निवेश कंपनियों में अपना धन खो देने वालों के लिए दस सलाह

प्रश्न: 34808

उन लोगों को क्या सलाह दी जाए जिन्होंने निवेश कंपनियों में अपना धन खो दिया है?

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

  1. मुसलमान को चाहिए कि वह अपना धन केवल हलाल (वैध) क्षेत्रों में निवेश करे, हराम से बचे और शक वाली चीज़ों (संदिग्ध मामलों) से दूरी रखे।
  2. उसे ऐसे व्यक्ति का चयन करना चाहिए, जो ताक़तवर, ईमानदार व भरोसेमंद हो, धन के प्रबंधन और उसे बढ़ाने की क्षमता रखने वाला हो, और निवेश के तरीकों का जानकार हो।
  3. मुज़ारबा और निवेश का अनुबंध शरीअत के अनुसार सही हो, अमान्य और हराम शर्तों से रहित हो। इसलिए ऐसा अनुबंध करना जायज़ नहीं है, जो मूल धन (पूँजी) या लाभ की एक निश्चित रकम की गारंटी देता हो। तथा दोनों साझेदारों के लाभ का अनुपात स्पष्ट और ज्ञात होना चाहिए, वगैरह।
  4. निवेश का प्रबंधन करने वाले मुज़ारिब पर ज़रूरी है कि वह लोगों के धन का प्रबंधन करने के बारे में अल्लाह से डरे। अतः जितना धन संभालने की क्षमता न हो, उतना न ले। अगर पता हो कि वह किसी का धन ठीक से निवेश नहीं कर पाएगा, तो उसे स्वीकार न करे। उसके लिए अनिवार्य है कि मुज़ारबा की शर्तों का पूरी तरह पालन करे। अगर पैसे का मालिक यह शर्त रखता है कि पैसे को किसी खास देश में निवेश किया जाना है, तो उससे बाहर ले जाना जायज़ नहीं है। यदि किसी विशेष क्षेत्र में निवेश की शर्त लगाई गई हो, तो उसी तक सीमित रहे। लोगों को धोखा न दे, उन्हें यह भ्रम न दे कि वह लाभ कमा रहा है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। यह बड़े गुनाहों में से है कि पुराने निवेशकों को नए निवेशकों के मूल धन से लाभ दिया जाए, जबकि उसके पास कोई वास्तविक व्यापार मौजूद न हो जिसमें वह धन को विकसित करता हो। ऊँचे लाभ के झूठे वादों से लोगों को आकर्षित न करे, जबकि उसे निश्चित रूप से पता है कि उसकी कोई ऐसी व्यापारिक गतिविधि नहीं है जो इतना लाभ दे सके।
  5. उसे लोगों के धन के मामले में अल्लाह से डरना चाहिए और उसके लिए सक्षम प्रशासनिक और वित्तीय टीम तथा अनुभवी विशेषज्ञ उपलब्ध कराने चाहिएं, जो लोगों से प्राप्त हुए उस धन को बढ़ाने में सक्षम हों।

घाटा होने की स्थिति में :

- मुज़ारिब (निवेशक प्रबंधक) पर ज़रूरी है कि वह सच्चाई और ईमानदारी से लोगों को वास्तविक स्थिति बताए।

- यदि उसकी ओर से कोई लापरवाही या सीमा का उल्लंघन हुआ है, तो वह उसकी भरपाई का ज़िम्मेदार होगा और उसकी लापरवाही और गलती से होने वाले नुकसान का बोझ उसे ही उठाना होगा।

- धन के मालिक को, यदि नुकसान हो जाए, तो अल्लाह के फ़ैसले और उसकी नियति (भाग्य) पर राज़ी रहना चाहिए, और नुकसान को कम करने, उसके दुष्प्रभावों से निपटने और जितना संभव हो मूल धन बचाने के लिए हर जायज़ और वैध उपाय अपनाने चाहिए।

- अल्लाह के फ़ैसले (क़ज़ा व क़दर) पर संतुष्ट रहना उस व्यक्ति को जिसने अपना धन खो दिया है मानसिक विघटन और नैतिक निराशा से बचाता है। चुनाँचे उसे पागल होने, हार्ट अटैक आने, या आत्महत्या करने से रोकता है, जैसा कि कुछ लोगों के साथ होता है जिनमें सब्र की कमी होती है।

उसे निम्न वास्तविकताओं को याद रखना चाहिए :

इंसान को उसके शरीर, या धन, या परिवार या समाज में आने वाली मुसीबतें पूर्ण रूप से बुराई नहीं होतीं जिससे निराशा हो। बल्कि, यदि मोमिन उन्हें अच्छी तरह से स्वीकार करे और उनके प्रति सही रवैया अपनाए, तो वे उसके लिए भलाई बन जाती हैं। अतः वे :

(क)- उसके लिए अच्छी हैं, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : “मोमिन का मामला कितना अद्भुत है! निश्चय उसका समुचित मामला उसके लिए अच्छा है, और यह विशेषता मोमिन के अलावा किसी और के लिए नहीं है। अगर उसे कोई खुशी मिलती है, तो वह शुक्र करता है, तो यह उसके लिए अच्छा होता है; और अगर उसे कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वह सब्र करता है, तो वह भी उसके लिए अच्छा होता है।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 2999) ने रिवायत किया है।

(ख)- संभव है कि अल्लाह इस नुकसान के द्वारा उसके लिए भलाई चाहता हो। इमाम बुखारी (हदीस संख्या : 5645) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह  जिसके साथ भलाई का इरादा करता है, उसे वह विपत्ति से पीड़ित कर देता है।”

हाफ़िज़ (इब्न हजर) कहते हैं : अबू उबैद अल-हरवी ने कहा : “इसका अर्थ यह है कि अल्लाह उसे मुसीबतों में डालता है ताकि उनके बदले उसे सवाब प्रदान करे।”

(ग) और संभव है कि अल्लाह उससे प्रेम करता हो : “जब अल्लाह किसी क़ौम से प्रेम करता है, तो वह उन्हें परीक्षा में डालता है। फिर जो सब्र करता है, उसके लिए सब्र है, और जो घबराता है, उसके लिए घबराहट है।” इस हदीस के वर्णनकर्ता विश्वसनीय (भरोसेमंद) हैं।

सख़बरा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसे दिया जाए तो वह शुक्र करे, जिसे आज़माया जाए तो वह सब्र करे, जो ज़ुल्म करे तो इस्तिग़फ़ार (क्षमा याचना) करे, और जिस पर ज़ुल्म किया जाए तो वह माफ़ कर दे — यही लोग हैं जिनके लिए अमन (सुरक्षा) है और वही लोग हिदायत पाए हुए हैं।” इसे इमाम तब्रानी ने हसन (अच्छे) इसनाद के साथ रिवायत किया है।” हाफ़िज़ का कथन समाप्त हुआ।

(घ) अल्लाह तआला ने अपनी किताब में एक ऐसा तरीक़ा स्पष्ट किया है जो दिलों को सुकून देता है और नफ़्स की उग्रता को शांत करता है, और वह है सब्र और इस्तिर्जाʿ (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन कहना)। और अल्लाह ने इसे अपने पूर्ण प्रतिफल और उस सवाब के साथ जोड़ा है जिसके द्वारा वह सब्र करने वाले और सवाब की नीयत रखने वाले का दर्जा ऊँचा करता है। यह अल्लाह की ओर से एक वादा है जिसे वह अवश्य पूरा करेगा। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

وبشّر الصابرين الذين إذا أصابتهم مصيبة قالوا إنا لله وإنا إليه راجعون أولئك عليهم صلوات من ربهم ورحمة وأولئك هم المهتدون

 “और (ऐ नबी!) सब्र करने वालों को शुभ समाचार सुना दें। वे लोग कि जब उन्हें कोई मुसीबत पहुँचती है, तो कहते हैं : निःसंदेह हम अल्लाह के हैं और निःसंदेह हम उसी की ओर लौटने वाले हैं। यही लोग हैं जिनपर उनके रब की ओर से कई कृपाएँ तथा बड़ी दया है, और यही लोग मार्गदर्शन पाने वाले हैं।” (सूरतुल-बक़रा : 155–157)

क़ुर्तुबी कहते हैं :

अल्लाह तआला ने इस्तिर्जाʿ के शब्दों — यानी मुसीबत में पड़े व्यक्ति के “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” कहने — को मुसीबत से ग्रस्त लोगों के लिए पनाहगाह और शरण बना दिया है, और परीक्षा में पड़े लोगों के लिए शैतान से सुरक्षा बना दिया है, ताकि शैतान उस व्यक्ति पर हावी न हो जाए और उसके मन में बुरे विचार डाले, जिससे जो शांत है उसे भड़का दे और जो छिपा है उसे उजागर कर दे।

क्योंकि जब इंसान इन शब्दों का सहारा लेता है — जो भलाई और बरकत के अर्थों को समेटे हुए हैं — तो उसका यह कहना : “इन्ना लिल्लाह” (बेशक, हम अल्लाह के हैं) बंदगी और राज्य की स्वीकारोक्ति है, और बंदे का यह इकरार है कि जो कुछ उसे पहुँचा है वह अल्लाह की ओर से है; और राजा को अपने राज्य में जैसा चाहे वैसा करने का अधिकार है।

तथा उसका “व इन्ना इलैहि राजिऊन” कहना इस बात की स्वीकारोक्ति है कि अल्लाह हमें मृत्यु देगा, फिर हमें दोबारा जीवित करेगा; अतः इस दुनिया में भी फ़ैसला उसी का है और आख़िरत में लौटकर जाना भी उसी की ओर है। इसी तरह इसमें अल्लाह की ओर से सवाब की आशा भी शामिल है।

ऊपर उल्लिखित लाभों के अतिरिक्त, इस इस्तिर्जाʿ की तात्कालिक बरकतों में से वह भी है जो उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया गया है। वह कहती हैं : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फ़रमाते हुए सुना : “जिस मुसलमान को भी कोई मुसीबत पहुँचती है, और वह वही कहता है जिसका अल्लाह ने उसे आदेश दिया है : ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। अल्लाहुम्मा’-जुर्नी फी मुसीबती, व अख़्लिफ़ ली ख़ैरम्-मिन्हा’ (बेशक हम अल्लाह के हैं, और बेशक हम उसी की ओर लौटने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी इस मुसीबत में अज्र दे और इसके बदले मुझे इससे बेहतर प्रदान कर), तो अल्लाह उसे इससे बेहतर प्रदान करता है।”

(ङ)- यह (मुसीबत) गुनाहों का कफ़्फ़ारा (परायश्चित) भी होती है। जैसाकि बुख़ारी और मुस्लिम ने आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “किसी मुसलमान को जो भी मुसीबत पहुँचती है, अल्लाह उसके द्वारा उसके गुनाहों को मिटा देता है, यहाँ तक कि वह काँटा भी जो उसे चुभता है।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

(च)इंसान से अपेक्षित यह है कि बुरी ख़बर सुनते ही वह ख़ुद को संभाले रखे और सब्र से काम ले, जैसे निवेश कंपनियों के गिरने की ख़बर आना आदि। यह दिल के दौरे, लकवे (स्ट्रोक) तथा मानसिक और नर्वस टूट-फूट से सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, वह सब्र जिस पर इंसान को सवाब दिया जाता है, वह वही सब्र है जो “पहली चोट लगते ही” किया जाए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सब्र तो केवल पहली चोट के समय ही होता है।” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 1238) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 926) ने रिवायत किया है।

इमाम नववी कहते हैं :

“इससे मुराद पूर्ण सब्र है, जिसके बदले भरपूर अज्र मिलता है; क्योंकि उसमें काफ़ी ज़्यादा मशक्कत और कठिनाई सहनी पड़ती है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

(छ) निश्चय ही जब बंदा मुसीबत के साथ अच्छा व्यवहार करता है, तो वही मुसीबत उसके लिए नेमत बन जाती है; क्योंकि अल्लाह उसके द्वारा उसके गुनाहों को मिटा देता है और उसके दर्जे को ऊँचा कर देता है।

अल्लाह कभी-कभी मुसीबत के माध्यम से भी नेमत प्रदान करता है, चाहे वह (मुसीबत) कितनी ही बड़ी क्यों न हो। जबकि अल्लाह कभी-कभी कुछ लोगों को नेमतों के द्वारा परीक्षा में डालता है।

(ज) मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि वह इस बात पर पूरा यक़ीन रखे कि उसके धन का चला जाना, अल्लाह की ओर से उसके अपमान का प्रमाण नहीं है। क्योंकि अल्लाह तआला ने हमें बता दिया है कि अमीरी और ग़रीबी — दोनों ही परीक्षा और आज़माइश के साधन हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है :

فَأَمَّا الإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ (15) وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ

“लेकिन मनुष्य (का हाल यह है कि) जब उसका पालनहार उसका परीक्षण करे, फिर उसे सम्मानित करे और नेमत प्रदान करे, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मुझे सम्मानित किया। लेकिन जब वह उसका परीक्षण करे, फिर उसपर उसकी रोज़ी तंग कर दे, तो कहता कि मेरे पालनहार ने मुझे अपमानित किया।” (सूरतुल-फ़ज्र : 15–16)

(झ) मुसलमान को चाहिए है कि मुसीबत के समय अल्लाह के नेक बंदों में से उन लोगों का अनुसरण करे जो पहले परीक्षाओं से गुज़रे हैं। अल्लाह तआला ने अय्यूब अलैहिस्सलाम की कठिनाई को दूर करने के बारे में फ़रमाया :  رحمة من عندنا “हमारी ओर से रहमत के रूप में” अर्थात हमने उनसे उनकी कठिनाई दूर कर दी और जो नुकसान उन्हें पहुँचा था उसे हटा दिया — यह हमारी ओर से उन पर रहमत, दया और एहसान था।  وذكرى للعابدين   “और इबादत करने वालों के लिए एक याद-दहानी के रूप में” अर्थात यह उन लोगों के लिए एक नसीहत है जिन्हें उनके शरीर, या माल या संतान में किसी परीक्षा में डाला गया हो। उनके लिए अल्लाह के नबी अय्यूब अलैहिस्सलाम में एक आदर्श है, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें इससे भी बड़ी परीक्षा में डाला, फिर उन्होंने सब्र किया और सवाब की आशा रखी, यहाँ तक कि अल्लाह ने उन्हें राहत दी।

तथा वर्णन किया जाता है कि वलीद बिन अब्दुल-मलिक के पास अबस क़बीले का एक वृद्ध व्यक्ति आया, जो दृष्टिहीन था। जब वह एक दिन की शाम उसके पास बैठा, तो वलीद ने उससे उसकी हालत के बारे में पूछा। उसने कहा : ऐ अमीरुल-मोमिनीन! मैंने एक रात ऐसी भी गुज़ारी कि अबस में मुझसे अधिक माल वाला, घोड़े और ऊँट रखने वाला, संतान वाला, अधिक सहायक और अधिक प्रतिष्ठा वाला कोई व्यक्ति नहीं था। फिर हम पर एक भयंकर सैलाब आया, जो परिवार, संतान और माल सब कुछ बहा ले गया। हमारे क़ाफ़िले से केवल एक नवजात शिशु और एक भागा हुआ ऊँटनी का बच्चा ही बचा। मैं बच्चे की ओर गया और उसे उठा लिया, फिर उस ऊँटनी के बच्चे के पीछे चला जो भाग गया था। जब मैं उसे पकड़ने में असमर्थ रहा, तो मैंने बच्चे को ज़मीन पर रख दिया और ऊँटनी के बच्चे के पीछे चल पड़ा। फिर मैंने बच्चे की चीख़ सुनी। जब मैं वापस लौटा तो देखा कि भेड़िया उसे खा चुका था। फिर मैं ऊँट के पीछे गया, और जब मैंने उसे पकड़ लिया, तो उसने अपने पैर से मेरे चेहरे पर लात मारी, जिससे मेरी आँखों की रोशनी चली गई, और उसने मुझे पीठ के बल गिरा दिया। जब मुझे होश आया, तो शाम के समय मैं जो धन-दौलत, हलाल माल, संतान, प्रतिष्ठा और क़बीलों में ऊँचे स्थान वाला था — सुबह होते-होते मैं दोनों हाथों से खाली हो चुका था; न मेरी आँखों में रोशनी थी, न संतान, न परिवार, न माल। तो मैंने इस सब पर अल्लाह की प्रशंसा की।

यह सुनकर वलीद ने कहा : “इसे उरवा बिन ज़ुबैर के पास ले जाओ, ताकि वह जान ले कि दुनिया में उससे भी अधिक परीक्षाओं में डाला गया व्यक्ति मौजूद है, और जो उससे अधिक सहनशील और सब्र करने वाला है।”

जब तुम किसी कठिन परीक्षा में डाले जाओ, तो उस पर सम्मानित और नेक व्यक्ति की तरह धैर्य करो; क्योंकि यही सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार है।

और जब तुम किसी भारी संकट में फँस जाओ, तो उस पर चुप्पी का वस्त्र पहन लो; क्योंकि यही सबसे अधिक सुरक्षित और सही रास्ता है।

लोगों से शिकायत मत करो ; क्योंकि तुम दयालु अल्लाह की शिकायत उस व्यक्ति से कर रहे होते हो जो दया नहीं करता।

कितनी ही बार कोई विपत्ति उससे पीड़ित व्यक्ति के लिए वास्तव में एक नेमत (वरदान) होती है। कई ऐसे बंदे होते हैं जिनके लिए निर्धनता और बीमारी ही बेहतर होती है। यदि उनका शरीर स्वस्थ होता और धन अधिक होता, तो वे घमंड करते और अत्याचार करने लगते।  ولو بسط الله الرزق لعباده لبغوا في الأرض   “और यदि अल्लाह अपने बंदों के लिए रोज़ी को बहुत फैला देता, तो वे धरती पर सरकशी और विद्रोह करने लगते।” (सूरत अश-शूरा : 27)

अपने दुखों से मुँह फेर लो और हर मामले को ईश्वरीय निर्णय पर छोड़ दो।

शीघ्र आने वाली भलाई की खुशखबरी लो, जो तुम्हें बीते हुए सारे दुःख भुला देगी।

कितनी ही बार कोई ऐसा मामला होता है जो तुम्हें अप्रिय लगता है, लेकिन उसके परिणाम में संतोष और भलाई छिपी होती है।

और कितनी ही बार रास्ता तंग हो जाता है, और कितनी ही बार वही तंगी खुलकर विशाल हो जाती है।

अल्लाह वही करता है जो वह चाहता है, इसलिए उस पर आपत्ति मत करो।

अल्लाह ने तुम्हें पहले भी सुंदर नेमतों का अभ्यस्त बनाया है, तो बीते हुए अनुभवों से अनुमान लगाओ (कि आगे भी भलाई होगी)।

(ञ)- निवेश कंपनियों के डूबने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति का सारा धन समाप्त ही हो गया। बल्कि, संभव है कि उसे उसका आधा धन, या उससे अधिक, या उससे कम वापस मिल जाए। और यदि वह पूरा धन भी खो देता है, तो यह न तो दुनिया का अंत है और न ही सारी आशा के समाप्त होने का कारण। बल्कि, अगर वह सब्र रखे तो अल्लाह उसे भविष्य में और भी धन दे सकता है और उसकी भरपाई कर सकता है।

6- हर उस व्यक्ति पर अल्लाह की ओर सच्चे दिल से तौबा करना अनिवार्य है जिसने गलत जानकारी देकर झूठ बोला है, या किसी को किसी ऐसी बात का भ्रम दिया है जो वास्तविक न हो, या धोखा, छल और भ्रामक तरीक़ों (तलबीस व तदलीस) से काम लिया है। या जो लोगों से किसी खास काम के लिए निवेश के नाम पर धन लेता था और फिर उन्हें धोखा देकर उस धन को गिर चुकी निवेश कंपनियों में लगा देता था और लाभ को अपने और उनके बीच बाँट लिया करता था।

इसी तरह उस व्यक्ति पर तौबा करना अनिवार्य है जिसने लोगों के माल के साथ जुआ जैसा जोखिम उठाया हो, या अपनी बहन, या माँ या पत्नी की जमा-पूँजी को इस तरह दाँव पर लगा दिया हो कि उन्हें असलियत न बताई हो कि वह उनके माल के साथ क्या करने जा रहा है। इसी तरह वह व्यक्ति भी दोषी है जिसने ब्याज पर कर्ज़ लेकर इन निवेश कंपनियों में प्रवेश किया है।

शायद इन सच्चाइयों के उजागर होने में बहुत बड़े सबक और गहरी सीखें छिपी हुई हैं जिनसे लाभ उठाना ज़रूरी है।

7- जो लोग नसीहत करने वाले हैं और जिन्होंने पहले ही लोगों को इस प्रकार की जोखिम भरी गतिविधियों से सावधान किया था, उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसे हालात में किसी की दुर्दशा पर खुश होने की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि उन्हें चाहिए कि वे हर संभव तरीक़े से लोगों की मुसीबत को हल्का करने की कोशिश करें, उनके ग़म को हल्का करने के लिए ढाढ़स बँधाएँ, और नुकसान उठाने वालों को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करें।

8- इस्लामी धर्म और उसके सच्चे अनुयायी, जो ईमानदारी से उस पर अमल करने वाले हैं, किसी भी हाल में झूठ, धोखा, छल, बेईमानी, विश्वासघात, कुप्रबंधन, या बिना रहनुमाई के धन के साथ जोखिम भरी और अंधाधुंध हरकतों, या घाटे वाले क्षेत्रों में धन नष्ट करने, या उसे धोखाधड़ी और ठगी के हवाले करने के परिणामों के ज़िम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते। बल्कि हर दोषी और लापरवाह व्यक्ति अपने किए की सज़ा केवल वही (खुद) भुगतेगा। किसी दूसरे को उसकी मूर्खता, या कुप्रबंधन, या उसके झूठ या धोखाधड़ी का ज़िम्मेदार ठहराना जायज़ नहीं है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया :  وَلا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى   “कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा।” तथा फ़रमाया :  وَإِذَا قُلْتُمْ فَاعْدِلُوا   “और जब तुम बात करो तो न्याय करो।” और फ़रमाया :  اعدلوا هو أقرب للتقوى “न्याय करो, यही परहेज़गारी के अधिक निकट है।” और फ़रमाया :  كونوا قوامين بالقسط   “न्याय पर पूरी तरह क़ायम रहने वाले बनो।”

9- नुकसान होने की स्थिति में शरई (इस्लामी) तरीकों का पालन करना अनिवार्य है। नुकसान के बाद जो धन शेष रह जाए, उसे मूल पूँजी लगाने वालों के बीच समानता के आधार पर बाँटा जाए। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मूल पूँजी के अनुपात के अनुसार शेष धन में से हिस्सा दिया जाए।

यह हरगिज़ जायज़ नहीं कि हराम दलालों का बाज़ार उन कर्ज़ों और धन को, जो अभी वसूल नहीं हुए, कम कीमत पर खरीद ले। क्योंकि इसमें रिबा अल-फ़ज़्ल और रिबा अन-नसीअह दोनों का संयोजन होता है, और सूद (रिबा) सबसे बड़े पापों में से एक है।

10- मुसलमानों पर यह आवश्यक है कि वे एक-दूसरे के प्रति दिलों में विस्तार रखें। अतः गाली-गलौज, अपशब्द, पत्नी को तलाक़ देने, माता-पिता की अवज्ञा करने, रिश्तों को तोड़ने, या दूसरों पर हमला करने का कोई स्थान नहीं है।

साथ ही, सक्षम मुसलमानों को चाहिए कि वे जितना संभव हो सके गरीबो, कमजोरों, यतीमों, विधवाओं, बुज़ुर्गों, सीमित आय वालों, और उन लोगों की सहायता करें जिन्होंने अपने घर और गाड़ियाँ बेच दीं और अपने व्यापार समेटकर इस घाटे वाले निवेश में लगा दिए। इसी तरह उन ख़ैराती (दान) धनराशियों को बचाने की कोशिश करें जिनमें से कुछ को दानदाताओं की अनुमति के बिना अन्याय और ज़ुल्म के साथ इन सट्टेबाज़ी वाले सौदों में लगा दिया गया, जिनके पीछे कोई आवाज़ नहीं है जो अपने अधिकार की माँग कर सके।

मुस्लिम वकीलों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे कमजोरों को उनके अधिकार दिलाने में सहायता करें, ख़ैराती धन को वापस दिलाने में सवाब की नीयत रखें, निर्दोषों को दोषमुक्त कराएँ और धर्म के अनुसार सलाह और मार्गदर्शन प्रदान करें।

हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह पीड़ितों को इसका बेहतर प्रतिफल प्रदान करे, उन्हें अपने पास से उत्तम बदला अता करे, और उन्हें इस आपदा पर सब्र की तौफ़ीक़ दे। और वही सबसे उत्तम रोज़ी देने वाला है।

संदर्भ

स्रोत

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद