नमाज़ के अर्कान चौदह (14) और उसके वाजिबात आठ (8) हैं। जबकि नमाज़ की सुन्नतें बहुत-सी है, जिनमें से कुछ का संबंध कथन से है और कुछ का संबंध कार्य से। रुक्न और वाजिब के बीच अंतर यह है कि रुक्न जानबूझकर या गलती से छोड़ देने से माफ नहीं होता है, बल्कि उसको करना ज़रूरी होता है। जहाँ तक वाजिब का संबंध है, तो वह भूलकर छोड़ने से माफ हो जाता है और सह्व का सजदा करके उसकी भरपाई की जाती है।
नमाज़ के अर्कान, वाजिबात और सुन्नतें क्या हैंॽ
प्रश्न 65847
नमाज़ की सुन्नतों से क्या तात्पर्य हैॽ नमाज़ के अर्कान क्या-क्या हैॽ उसके वाजिबात क्या हैंॽ तथा रुक्न और वाजिब के बीच क्या अंतर हैॽ
उत्तर का सारांश
उत्तर का पाठ
अंतर्वस्तु
नमाज़ की सुन्नतें और उनसे अभिप्राय
नमाज़ की बहुत-सी सुन्नतें हैं, जिनमें से कुछ ‘क़ौली’ हैं यानी उनका संबंध कथन से है और कुछ ‘फ़े'ली’ सुन्नतें हैं यानी उनका संबंध कर्म से है। सुन्नतों से अभिप्राय : अर्कान एवं वाजिबात के अलावा चीज़ें हैं।
कुछ फ़ुक़हा ने क़ौली सुन्नतों की संख्या सत्रह तक, और फे’ली सुन्नतों की संख्या पचपन तक पहुँचाई है।
किसी भी सुन्नत को छोड़ देने से, चाहे वह जानबूझकर ही क्यों न हो, नमाज़ अमान्य नहीं होती है। जबकि वाजिबात और अरकान का मामला इसके विपरीत है।
रुक्न और वाजिब के बीच अंतर : यह है कि रुक्न जानबूझकर या गलती से छोड़ देने से माफ नहीं होता है, बल्कि उसको करना ज़रूरी होता है।
जहाँ तक वाजिब का संबंध है, तो वह भूलकर छोड़ने से माफ हो जाता है और सह्व का सजदा करके उसकी भरपाई की जाती है।
शायद यहाँ नमाज़ के अरकान और वाजिबात का उल्लेख करना और फिर उसकी कुछ सुन्नतों का उल्लेख करना उचित होगा, जो कि “दलील अत-तालिब” नामक पुस्तक के पाठ पर आधारित हैं, जो कि हंबली फुक़हा के बीच प्रचलित एक प्रसिद्ध संक्षेप है।
नमाज़ के अर्कान
नमाज़ के 14 रुक्न (स्तंभ) हैं जो इस प्रकार हैं :
(1) फ़र्ज़ (अनिवार्य) नमाज़ के दौरान खड़ा होना जो ऐसा करने में सक्षम है।
(2) तकबीरतुल-एहराम (प्रारंभिक तकबीर) यानी "अल्लाहु अकबर" कहना।
(3) सूरतुल-फातिहा पढ़ना।
(4) रुकू’ (झुकना), जिसका न्यूनतम रूप यह है कि इतना झुके कि अपनी हथेलियों से अपने घुटनों को छू सके, तथा सबसे पूर्ण रूप यह है कि वह अपनी पीठ को समतल करके अपना सिर उसके समानांतर रखे।
(5) रुकू’ से उठना।
(6) सीधे खड़े होना।
(7) सजदा, जिसका सबसे पूर्ण रूप अपने माथे, नाक, हथेलियों, घुटनों और पैर की उंगलियों के किनारों को सजदा के स्थान पर रखना, और उसका कम से कम रूप प्रत्येक अंग का एक हिस्सा ज़मीन पर रखना है।
(8) सजदे से उठना।
(9) दोनों सजदों के बीच बैठना। वह जिस तरह भी बैठे, वही काफी है। लेकिन सुन्नत यह है कि वह अपने बाएँ पैर को बिछाकर उस पर बैठ जाए और दाहिना पैर खड़ा रखे और उसे क़िबला की ओर कर ले। (दाएँ पैर की उँगलियों को क़िब्ले की ओर मोड़ ले।)
(10) हर फे’ली (कर्मिक) रुक्न में इत्मीनान, यानी शांति और स्थिरता का होना।
(11) अंतिम तशह्हुद।
(12) अंतिम तशह्हुद (पढ़ने) और दोनों (ओर) सलाम (फेरने) के लिए बैठना।
(13) दोनों ओर सलाम फेरना। इसका मतलब यह है कि दो बार “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह” (तुम पर शांति और अल्लाह की दया हो) कहे। नफ़्ल (स्वैच्छि) नमाज़ों में एक सलाम कहना काफ़ी है; यही बात जनाज़े की नमाज़ पर भी लागू होती है।
(14) अर्कान को उसी क्रम में करना, जैसा हमने उल्लेख किया है। अतः उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर रुकू’ करने से पहले सजदा कर ले, तो उसकी नमाज़ अमान्य हो जाएगी, और यदि वह गलती से ऐसा कर लेता है, तो उसे वापस जाकर रुकू’ करना चाहिए और फिर सजदा करना चाहिए।
नमाज़ के वाजिबात
नमाज़ के वाजिबात आठ हैं, जो इस प्रकार हैं :
(1) तकबीरतुल-एहराम (प्रारंभिक तकबीर) के अलावा अन्य तकबीरें।
(2) इमाम और अकेले नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्ति का “समिअल्लाहु लिमन हमिदह” (अल्लाह ने उसकी सुन ली जिसने उसकी प्रशंसा की) कहना।
(3) “रब्बना व लकल-हम्द” (ऐ हमारे पालनहार! तेरी ही प्रशंसा है) कहना।
(4) रुकू’ में एक बार “सुब्हाना रब्बी अल-अज़ीम” (मेरा महान पालनहार बहुत पवित्र है)” कहना
(5) सजदे में एक बार “सुब्हाना रब्बी अल-आ’ला” (मेरा सर्वोच्च पालनहार बहुत पवित्र है)” कहना।
(6) दोनों सजदों के बीच “रब्बिग़-फिर ली” (ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे)” कहना।
(7) पहला तशह्हुद।
(8) पहले तशह्हुद के लिए बैठना।
नमाज़ की क़ौली (मौखिक) सुन्नतें :
नमाज़ की मौखिक सुन्नतें ग्यारह हैं, जो इस प्रकार हैं :
(1) प्रारंभिक तक्बीर के बाद
سبحانك اللهم وبحمدك وتبارك اسمك وتعالى جدك ولا إله غيرك
“सुब्हानका अल्लाहुम्मा व बि-हमदिका, व तबारकस्मुका व तआला जद्दुका व ला इलाहा ग़ैरुका” (ऐ अल्लाह, तू पाक है और हम तेरी ही प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बड़ी बर्कत वाला (बहुत शुभ) औ तेरी महिमा (शान) सर्वोच्च है, तथा तेरे अलावा कोई सच्चा पूज्य नहीं) कहना। इसे दुआउल-इस्तिफ्ताह (नमाज़ को प्रारंभ करने की दुआ) कहा जाता है
(2) तअव्वुज़ (अऊज़ो बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम) पढ़ना।
(3) बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़ना।
(4) आमीन कहना।
(5) सूरतुल-फ़ातिहा के बाद कोई सूरत पढ़ना।
(6) इमाम का ऊँची आवाज़ में क़िराअत करना।
(7) मुक़तदी के अलावा का तह्मीद (रब्बना व लकल-हम्द) के बाद “मिल्उस्-समावाति व मिलउल अर्ज़ि, व-मिल्आ मा शे’ता मिन शैइन बा’दु।” (ऐ हमारे रब! तेरे ही लिए सब प्रशंसा है आकाशों और धरती के बराबर, और जो कुछ तू इसके बाद चाहे, उसके बराबर) कहना। (सही दृष्टिकोण यह है कि यह मुक़तदी के लिए भी पढ़ना सुन्न है)।
(8) रुकू’ में एक से अधिक बार तस्बीह कहना, यानी दूसरी, तीसरी और उससे अधिक बार तस्बीह।
(9) सजदे में एक से अधिक बार तस्बीह कहना।
(10) दो सजदों के बीच एक से अधिक बार “रब्बिग़ फिर ली” (ऐ मेरे पालनहार, मुझे क्षमा कर दे) कहना।
(11) आख़िरी तशह्हुद में नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम पर और आपके परिवार पर दुरूद पढ़ना, तथा आपके और उनके लिए बरकत की दुआ करना और उसके बाद दुआ करना।
नमाज़ की फे’ली (क्रियात्मक) सुन्नतें :
(1) तकबीरतुल-एहराम (प्रथम तकबीर) के साथ दोनों हाथों को उठाना।
(2) रुकू’ करते समय दोनों हाथों को उठाना।
(3) रुकू’ से उठते समय दोनों हाथों को उठाना।
(4) उसके बाद दोनों हाथों को नीचे गिराना।
(5) दायाँ हाथ बाएँ हाथ पर रखना।
(6) अपने सजदे की जगह को देखना।
(7) खड़े होने की हालत में दोनों पैरों को अलग-अलग रखना।
(8) रुकू’ में अपने हाथों से उँगलियों को फैलाए हुए अपने घुटनों को पकड़ना, पीठ को सीधा रखना और सिर को उसके समानांतर रखना।
(9) सजदा करने के अंगों को ज़मीन पर मज़बूती से रखना और उनका सजदे की जगह को छूना, घुटनों के अलावा, क्योंकि यह मकरूह है।
(10) अपनी भुजाओं को बगलों से, पेट को जाँघों से और जाँघों को पिंडलियों से दूर रखना; दोनों घुटनों को अलग-अलग रखना; पैरों को सीधा रखना और उनकी उंगलियों के भीतरी भाग (पंजों) को ज़मीन पर फैलाकर (अलग-अलग) रखना; हाथों को कंधों के बराबर रखना और उसकी उँगलियाँ एक साथ मिलाकर, फैलाकर रखना।
(11) दोनों सजदों के बीच और पहले तशह्हुद में इफ़तिराश की अवस्था में बैठना और दूसरे तशह्हुद में तवर्रुक की अवस्था में बैठना।
(12) दोनों सजदों के बीच और तशह्हुद में उँगलियों को मिलाकर हाथों को जाँघों पर रखना, सिवाय इसके कि दूसरे तशह्हुद में छोटी और अनामिका उँगलियों को अंदर रखना चाहिए, मध्यमा और अँगूठे से घेरा बनाना चाहिए और अल्लाह का ज़िक्र करते समय तर्जनी से इशारा करना चाहिए।
(13) सलाम फेरते समय दाएं और बाएं मुड़ना
इनमें से कुछ मुद्दों पर फुकहा के बीच कुछ मतभेद हैं; कुछ लोगों द्वारा जो अनिवार्य माना जाता है, उसे दूसरे सुन्नत मानते हैं। इस पर फ़िक़्ह की किताबों में विस्तार से चर्चा की गई है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
स्रोत:
साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर