापारीगण उन्हें अपने कब्ज़े में लेकर अपने ठिकानों तक न ले जाएँ।‘’ इसे इब्न हिब्बान और हाकिम ने सहीह कहा, और अल्बानी ने “सहीह अबू दाऊद” में हसन कहा।
सहीह बुख़ारी (हदीस संख्या : 2132) तथा मुस्लिम (हदीस संख्या : 1525) में इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो कोई खाद्य पदार्थ खरीदे, वह उसे पूरी तरह अपने कब्ज़े में लेने से पहले न बेचे।”
मुस्लिम ने इसमें यह वृद्धि की है : इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने कहा : “मैं समझता हूँ कि यही हुक्म हर चीज़ के लिए है।” अर्थातः इस मामले में भोजन और अन्य वस्तुओं के बीच कोई अंतर नहीं है।
दूसरी बात :
आपके और निर्माण सामग्री बेचने वाले व्यापारी के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है; इसलिए, आप उससे यह अनुरोध करने के हक़दार नहीं हैं कि वह तब तक पैसे रोककर रखे जब तक कि कीमतें कम न हो जाएँ। क्योंकि सही मुराबहा —जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है — में यह ज़रूरी कि वित्तीय संस्थान पहले व्यापारी से सामान खरीदे। जब संस्थान वस्तु खरीद ले और उसे अपने कब्ज़े में कर ले, तब आपकी भूमिका शुरू होती है कि आप उसे संस्थान से खरीदें।
अगर अभी सामग्री की कीमतें अधिक हैं, तो आप कीमतें कम होने का इंतज़ार कर सकते हैं, फिर उसके बाद मुरबाहा के लिए आवेदन करें।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।